भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

वर्तते हैं। चौथे उषमज खानमें इंगिनि वाणी, वायु, तेज, ये दो तत्त्व उषमज खानमें वर्तते हैं। पांचे अस्थावर खानमें किंगिनि वाणी जल एक तत्त्व वर्तते हैं ॥

जो इनको प्रवानजात

प्रथम चार लाख खान मानुषको। दूसरे पिंडज नौलाख जात । तीसरे अण्डज चौदह लाख जात । चौथे श्वेदज उषमज सताइस लाख जात पांचे अस्थावर तीस लाख जात ॥

अथ पुरुषसत्रथसो अंश भये तिनको नाम

प्रथम पुरुषके त्रिकुटी सो अंकुर । पुरुष नेत्र सो इच्छा । पुरुषको नासिका सोहं पुरुषके मुखसो । अर्चित तेज अंड पालंग बारह अचिन्त अंश प्रेम सुर्त । धीरज अण्डज पालंग पचीस जोहंग अंश सोहं सुर्त । छिमा अण्ड पालंग ब्यालीस अकह अंश मूल सुर्त । सत् अंगुपालंग बहत्तर सुकृत अंश इच्छा सुर्त । सुमत अण्ड पालंग चौसठ, हिरण्मय अन्त अंकुर सुर्त ॥

इति श्री सुभिरपांजी आदि षट्कर्म विधि, चौकाविधि गुरुवाई

भेदादि विस्तार विधि सम्पूर्ण