कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
आगमनिगमबोध
( ७९ )
तीन देह तू भौन बताये । तामें थम्भा चार लगाये ॥ एक बड तीन थंभ लछु साजे । पांच देवता नौ द्रवाजे ॥ पृष्ठ अस्थि बड़ थंभ पुकारी । ताके निकट सुषुम्ना नारी ॥ लछु थम्भा जो तीन कहाये । सो सत रज तम गुन बतलाये ॥ पंच प्रवण सुर पांच उचारी । तेहि देह जिव गेह सवारी ॥ मनके रंभ माहचित धारो । सूर्य मंडलाकार निहारो ॥ तेहि रविमंडल प्रणव सिरखो । प्रणवमें दीप शिखा पुनि देखो ॥ दीप शिखा ऊरध दिश जानी । ज्योति स्वरूप ताहि अलुमानी ॥ ताहीमें निज ध्यान हटाई । इमि योगी तन तजि तहँ जाई ॥ रवि मंडल भनि सूक्ष्मनि नारी । गेह पन्थ ब्रह्म रंभको फारी ॥ तन तजिके योगी इमि जाही । परम पुरुषके रूप समाही ॥ ऐसी युक्ति गहे सुख पागी । आलस निद्रा वश दुर्भागि ॥ छन छन ऐसी युक्तिको गहिये । यही उनिषद देखत रहिये ॥ जो यह युक्ति न हरदम होई । निश्चय तीन काल कर सोई ॥ भोर मध्य दिन सायंकाला । नितप्रतिगहि लीजै यह चाला ॥
इति
अथ अष्टसिद्धियोंके नाम चौपाई
प्रथमै अणिमा नाम कहावे । ताहि लहे लछु देह बनावे ॥ द्वितिये महिमा कहो बखानी । निज तनकी दीरघता ठानी ॥ तृतिये लघिमा जो लहिपावै । सो अपनो तन हर्क बनावै ॥ चौथे गरिमा नाम भनीजै । जो लहि निज तन भारी कीजै ॥ पंचम प्राप्ती नाम बतावो । सो लहि जहँ चाहो चलजावो ॥ पुनि प्रकामिका छठयें अहई । जाते निज मनोर्थ सब लहई ॥ सतयें ईशता नामक होई । जापर चहै आप बड होई ॥
( ८० )
बोधसागर
अठयै वशियौ नाम कहाई । जेहि चाहे तिहि देत भ्रमाई ॥ आठों सिद्धिमें भेद अनेका । जानहि योगी सहित विवेका ॥
इति
अथ नव निधियोंके नाम
दोहा-महापद्म अरु पद्म कह, कच्छप मकर मुकुंद । खर्ब शंख अरु नील कह, नवम कहावे कुंद ॥
इति
अथ योगी भेष वर्णन-चौपाई
शैली सिंगी मुद्रा काना । भगवौ वल्ल विभूत है बाना ॥ योग युक्ति साधन भल राखा । अजपा जाप जपे गति भाषा ॥
क० भा० प्रकाशसे
इति श्री आगमनिगमबोध समाप्त
श्रीबोधसागरे-
सुमिरनबोध
भारतपथिक कबीरपंथी
स्वामी श्रीशुगलानन्द द्वारा संगृहीत
मुद्रक व प्रकाशक-
गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, अध्यक्ष-“लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर” स्टीम-प्रेस, कल्याण-बम्बई.
मुद्रणकारि वर्षाधिकार “बीवेङ्कटेश्वर” मुद्रणवन्नालवाटवदके मबीन है।
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सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
ॐ
A faint, stylized illustration of a seated deity, possibly Lord Venkateswara, holding a conch shell and a lotus flower, with a crown-like structure above the head.
venkateswara
सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्तपुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन, धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवलनाम अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्कनाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दयानामकी दया, वंश- व्यालीसकी दया
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अथ श्रीबोधसागरे
सुमिरनबोध प्रारंभः
(छोटा)
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चतुर्विंशस्तरङ्गः
प्रथम बोध
( नित्य कर्म षट्कर्म विधि वर्णन ) सुमिरन आदि गायत्री आदिगायत्री सुमिरण सार । सुमिरन हंस उतारे पार ॥ कोटि अठासी घाट हैं, यम बैठे तहाँ रोक । आदि गायत्री सुमिरिके हंसा होय निशोक ॥
( २ )
बोधसागर
घाटी नाकहि आगे तब जाई । सकल दूत रहे पछताई ॥ आगे मकरतार है डोरी । जहाँ यम रहे मुख मोरी ॥
ओहं सोहं नामके, आगे करै पयान ।
अजर लोक बासा करे, जगमग दीप स्थान ॥
मुख सागर स्नान करी, होय हंसका रूप ।
जाय पुरुष दर्शन करै जिस दिन परम आनन्द ॥
आदि गायत्री सुमिरिके, आवागमन नसाय ।
सत्य लोक बासा करे, कहैं कबीर समझाय ॥
सुमिरन प्रभात गायत्री
आदिगायत्री अम्बर अस्थान । सोहंतत्त्व ले हंसालोक समान ॥
सत गायत्री अजपा जाप । कहैं कबीर अमर घर बास ॥
सत्य है अमर सत्य है शून्य । सत्यहिमें कछु पाप न पुण्य ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदास । यह गायत्री करो प्रकाश ॥
सुमिरण मध्याह्न गायत्री
अचित्त पुरुष हिरम्ब छाया । नाद बिन्द होय कर्ता आया ॥
यमसो जीता लोक पढाया । सुरति स्नेही हंस कहाया ॥
अचिन्त पुरुषी गायत्री, दीन्ह कबीर बताय ।
निशिदिन सुमिरण जो करै, करम भरम मिटि जाय ॥
सुमिरण सन्ध्या गायत्री
बारह जोजन कोट, यन्त्र जहैं पल्ले छूटे ।
यहि विधि सन्ध्या जपे, भर्मको आगम टूटे ॥
गायत्री ब्रह्मा जपे, जपे देव मदेश ।
गायत्री गोविन्द पढे, सतगुरुके उपदेश ॥
ताको काल न खाय, जो संज्ञा चीन्हे ।
घटमें रही अलोप, काठि हम बाहर कीन्हे ॥
सुमिरनबोध
( ३ )
इन पर ले सिद्धौ भनी, देव पूजा गो शरीर । ब्रह्मा बाचा पुत्र दासा, चपलान उग्र हंसनी शरीर ॥ शब्द पाय हिरदय धरे अस कथिक है कबीर ।
सुमिरन मध्याह्न गायत्री
कहैं कबीर अजपा घटे सूझे । निगम नाम मोहि जो बूझे ॥ तन मन धनहिं निछावर करै । सार नाम गहिभौ जल तरै ॥ अष्ट सिद्धिनौनिद्विमांगेसोदेऊँ । खुरासानखुरवेदमुखगंगाप्रवाहु ॥ रिप सिप मार गर तराई । नौगुनघरजासुरतिप्रकटहोवसूझे ॥ खौजो सुरति कमलके तीर । सतगुरु मिल गये सत्य कबीर ॥
सुमिरन सोनेका
संयम नाम सदा चितलाई । जासों काल दगा मिटिजाई ॥ काल दगा धरि आवे भेखा । जीव चुके धरतीकी रेखा ॥ सोवत समय जो मारे तारी । सत सुकृत करै रखवारी ॥ कहै कबीर बंकेज बुझाई । सोवत जीव नष्ट नहिं जाई ॥ अमर पिछौरी ओढिकै, सुख मण्डलमें सोय । कबीर ऐसे गुरु पाइके, कहा मुक्तिको रोय ॥ उत्तर करो सिराना, पश्चिम कीजै पीठ । कहैं कबीर धर्मदाशसों, यमकी लंगै न दीठ ॥
सुमिरन प्रातः उठनेका
जो स्वर चले प्रात संचारी । सोय पग धरि उठो संभारी ॥ दिवस समस्त हर्ष सो बीते । जहाँ जाय सो कारय जीते ॥ पुढुभीमें पग दीजिये, सुनो सन्त मति धीर । कर जोरे बिन्ती करो, दर्शन देहु कबीर ॥
सुमिरन दिशा जानेका
अन्न सकल तन पोख, शब्द सुरति सो पेख । सूक्ष्म लगन उतारो, काया निर्मल होय हमार ॥
( ४ )
बोधसागर
कहैं कबीर यही तत्सार । चौरासी सो जीव उबार ॥
सुमिरन मलद्वार धोनेका
सुरतिसंतोषसूमसजबभयाउतार । बांयेकर परसै जलद्वार ॥
सतगुरु शब्द गहोमति धीर । कहैं कबीर होय पाक शरीर ॥
सुमिरनजलपात्रका
धर्मराज मैं तुम्हैं बुझाऊँ । जल पत्रका भेद बताऊँ ॥
जलपात्रको गहिके, उत्तम करो बनाय ।
कहैं कबीर निर्मल भये, संशय भ्रम मिटिजाय ॥
सुमिरन तूँबा प्रक्षालनेका
तत्तत्तत्का तूँबा, शब्दे लियो समोय ।
कहैं कबीर धर्मदाससों, तूँबा निरमल होय ॥
सुमिरन हाथ मटिआवनेका
माटी खाक माटी पाक । माटी मैं माटी गर्पाक ॥
कहैं कबीर हम शब्द सनेही । सत्त शब्दसों पाक होय देही ॥
मृत्तिका लेव हाथ लगाई । अजर नाम सुमिरो चितलाई ॥
मृत्तिका लीन्हों हाथमें, निर्मल भया शरीर ।
कर्म भ्रम सब मेटिके, सुमिरो सत्य कबीर ॥
सुमिरन दातौन तोरनको
धन्य वृक्ष जिन दातौन दीन्ह। साधु संतपर दाया कीन्ह। ॥
दाया कीन्ह भया प्रकाश । रक्षा करें कबीर धर्मदास ॥
सुमिरन दातौन करनेका
सत्तकी दातौन संतोषकी झारी । सत्त नामले घसो विचारी ॥
किया दतौन भया प्रकाश । अजर नाम गहो विश्वास ॥
अमी नामते पहुँचे आय । कहैं कबीर सतलोक सिधाय ॥
सुमिरनबोध
( ५ )
सुमिरन दातौन फारनेका
फटी दतौन भया प्रकाश । अजर अमर कबीर धर्मदास ॥
सुमिरन मुख धोनेका
मुख परसे मुक्तायनि वासा । जिनके परसत लोक निवासा ॥
लैं जल मुख माहि चढावे । अम्बुन नाम हिरदे लौलावे ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदास । सो हंसा सतलोक निवास ॥
सुमिरन अमरि उतारनेका
अमरी अमर लोक सो आई । तीन लोकमें निर्भय भई ॥
तन शोधो मन राखो धीर । अमरी उतारो स्वारी नीर ॥
कहैं कबीर अमर भई काया । निज शब्द अमीका आया ॥
सुमिरन जलमें पैठनेका
जो साहब दाया कर पाऊँ । कर वन्दी जल मांझ समाऊँ ॥
पान निहपान सतगुरु शब्द प्रमान
सुमिरन स्नान करनेका
अमी सरोवर ज्ञान जल, हंसा पैठ नहाय ।
काया कंचन मन मगन, कर्म भर्म मिटिजाय ॥
पिंडे सो ब्रह्मंडे जान । मान सरोवर कर ज्ञान ॥
सोहं हंसा ताको जाप । कहैं कबीर पुन्य नहिं पाप ॥
ऐसी विधि करे ज्ञान । सोहंसा सतलोक समान ॥
सुमिरन ज्ञान करके बन्दगीको
नहाय खोरके शीश नवाई । अलख पुरुषके दर्शन पाई ॥
अमी शब्दको कीजे जाप । कहैं कबीर अमरघर बास ॥
सुमिरन कोपीन पहिरनेका
पारा राखे गुरु हमारा ।
बारह बरष की कन्या आई । उलटा पारा रह्यो समाई ॥
( ६ )
बोधसागर
ऊपर बन्दी छोर विराजे । पारा खसे तो सतगुरु लाजे ॥ सत्तकी कोपीन ब्रजका धागा । गुरु प्रतापसो बन्धन लगा ॥ कहैं कबीर तजो अभिमान । पारा खसेतो सतगुरुकी आन ॥
सुमिरन जल भरनेका
जीव जन्तु सब दूर पराऊ, भरिहौ निर्मल नीर । हत्या पाप लागे नहीं, रक्षा करै कबीर ॥
सुमिरन जल छाननेका
अमृत जल निर्मल कर छाना । सतगुरु साहबके मन माना ॥ कहैं कबीर भरम सब भागा । टूटचो जबै पुरानो धागा ॥
सुमिरन तिलक करनेका
तत्त्व तिलक तिहुँ लोकमें, सत् नाम निज सार ।
जन कबीर मस्तक दिये, शोभा अगम अपार ॥
पार कोई विरले पावै । पार पावै सो संत कहावै ॥
योगी संकट बहुरि न आवै । कहैं कबीर सतलोक सिधवै ॥
सुमिरन दर्पण देखनेका
दर्पणमें मुख देखिये, कबहीं न होय चितभंग ।
गुरुको बचन संतकी सेवा, चढे सवाया रंग ॥
सुमिरन चरणामृत महाप्रसाद पानेका
चरणामृत महाप्रसाद जोलीन्हौ । सत्य शब्दका सुमिरन कीन्हौ ॥
अर्ध उर्ध मध्य धर ध्याना । कहैं कबीर सो संत सुजाना ॥
सुमिरन चरणामृत देनेका
हो साहब मैं बिन्ती लाऊँ । कौन नामते पग पखराऊँ ॥
दहिने पग प्रथम ही जलनावे । बल हमार सो पग पखरावे ॥
शब्द सार निर्मौलिक सारा । पग पखराओ हंस हमारा ॥
यहि विधि पग पखराओ भाई । दगा धोख सब दूर पराई ॥
सुमिरनबोध
( ७ )
साखी-अजर नामको सुमिरन, चीन्हे हंस हमार ।
कहैं कबीर धर्मदास सो, शीश न आवे भार ॥
सुमिरनमहाप्रसाद देनेका
पके अन्नको त्रासन कीजै । पांच तत्त्वको भोजन दीजै ॥
जबे जीव मांगे प्रसाद । अजर नामको कीजै याद ॥
एक रवा हाथमें लेवे । महाप्रसाद दासको देवे ॥
महाप्रसाद एक धनीको, जाको सब विस्तार ।
मूरख लेख न पावै । कहैं कबीर बिचार ॥
सुमिरन महाप्रसाद पानेका
एक रवा हाथमें लीन्हा । उग्रनामका सुमिरन कीन्हा ॥
महाप्रसाद ऐसी विधि पावै । यमकी दसी निकट नहिं आवै ॥
उग्र नाम हृदय लौलाई । ऐसी विधि प्रसाद जो पाई ॥
साखी-कहैं कबीर धर्मदाससो, महाप्रसाद जो लेय ।
काल दसी सब टूटे, यमहि चुनौटी देय ॥
सुमिरन चरणामृत पानेका
चरणामृत शिष्य जो लेई । अम्बुज नाम हृदय चित देई ॥
लागे नहीं कालकी छाहीं । चरणोदक जो होय सहाई ॥
ऐसी विधि चरणोदक लेई । यमहिं चुनौटी निसिदिन देई ॥
ले चरणोदक माथ नवावै । तीन दण्डवत तब पहुँचावै ॥
साखी-कहैं कबीर धर्मदाससो, यह शिष्यको व्यवहार ।
दगा धोख सब मेटो, हंस उतारो पार ॥
सुमिरन जलपीनेका
उत्तम शीतल निर्मल नीर । अमृत पिय तिरषा गई दूर ॥
सत्यगुरु मिल गये सत्यकबीर । भागो काल विषमके तीर ॥
( ८ )
बोधसागर
सुमिरन घर बुहारनेका
सुमति बुहारी कर गहि लीना । कचरा कुमति दूर कर दीना ॥ बावन लाख दगा मिटि जाई । साहबकबीरकी फिरी दुहाई ॥
सुमिरन घर पोतनेका
हरियर गोबर निर्मल पानी । चौका पोते सुकृत ज्ञानी ॥ सवा लाख चूक बकसाये । चौका पोत जेवनार चढाये ॥ कहैं कबीर सुनो धर्मदास । हंसा पहुँचे पुरुषके पास ॥
सुमिरन चूल्हामें अग्नि बारनेका
चूल्हा हमारे चौहटे, सब घर तपे रसोइ । सत सुकृत भोजन करे, हमको छूत न होइ ॥
सुमिरन रसोई बनानेका
सुत सुकृत कीन्हा जेवनारा । ताते करत न लागे बारा ॥ सतघरी दो पहरि यां सांझा । लक्ष्मी बैठी रसोई मांझा ॥ सत् पकवान लक्ष्मी करे । तीनलोकका उदर भरे ॥ कहैं कबीर लक्ष्मी समुझाय । संत सुहेला बैठे आय ॥
सुमिरन थारी परोसनेका
चन्दन चौका कंचन थारी । हीरालाल पडुमकी झारी ॥ बहुत भांति जेवनार बनाये । प्रेमप्रीति सो पारस कराये ॥ संत सुहैला भोजन पाई । सत्सुकृत सतनाम गुसाई ॥
सुमिरन प्रसाद अर्पणेका
संत समाज धरती स्थूला । प्रसाद चढावें धर्म निर्मूला ॥ ओढे साल क्षमाके दीन्हा । सोई शब्द जो पावै चीन्हा ॥ नीर निरंतर अन्तर नेह । शब्द अगाध जो लागे देह ॥ कहैं कबीर चितजित जनि डरो । नाम सुमिरि जल अर्पण करो ॥
सुमिरनबोध
( ९ )
सुमिरन अचवन करनेका
करि प्रसादजल अचवन कीन्हा । अचवन करिकै खर्चा लीन्हा ॥ दूत भूत सब गये पराय । जब टेके सतगुरुके पाय ॥
सुमिरन पाकर बन्दगी करनेका
बारी तेरी बलगई, पलमें सौ सौ बार । सद्गुरु मोपर दाय़ा करो, साहबकबीर सिरजनहार ॥
सुमिरन सुपारी मोरनेका
सेत सुपारी मोरके, अमीअंक लौलाय । कहैं कबीर धर्मदाससे, हंस लोकको जाय ॥
सुमिरन पान खानेका
गुरुकबीरने बीरा दीन्हौं । हँस बचाय कालसो कीन्हौं ॥ सत्य लोकमें बैठे जाई । सत् सुकृत जहाँ पाप रहाई ॥ कहैं कबीर जे हंस उबारे । जरा मरण भव कष्ट निवारे ॥
सुमिरन टोपी लगानेका
तरे धरती ऊपर आकाश । चांद सूर्य दोउ पाट ॥ तेतिस कोट आगे पार । सोई जानो सतगुरुकी हाट ॥
नौनाथ चौरासी सिद्धजीत औघट बाँध ।
धर्मदासके मस्तक दीन्हा, कबीर विराजे साथ ॥
बादशाह एक खूँटका, अखंड द्रौपके भूत ।
दुवैश भूत ब्रह्माण्डके, सोई साधु गुरुरूप ॥
सुमिरन दीपक बारनेका
आदि अंत एक ज्योति है, स्थिरस्थीर है नीर ॥ आवै सत्यकबीरके शब्दकी छुरी । यम जालिमकी काटे गुरी ॥ धर्मदास कबीरके लागे पाई । बावन लाख दगा मिटि जाई ॥
( १० )
बोधसागर
सुमिरन आसन करनेका
सत्त पुरुषको सुमिरिके आसन करे बनाय । तापर हंसा पोढई, कबीर धर्मदास सहाय ॥
सुमिरन कमर कसनेका
धर्मदास कसना कसे, नाम पान लियहाथ । सत्यकबीर पहुँचावहीं, सकल सन्त लिय साथ ॥
सुमिरन रस्ता चलनेका
शिरपर साहब राखिके चलिये आज्ञा माँहि । आगे साहेब कबीर हाँकदेत हैं, तीनलोक डरनाहिं ॥ कागकागरे विकार कूकरामंजार । नाग नाहर दूत भूत बट पार ॥ सबको बांधि कबीर आन घाट ले डार । घाट बाट बन औघट मोहि खसमकी आस । मते चले कबीरके कबहू न होय निवास ॥
सुमिरन सात शिकारीका
अमीनाम, ऊर्द्ध नाम परिमल नाम, दयावन्त, बालदीप सहज मूल अग्रमुनि सतनाम, साहबके अमीनाम, पुष्प सुगंधकंठकीसिलानिगम्यसुगंधयोगजीतनिहंगमित ।
इति श्री पट्टकर्म विधि नित्यकर्म सुमिरन
सत्यमुक्त, आदिअदली, अजर अचिन्त, पुरुष, मुनींद्र, करुणामय, कबीर सुरति योग, संतायन, धनीधर्मदास चुरामणिनाम, मुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवलनाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक नाम, पाकनाम, प्रगट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दयानामकी दया, वंश- व्यालीसकी दया ।
★
अथ श्रीबोधसागरे- सुमिरनबोध प्रारंभः
★
पञ्चविंशस्तरङ्गः
द्वितीय बोध
(गुरुआई विधिके सुमिरन)-सुमिरन चौकाके अजर गायत्री
अजर गायत्री अजपान । अजर चौका अजर नाम ॥
अजर सिंहासन है परवान ।
अजर थार भराये तहाँ । अजर पुरुष गवन किये जहाँ ॥
( १२ )
बोधसागर
अन्न नारियर सन्मुख धरिया । सुर्त सुपारी आगे विस्तरिया ॥ लौंग इलायची जहवां फरी । लौकी लौंग सोध बिस्तरी ॥ ज्ञान ध्यानकी केशर गारी ।
अग्र विचार परममत दिया । अमी अंक तामें कर लिया ॥ अन्न अमर पाटंबर ताना । अग्र सुगंध महाँ परवाना ॥ अजरपुरुषबैठेसिंहासनसम्हारी । संग हंस शोभा अधिकारी ॥ अजर आरती बहुविधि साजी । नानारंग तरंग विराजी ॥ उमगे प्रेम ज्ञान तह छाया । हंसा सोहंगम चौर दुराया ॥ उठे तरग बहुत विधि बानी । अमी अमृतकाशसाहिसमानी ॥ दुविधा हुरमत दूर बढाई । प्रीति मिठाई थार भराई ॥ जगमग ज्योति रही ठहराई । परमल हंसा रहो समाई ॥ झमके तहवां नूर अपारा । गरज शब्द चहुँ और धारा ॥ चन्द्र सूर जहँ गम नहि पावा । सकल हंस वसन सुख आवा ॥ कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । यह छबिदेखतजगतहोउदासा ॥ हिम्मत प्रीतिसों आरती साजो । इत उत चित नेक नहि राजो ॥
अन्न गायत्री नामकी, येही मुक्तिको मूल ।
धर्मदास हटके गहो, जहाँ अन्न अस्थूल ॥
राजद्वारे जिन कहो, पण्डित सुन करे वाद ।
सो हंसा सतलोकके, लेहि शब्द पहिचान ॥
अन्न गायत्री तुमको दीन्हौँ । एतीदयाहम तुमपर कीन्हौँ ॥
नाहीं सुमिरन जिह्वा आवा । अघर निरन्तर ध्यानलगावा ॥
गायत्री भेद जाने कडिहारा । चौका निर्णय करै विचारा ॥
कहैं कबीर गायत्री कलसान । अजर अमर धरमूलठिकान ॥
सुमिरन अंशनके नाम बैठक पूजा
प्रथम रूप पीठपर चौका ।
सहज अंशकी बैठक मूलकरी । पूजा खडी सों चौका पोते ॥
सुभिरनबोध
( १३ )
सुजन जन अंशकी बैठक अग्रदीप, पुजा चन्दनको छरका ॥ भृङ्गमुनि अंशकी बैठक मंजुल करी, पूजा गादी चँदेवा ॥ अंश पक्षपालनकी बैठक पोहप दीप, पूजा फूलमाला अंगोछा ॥ अंश श्रवण लीलाकी बैठक जगमग दीप, पूजा चोला धोती ॥ अंश सर्वांग सूर्तकी बैठक अचिन्त दीप, पूजा थारी कटोरी ॥ भावनाम अंशकी बैठक उदै दीप' पूजा दाख सहत ॥ सूर्त सुभाव अंशकी बैठक ज्ञानदीप, पूजा बदाम मरिच अवीर ॥ अक्षर सुभाव अंशकी बैठक पालंग दीप, पूजा केरा फूल ॥ सन्तोष सुजन अंशकी बैठक अक्षयदीप, पूजा मिश्रि अष्टमेवा ॥ कदल ब्रह्माकी बैठक सुखसागर दीप, पुजा सुपारी छोहारा ॥ दयापाल अंशकी बैठक आदि दीप, पुजा झारी अष्ट सुगन्ध ॥ जलरंग अंशकी बैठक पताल पांजी पूजा, पान खरचा माला ॥ प्रेम अंशकी बैठक झँझरी दीप, पुजा घृत कपुर ॥ अष्टांगी अंशकी बैठक मानसरोवर, पुजारिष्ट भोग विलास ॥ प्रथम चार चौका ताके मध्य सिंहासन ।
पान मिष्ठान्न नारियल पुरुषको भोग घृत पक्वान ॥
उत्तर दिशा जम्बूद्वीप गुरु धर्मदास गोसाँई आरती ज्योति प्रकाश ॥ पूर्व दिशा गुरुराय बंकेज गोसाँई कलश पांचौ वाती प्रकाश ॥ दक्षिण दिशा गुरु चतुर्भुज गोसाँई दलकीझारी पांचपानखरचा साथ ॥ पश्चिम दिशा गुरु सहेते जी गोसाँई पास न बंशागादी ॥ इतनी विस्तार पुरुषसों ज्ञानी लगि । अपने अपने स्थान बैठाये । सब अंशकी लाग चुकाये ॥ धर्मदास को सन्धि बताये । धर्मदास को नाम चुकाये ॥ षोडष अंश पान पर लीन्है । मुक्तामन सुरती की दीन्है ॥ कहै कबीर सुनो धर्मदास । यह भेदकडिहारसों कहो प्रकाश ॥
(१४)
बोधसागर
इतना भेद कडिहार जो पावै । आप चले औ जीव बचावै ॥ धर्मराय है चौका माही । वह देखे सबके चतुराई ॥ सुनो धर्मदास चौका गुप्त हैं । ताकी सन्द्य प्रकट है ॥ चार गुरुकी बैठक पूजा न्यारी न्यारी है ।
चार दिशा कायमें हेली । चार दिशा बाहरेली ॥ एक एक गुरुके आठआठपूजाहै । चार गुरुके बतीस साज ॥ एक एक गुरुके संगचारचारअंश है । चार गुरुके सोरह अंश ॥
साखी-इतना भेद जो जाने, सो साँचो कडिहार ।
इतना भेद नहि पावै, तेहि छलै काल बटमार ॥
चौकाबैठा फूलके, गाफिल भया निशंक ।
बिना भेद जो नारियर, मोर नाशिर चढ़ै कलंक ॥
झूलों काल हिडोरना, नहि जाने शब्दका तोल ।
कहै कबीर धर्मदाससो, मम खाली परे न बोल ॥
सुमिरन बड़ी इकोचरी
अजर अचिन्त्य अकह अविनाशी । आदि ब्रह्मा अमरपुर वासी ॥
अदली अमी अनेह अजावन सोई । आदि नाम सत्य सुकृतै होई ॥
परमानन्द है अखिल सनेही । सत्य नाम तत्पुर्ण विदेही ॥
निः कामी निर अक्षर साँचा । अजर अविगत सबहिनमो राचा ॥
अमर अपार अनन्त अभेदा । अचल अचिन्त न जाने भेदा ॥
अक्षय अगुण अगोचर कहिये । अगम अलेखगहि सतचितरहिये ॥
अभय औगाह अकथ बखाना । अम्बुज चरण औ पुरुष पुराना ॥
दीनबन्धु करुणामय सागर । दयार्सिंधु हंसन पति आगर ॥
दीनदयाल सो अधम उधारन । हिरण्यमय भवसागर तारन ॥
अरूप अथाह अनाहद राता । योगी जीत सबहिनके दाता ॥
करुणा मय संतन सुखदाई । अभय अचिन्त्य नाम गुणगाई ॥