भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1874

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बोधसागर

१२

खपा । तब वह जोलहा कबीर साहबको अपने घरके भीतर ले गया और उनको छुरीसे काटने लगा, छुरी एक ओरसे दूसरी ओर पार निकल गई न कोई घात हुआ और न लोहूका एक बूँद ही निकला और न गले पर कोई चिह्न हुआ । नीरू यह आश्चर्यमय वृत्तान्त देखकर एकदम डर गया और थर थर कौपने लगा उसके हाथसे छुरी गिर गयी और वह अचेत सा हो गया । तब कबीर साहब बोले कि, ऐ नीरू ! मेरा कोई माता पिता नहीं है, न मैं उत्पन्न होता हूँ, न मरता हूँ, न सुझको कोई मार सकता है, न मैं किसीको मारता हूँ । और न मेरा शरीर है न मेरे मांस चर्म हड्डी और रक्त है और मैं स्वयंप्रकाश हूँ । यह बात सुनकर जोलाहा अत्यन्त भयभीत हुआ । अन्तमें विवश होकर जब यह वृत्तान्त प्रकट हुआ तब कबीरही नाम ठहराया । किसीका कुछ वश न चला कि, उसको बदल सके ।

बाललीला

बिना भोजनादि किये ही कबीर साहबका शरीर बड़ा होता जाता था और दिन प्रति आपका तेज तथा प्रताप बढ़ता जाता था । जब जोलाहा जोलाहीने देखा कि, बालक तो कुछ भोजन करता नहीं है तब वे अपने मनमें अत्यन्त चिन्तित होकर कहने लगे कि ऐ कबीरजी ! आप कुछ भोजन करो यदि आप अन्न न खाओगे तो हम भी नहीं खायेंगे । तब कबीर साहबने उत्तर दिया कि, ऐ नीरू ! गायकी एक कुवारी बछिया और कुम्हारके घरसे एक कोरा बरतन ले आओ । कबीर साहबकी आज्ञानुसार नीरू गया और कोरी बछिया ढूँढ़कर और कुम्हारके गृहसे एक बरतन ले आया । तब कबीर साहबने उससे कहा कि, इस बछियाको मेरे सामने बांध दो और उसके स्तनोंके नीचे