भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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अनुरागसागर

तजिकागचाल मराल पथगहि, नीरक्षीरनिवारिके ॥ ज्ञानदृष्टिसोअदृष्टि देखे, क्षरअक्षरसुविचारिके॥२९॥ सोरठा-निह अक्षर है सार, अक्षरतै लखि पावई ॥ धर्मनि करो विचार निह अक्षर निहतत्त्व है ॥४१॥

धर्मदासवचन

धर्मदास कहे शुभ दिन मोरा । हे प्रभु दरसन पायउँ तोरा ॥ मुहि किंकर पर दाया कीजै । दास जानि मोहि यह बरदीजै ॥ निशिदिन रहो चरण लौलीना । पल इक चित्त न होवे भीना ॥ तुव पदपंकज रुचिर सुहावन । पद पराग बहुपतितन पावन ॥ कृपासिंधु करुणामय स्वामी । दया कीन्ह मोहि अंतरयामी ॥ हे साहिब मैं तव बलिहारी । आगल कथा कहो निरवारी ॥ चारखानिरचि पुनिकसकीन्ह। सो सब मोहि बतावो चीन्ह। ॥

जीवोंके लिये कालका फन्दा रचना । कबीरवचन

सुनु धर्मनि यह है यमबाजी । जेहि नहिं चीन्हे पंडितकाजी ॥ जा यम ताहि गोसइयां भाखे । तजे सुधा नर विषकहैं चाखे ॥ चारिहु मिलियह रचना कीन्ह। कच्छा रंग सु जीवहि दीन्ह। ॥ पांच तत्त्व तीनों गुण जानो । चौदह यम ता संग पिछानो ॥ यहि विधि कीन्ही नरकीकाया । मरे खाय बहुरि उपजाया ॥ ओंकार है वेदको मूला । ओंकारमें सब जग भूला ॥ है ओंकार निरंजन जानों । पुरुष नाम सो गुप्त अमानो ॥ सहस्र अठासी ब्रह्मा जाया । भा विस्तर कालकी छाया ॥ ब्रह्माते जिव उपजे बारा । तिन पुनि कथे बहुत विस्तारा ॥ स्मृति शास्त्र पुराण बखाना । तामें सकल जीव उरझाना ॥ जीवनको ब्रह्मा भटकावा । अडखनिरंजन ध्यान ददावा ॥