कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआगमनिगमबोध
( ७१ )
अथ ध्यानको वर्णन-चौपाई
ध्यानते ऐसो ज्ञान गहीजै । तातैं बुद्ध धारणा कीजै ॥ दो सहस पांच सो बानवे मात्रा । तहँलो तिहि पहुँचाव सुमात्रा ॥
इति
अथ समाधि वर्णन-चौपाई
अष्टम योग समाधि कहावै । सो धारणा तहँलो पहुँचावै ॥ पांच सहस एकै सो चौरासो । मात्रा धारे शंक विनासी ॥ द्वितिये चिता दूर पराई । तृतिये रूप दृष्टि प्रिय आई ॥ चौथे यहू चितवनि त्यागे । पँचयें मोहि तोहि भेद न लागे ॥ छठयें नहीं कछु रहा दराई । सतयें आप आपमें छाई ॥ तू मोहिमें तोहि माह समाई । जीवहि शिवकी भै एकताई ॥ सहस गिरा इत भाषे येही । जीअत साधु त्याग जब देही ॥ सहज समाधी ज्ञात बखाना । प्राणवायु तहँ लों परमाना ॥ एक सहस सत्तर अरु दोई । मात्रा लों जब निजवश होई ॥ ताको संयम नाम उचारा । यह अर्धांग योग निरधारा ॥
इति
अथ षट्चक्र भेदनकी युक्ति
दोहा-षट् चक्रको भेदके, योगी जन चढ़ि जाय । गगन गुफामें बासकर, आवागमन नशाय ॥
चौपाई
अब षट् चक्रको करें बखाना । मूलद्वार प्रथमैं कहि गाना ॥ मूल द्वार कमल जो अहई । नाम अधार चक्र सो कहई ॥ पाखुरि चार सो कमल विराजा । कृपा गनेश करे तिहि काजा ॥ गुदासे पानी खँचन लागे । खँच खँच जलपुनि तिहि त्यागे ॥ यहि विधि गुदा शुद्ध कर जोई । बस्ती किया नाम सो होई ॥