भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1787, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1787

आगमनिगमबोध

( ६५ )

मुद्रा सकल ताहिने कीनो । ऐसो योग माहि चित दीनो ॥ दोहा-मुद्रा सन्मुख स्वेष्टि भूचरि चाचरि जान । शामभवी उन्मीलनी, पुनि अगोचरी मान ॥ आत्म भावनी बडुरि कह; पूर्ण बोधिनगाय । सर्व साक्षिनी आदि दै, मुद्राते जित लाय ॥

चौपाई

ऐसो योगी भया समाधी । आठों भांति योग भलसाधी ॥ राज योग हठ योग बखानो । त्राहठ अरु कुण्डली प्रमानो ॥ योग लंबिका तारक साधा । योग मीमांसकसांख्य समाधा ॥ आठों योग भली विधि कीना । ऐसो योगी परम प्रवीना ॥ वज्र कीन पुनि अपनी अङ्गा । करि चौरासी कल्प सुटङ्गा ॥ ऐसी वज्र शरीर बनाई । कबहुँ मरे न जरे न जाई ॥ सारी मांस देह गलि गिरेऊ । हाड गूद जमि एकै भयऊ ॥ हाड गूद जब एकमें पागा । हीरा सम तनु चमकन लागा ॥ योगको रस भल गोरख लीना । सत्य कबीर प्रशंसा कीना ॥ केते गोरखनाथ के चेले । सिद्ध भये गहि ज्ञान दुहेले ॥ गोरख यती जक्त गुन गाये । योग युक्ति जगमें फैलाये ॥ शिवजी आदि अचार्य येहा । योग समाधि आदि गुनगेहा ॥ पुनि नौनाथ सिद्ध चौरासी । योग धर्म जग माह प्रकासी ॥ शिवगोरख सम और न योगी । ब्रह्मानन्द योग रस भोगी ॥

अथ चौरासी सिद्धनके नाम

दोहा-भङ्कर सङ्कर संघरो, जङ्कर ऋम होय । दूरम कनी फाहनीफा, लडुरूपा सङ्कर रोय ॥ लङ्करहनीरतन कह, पूरन बिवालक बर्न । जलकाखिघडसुरतिसिध, निरतिसिधकेवलकर्न ॥