भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

ताको कुम्भक नाम बखाना । प्राणनको निज वशमें आना ॥ एकीस लाख अरु साठि हजार । हो नर श्वास पूर्ण जिहि बारा ॥ तिहि अवसर अस युक्ति जो कीये । तौ सौ दो सौ वर्ष लौ जीये ॥ तृतिये कठिन कि बुक्ति सो अहाँ । प्रथम खैचरी मुद्रा गहई ॥ ऐसी लांबी जीभ बढ़ावै । तालूमें पुनि ताहि लगावै ॥ पुनि सो ऐसी युक्त गहावै । प्राणवायु धौले नहि पावै ॥ कान नाक मुख हगलों जोई । तहलों जान न पावै सोई ॥ द्वितीये भूचरि मुद्रा गार्ह । दक्षिण पगकी एडी रूयाई ॥ गुदा लिंग जड दावै बाँही । बाम पाव एडी रख ताही ॥ बार २ एडी बदले दोऊ । पुनि अपान ऊपर खैचेऊ ॥

अथ प्रत्याहारवर्णन-चौपाई

प्रत्याहार सो नाम भनंतो । इन्द्री दमन कीजिये संतो ॥ प्राणायाम प्राण दम धारा । तिमि इन्द्री दम प्रत्याहारा ॥ प्रथमें विषम स्वादते भाजा । द्वितिये बहु विरुद्ध जो काजा ॥ कबहुँ ताहि न करत सयाने । दृष्टिहु ताके दिश नहिं ताने ॥ तृतिये विषम सर्वथा त्यागी । मनहु दृष्टि सन्मुखते भागी ॥ चौथे हर्ष न शोक रहाई । पंचम प्राणायाम हटाई ॥

इति

अथ धारण अथवा परमेश्वरकी प्रीति-चौपाई

प्रीतम प्रीति हिये अति बाढे । सदा ध्यान सुमिरनमें गाढे ॥ प्रथमहि गुरुको ध्यान गहीजै । हग सन्मुख जो कछुक लहीजै ॥ सो सब गुरुकी दाया जाना । बारह मात्रालों हठ ठाना ॥ होयरपक जो पूरन जाना । मात्रा सहस दोसौ षट् पाना ॥

इति