कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआगमनिगमबोध
( ६२ )
शनैः २ पुनि पौन निकारे । पिङ्गला रग मारगको धारे ॥ बाहर पौन करो सो जबलों । नश्रुना बाम बन्द रख जबलों ॥ तृतीये तहैं करम आरम्भन । बाहर मात्रालों कर थम्भन ॥ मात्रा ताहि कालको नाऊ । नाम उचार शुद्ध करि पाऊ ॥ नहि विलम्ब नहिं शीघ्रविवेका । शब्द शुद्ध सो मात्रा एका ॥ चौथे जब यह युक्ति संभाला । राखे थित तामैं कछु काला ॥ फिर द्विगुना फिर तिगुना करिये । तिगुणते अधिकमें जबचितधरिये एकबावर ऐसी विधि ठाना । कुंभकमें यह युक्ति प्रमाना ॥ इडाको पलटि पिंगला करना । पुनि पिंगल इडाकरि धरना ॥ पंचम ऐसी युक्ति विलोको । वायूको निज चलते रोको ॥ छठे जो पूरक रेचक भासा । आपते हो श्वासा पर श्वासा ॥ इकीस सहस्र अरु षट् सठथापू । चले श्वास सो अजपा जापू ॥ तापर ध्यान करै जो कोऊ । ताको जाप रैन दिन होऊ ॥ सप्तम वृद्ध होय वय ताही । वय प्रमान श्वासते आही ॥ द्वितिये मध्यम यहि विधि भाला । प्रथम प्राण वायू कर चाला ॥ बाहर अंगुल बाहर आवै । पुनि अदना वायू ले जावै ॥ प्राण कि ठौर अपान ले जाई । पूरकमें यह युक्ति कराई ॥ द्वितिये कुम्भकमे यह डौरा । प्राण अपान करो झक ठौरा ॥ लेकर बन्द करो यहि उक्ती । बरतै अंत रेचक द्वौ युक्ती ॥ पहिले सदाके ढंग न रहई । फेर इडा वायू जो कहई ॥ जोर कियेतै बाहर आई । पहुँच न बाहर अंगुल तार्ई ॥ तृतिये अष्ट कर्म कहि दीनी । पूरक तीन अरु कुम्भक तीनी ॥ दो रेचक भे आठौ कर्मा । अब चौथेको भाखो मर्मा ॥ खैचत थंभन त्यागन प्राना । पूरकगह रेचक नहिं ठाना ॥