भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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आगमनिगमबोध

( ५१ )

जब धारे सो मानुष देहा । महा नीच दारिद्री गेहा ॥ सोऊ तन धरि दुःखबहु भोगा । कबहु न सुख पावैसो लोगा ॥ अब मध्यपापी गति वरणो । जाहि समय होतोको मरणो ॥ जडीभूत हो वृक्ष समाना । उर अंतर दुख दौंदह काना ॥ कछुक काल पीछे सुधि आवै । अर्क माह निज वासा पावै ॥ नर्क भोगि पुनि पशुतन धारी । फिर नरदेह केरि अधिकारी ॥ अब सुन लछु पापीकी वाता । मूर्छित हो पुनि चेतन गाता ॥ नर्क भोगि पुनि पशु कलेवर । ताहि भोगिफिरमानुषतनधर ॥ अब पुण्यातमको कह मर्मा । जिनके जक्त मोह भल कर्मा ॥ महा पुण्यजन जब मरिजावै । स्वर्गसे तब विमान चलि आवै ॥ तिहि विमानपर ताहि चढाई । आदर सहित वाहि ले जाई ॥ जाहि देवताको सो ध्यावै । तासु लोक निज भौन बनावै ॥ अपने इष्टदेव ढिग जाई । सबहि भांतितिहिमुखसरसाई ॥ भोगि स्वर्ग आवै नर देशा । काहू फलमें करै प्रवेशा ॥ तिहि फलको पुरुष जो खाई । वीर्य द्वार तिहि उदर समाई ॥ जननी जठरते बाहर होई । उत्तम कुल धनवंता सोई ॥ जौं वासना रहित हो येही । तो सौं धरे संत गृह देही ॥ सहित वासना सुख सरसाया । रहित वासना भक्ति अमाया ॥ अब मध्यम धर्मी गति सुनिये । प्रेरित पुण्यस्वर्ग ग्रह गुनिये ॥ अब लछु पुन्यातप गति कहई । मृत्यु पीछे अस चेतन गहई ॥ सगे बंधु मम क्रिया कराही । ताते पितर लोक हम जाही ॥ पितरलोक सुख लहि महि आवै । जैसा कर्म देहै तस पावै ॥ पापी सुये दुःख चहुँ पास । महा कठिनमारगतिहिभासा ॥ जिहि मारग ताको लेजाई । कंटक लगे चरन में ताही ॥ तपै तेज रबि तापै भारी । ताते ताको तन जर छारी ॥