कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1877, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें१५
कबीर चरित्रबोध
( १७९९ )
टूँढते-टूँढते हैरान हो गये ? तब कबीर साहबने उत्तर दिया कि, तुमने महापाप किया कि, गऊको जबह करवाया । जोलाहा जोलाही अनेक सौगंधें खाने लगे कि, हमने यह कार्य नहीं करवाया बरन् हमें इस बातकी तनिक भी सुधि नहीं है, यह कार्य काजीका है जब उन दोनोंने बहुत कुछ प्रार्थना तथा बिनती की तब कबीर साहबने दोनोंको निर्दोष समझकर उनके घर पर गये ।
जब आप छोटे २ बालकोंके साथ खेलते थे तब “राम राम” “गोविंद गोविंद” “हरि हरि” कहा करते थे तब सुसलमान लोग सुनकर कहते थे कि, यह बालक कट्टर काफिर होगा । तब उनको कबीर साहब यह प्रत्युत्तर देते थे कि, काफिर वह होगा जो दूसरोंका माल लूटता होगा, काफिर वह होगा जो कपट-भेष बनाकर संसारको ठगता हो, काफिर वह है जो निर्दोष जीवोंका प्राणनाश करता होगा, काफिर वह होगा जो मांस खाता होगा, काफिर वह होगा जो मदिरा पान करता होगा और काफिर वह होगा जो दुराचार तथा बटमारी करता होगा मैं किस प्रकार काफिर हूँ ।
साखी-कबीर साहब
गला काटकर बिसमिल करें, ते काफिर बेबूझ ।
औरनको काफिर कहैं, अपना कुम्भ न सूझ ॥
कुछ दिनके बाद कबीर साहबने गलेमें यज्ञोपवीत डाल लिया और अपने माथेपर तिलक लगा लिया, तब ब्राह्मण देखकर कहने लगे कि, यह तो तेरा धर्म नहीं है तूने वैष्णव वेष कैसे बनाया ? तू राम राम गोविंद गोविंद नारायण नारायण कहता है-यह तो मेरा धर्म है तेरा धर्म नहीं । तब कबीर