कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कबीर चरित्रबोध
( १७९५ )
दुनी कहे यह देव है, देव कहै यह ईश । ईश कहै परब्रह्म है, पूर न विश्वे वीश ॥ काजी गये कुरान ले, धर लड़केको नाँउ । अक्षर अक्षरमें पुरे, धन्य कबीर बल जाँउ ॥ सकल कुरान कबीर है, हरफ लिखे जो लेख । काशीके काजी कहै, गयी दीनकी टेक ॥ शिव उतरे शिवपुरीसे, अविगत नदन विनोद । महके कमल खुशी भया, लिया ईशको गोद ॥ नजर नजरसे मिल गयी, किया दर्श परणाम । धन्य मोमिन धन्य पूरना, धन्य काशी निष्काम ॥ सात बार चर्चा करे, बोलै बालक बैनु । शिव सो कर मस्तक धरचो, ला मोमिन यक घेनु ॥ अनग्यावरको दुहतही, दूध दिया ततकाल । पीयो बालक ब्रह्म गति, वहां शिव भये दयाल ॥ कष्ट मानुषके जब भई, नित दुनिया वर देहि । चरण चले तत पुरीमें, यहि शिक्षा नित लेहि ॥
जब काशीके सब काजियोंको यह समाचार मिला तब वे इस समाचारको सुनकर बड़े ही चिन्तित हुए कि, यह कैसा आश्चर्य अद्भुत व्यापार है कि, समस्त कुरानमें कबीर ही कबीर दिखाई देता है । अब कौन उपाय करना चाहिये कि, ऐसे दरिद्री जोलाहेके पुत्रका इतना बड़ा नाम न रखवा जावे । फिर फिर कुरान खोलकर देखते तो यही चारों नाम निकलते । इन चारों नामोंके सिवाय और कुछ नहीं निकला । तब काशी- के काजियोंने आपसमें सम्मति की और नीरूसे कहा कि, ऐ नीरू ! तू इस बालकको अपने घरके भीतर लेजाकर मार