कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअनुरागसागर
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वेद मते सब जिव भरमाने । सत्य पुरुषको मर्म न जाने॥ निरंकार कस कीन्ह तमासा । सो चरित्र ब्रह्मो धर्म दासा॥
छन्द
असुर हैं जीवन सतावे, देव ऋषि मुनि कारकं ॥ पुनि धरि औतार रक्षक, असुर करै संहारकं ॥ जीवको दिखलाय लीला, अपनी महिमा घनी ॥ यहिजानजीवनबांधिआशा, यही है रक्षक धनी४० सो०-रक्षककला दिखाय, अन्तकाल भक्षण करे ॥ पीछे जिव पछताय, जबहि कालके मुख परे ॥४२॥ अडसठ तीरथ ब्रह्मा थापा । अकरम करम पुण्य औ पापा ॥ बारहराशि नखत सत्ताइस । सात वार पंद्रह तिथि लाइस ॥ चारों युग तब बांधे तानी । घड़ी दंड स्वासा अनुमानी ॥ कार्तिक माघ पुन्य कहिदीन्हा । यमबाजी कोइ बिरले चीन्हा ॥ तीरथ धामकी बांधि महातम । तजेन भरम न चीन्हे आतम ॥ पाप पुण्यमहैं सबै फँदावा । यहि विधिजीव सबै उरझावा ॥ सत्य शब्द विनु बांचे नाही । सारशब्द बिन यममुख जाही ॥ त्रास जानि जिव पुण्य कमावे । किंचित फल तेहि छुधान जावे ॥ जबलग पुरुष डोर नहिं गहई । तब लग योनिन फिर२लहई ॥ अमित कला जम जीव लगावे । पुरुष भेद जीव नहिं पावे ॥ लाम लोभ जिव लागे धायी । आशा बंध काल धर खायी ॥ यम बाजी कोइ चीन न पावे । आशा दे यम जीव नचावे ॥ प्रथमैं सतयुगको व्यवहारा । जीवहि यम लै करै अहारा ॥ लच्छ जीव यम नितप्रति खाई । महाअपरबल काल कसाई ॥ तसशिलानिशिदिन तहैं जरई । तापर लै जीवन कहैं धरई ॥