कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
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साहब ब्राह्मणोंको उत्तर देते कि, हम तो ताना तनते हैं, जनेऊ तुम्हारा किस प्रकार हुआ ? और गोविंद और राम तो हमारे हृदयमें बसते हैं, तुम्हारे कैसे हुए । तुम तो गीता पढ़ते हो और सांसारिक धनके निमित्त सदैव धनाढ्योंके द्वार द्वार पर दौड़ते और भटकते रहते हो, हम तो गोविंदके अतिरिक्त और किसी अन्यको नहीं जानते हैं । इतना सुनकर ब्राह्मण निरुत्तर हो जाते फिर तो हिन्दू तथा मुसलमान दोनों आपके साथ वाद विवाद किया करते और सब परास्त होने लगे । जब साधुओंने देखा कि, यह लड़का तो बड़ा ज्ञानी है, तब वे लोग पूछते कि, कबीरजी आपका गुरु कौन है, उस समय तो आपका कोई गुरु नहीं था-इस प्रश्नपर आप निरुत्तर निस्तब्ध हो जाते । तब साधु लोग आपको ताना मारते कि, बिना गुरुके तुम्हारा ज्ञान किसी काम नहीं आवेगा-और न बिना गुरुके किसीको मुक्ति मिलेगी, तुम्हारा यह सब वार्तालाप तथा ज्ञान व्यर्थ है । जब साधु लोग कबीर साहबपर इस प्रकार कटाक्ष करने लगे तब आपने रामानंद स्वामीको गुरु करनेका संकल्प किया । जिस समय आपने स्वामी रामानंदको गुरु करनेका संकल्प किया उस समय आपको प्रकट हुए पूरे पाँच वर्ष हो चुके थे और आपकी प्रसिद्धि भारतके बहुत भागोंमें हो चुकी थी ।
आप रामानन्द स्वामीके पास गये और विनय किया कि, स्वामीजी ! मुझको दीक्षा देकर अपना शिष्य कीजिये और मुझसे गुरुदक्षिणा लीजिये मुझपर कृपा कीजिये । यह बात सुनकर स्वामीजीने उत्तर दिया कि, मैं श्रद्धको दीक्षा नहीं देता ।
रामानन्द स्वामी और कबीर साहबकी वार्तालापका वृत्तान्त
भक्ति द्रावड देश थी, यहाँ नहीं एक विरक्ष ।