भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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आगमनिगमबोध

( ४७ )

चौपाई

प्रथमहि पानी विद्या जानो । विनविद्या किमिहरि पहिचानो॥ द्वितिये पुष्पको अर्थ कहीजै । एक देवकी टेक कहीजै ॥ तृतिये चावल अर्थ सुनाओ । भोग अशुचिपरधान्यन खाओ॥ चौथे चन्दनते इमि जानी । काम क्रोधकी कीजै हानी ॥ कीना डाह द्वेष सब जोई । उरते दूर बहाओ सोई ॥ पंचम धूप अर्थ इमि कहिये । प्रीति देव गरमीते गहिये ॥ छठये दीपको अर्थ बताओ । बुद्धिदीप निजहृदय जगाओ ॥

अथ मुक्तिस्वरूप वर्णन—चौपाई

जीवते ब्रह्म होय जो कोई । मुक्तनाम भाषे श्रुति सोई ॥ चार भांतिकी मुक्ति प्रमाना । सालोको सामीप बखाना ॥ सारूपो सायुज्य कहीजै । ऐसो तिनको अर्थ गहीजै ॥ सालोकहिं प्रभु लोक निवासा । सामीपा हरिके ढिग वासा ॥ सारूपा प्रभु रूप हो भाषा । सायुज्यौ हरिमें मिल दासा ॥ जस वासना दास उर होई । तैसी मुक्ती पावै सोई ॥ जब उपासना पूर्ण भैऊ । जीवनमुक्त ताहि तब कहेऊ ॥ परम धामको जब सो जावै । हरिपारषद तासु ढिग आवै ॥ जब हरिधामको चालन लागे । थूल देहको तब सो त्यागे ॥ लिंगदेह तब धारण करई । पांचो तत्त्व देह परिहरई ॥ जब भूलोकते आगे चाला । पृथ्वी तत्त्व देह तब डाला ॥ बहुरि देह पानी की धारा । तब जसतत्त्व लंघिहो पारा ॥ बहुरि अग्निदेही गह सोई । पार अग्नि घेरा तब होई ॥ फेर वायुकी देहको धारी । पौन घेर बाहर पग धारी ॥ इमि तन त्यागत गहनव्रीना । सकल घेर बाहर पग दीना ॥ चलि ब्रह्मांड पार जब कीता । मायापार भो त्रिगुणातीता ॥