भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1801

आगमनिगमबोध

( ७९ )

तीन देह तू भौन बताये । तामें थम्भा चार लगाये ॥ एक बड तीन थंभ लछु साजे । पांच देवता नौ द्रवाजे ॥ पृष्ठ अस्थि बड़ थंभ पुकारी । ताके निकट सुषुम्ना नारी ॥ लछु थम्भा जो तीन कहाये । सो सत रज तम गुन बतलाये ॥ पंच प्रवण सुर पांच उचारी । तेहि देह जिव गेह सवारी ॥ मनके रंभ माहचित धारो । सूर्य मंडलाकार निहारो ॥ तेहि रविमंडल प्रणव सिरखो । प्रणवमें दीप शिखा पुनि देखो ॥ दीप शिखा ऊरध दिश जानी । ज्योति स्वरूप ताहि अलुमानी ॥ ताहीमें निज ध्यान हटाई । इमि योगी तन तजि तहँ जाई ॥ रवि मंडल भनि सूक्ष्मनि नारी । गेह पन्थ ब्रह्म रंभको फारी ॥ तन तजिके योगी इमि जाही । परम पुरुषके रूप समाही ॥ ऐसी युक्ति गहे सुख पागी । आलस निद्रा वश दुर्भागि ॥ छन छन ऐसी युक्तिको गहिये । यही उनिषद देखत रहिये ॥ जो यह युक्ति न हरदम होई । निश्चय तीन काल कर सोई ॥ भोर मध्य दिन सायंकाला । नितप्रतिगहि लीजै यह चाला ॥

इति

अथ अष्टसिद्धियोंके नाम चौपाई

प्रथमै अणिमा नाम कहावे । ताहि लहे लछु देह बनावे ॥ द्वितिये महिमा कहो बखानी । निज तनकी दीरघता ठानी ॥ तृतिये लघिमा जो लहिपावै । सो अपनो तन हर्क बनावै ॥ चौथे गरिमा नाम भनीजै । जो लहि निज तन भारी कीजै ॥ पंचम प्राप्ती नाम बतावो । सो लहि जहँ चाहो चलजावो ॥ पुनि प्रकामिका छठयें अहई । जाते निज मनोर्थ सब लहई ॥ सतयें ईशता नामक होई । जापर चहै आप बड होई ॥