कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २८ )
बोधसागर
स्मरण आरती धरनेका
सत्य जीव आरती है नाम । सतगुरु शब्द सुनो परवान ॥ वोही नाममें बैठके लेहु धनीको पान । अंश वंश गुरु कीजिये ॥ देह धरो नहि आन । धीर गुरुको चीन्हके रहो सत्य मनलाय ॥ देखो खसम कबीर को हंसलोकको जाय
स्मरण चौका हाथ देनेका
करधर चौका विनती कीन्हा । तुम्हरे कहे भार हम लीन्हा ॥ अहो साहेब मोहे नहि भार । यह चौका विस्तार तुम्हार ॥ तुम जागो ओ शब्द तुम्हारा । समरथ मोहि उतारो पारा ॥
धर्मदास विनती करें, तुम हो सत्य कबीर ।
शिरके भार उतारहूँ, गहिके लावौ तीर ॥
इति श्रीस्मरण गुरुवाई भेदादि चौकाविस्तार विधि सम्पूर्ण
अथ लिख्यते स्मरण अभेद
प्रथम समरथके मुखसो सहज अंश उत्पन्न भये ताकोबीज । बुन्द दियो तामें सर्व रचना आई औ सात करी भई ॥
करीके नाम
प्रथम पोहप करी, दूसरे मूल करी, तीसरे अम्बुकरी, चौथे सुघर करी, पांचे सुखसागर करी, छटये पंकज करी, सातेमंजुलकरी । दूसरे समरथके नेत्र सो इच्छा सुर्तउत्पन्नभई ॥ ताकोजावनबुन्द दियो तासों पांच अंड भये ॥ तीसरे-समरथकेश्रवणसोमूलसुर्त उत्पन्न भई ताको अमी बुन्द दियो तासो पांच अंड पोषे तासो पांच ब्रह्म उत्पन्न भये तिनको आज्ञा दिये एक एक ब्रह्म एक एक अण्डमों आये चौथे समरकी नासिकासे सोहंग सुर्त उत्पन्न भये तासो पांच अण्ड फूटे तासों आठ अण्डभये ॥