कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कबीर चरित्रबोध
( १८०३ )
दास गरीब अदत्त है, तैं जो कहा जगदीश ॥ जड़िहों हाथ हथकड़ी, गले तौक जञ्जीर । दास गरीब परख बिना, यह वाणी गुणगीर ॥ परख निरख नहिं तोहिको, नीच कुलीन कुजात । दास गरीब अकल बिना, तू जो कही क्या बात ॥ हे बालक नीचा कला, तुमही बोलो ऊँच । दास गरीब पलक धरि, खबर नहीं हम कूँच ॥ महँके बरन खलास करि, सुन स्वामी परवीन । दास गरीब मनी मरी, मैं आजिज आधीन ॥ मैं अविगत गतिसे परें, चार वेदसे दूर । दास गरीब दशों दिशा, सकल सिंधु भरपूर ॥ सकल सिन्धु भरपूर हूँ, खालिक हमरो नाउँ । दास गरीब अजात हूँ, तेजि कहा बलि जाउँ ॥ जात पाँत मेरे नहीं, नाहिं स्त्री नहिं गाउँ । दास गरीब अनन्य गति, नहीं हमारे नाउँ ॥ नाद बिन्द मेरे नहीं, नहीं गोद नहिं गात । दास गरीब शब्द सजग, नहीं किसीका साथ ॥ सब सङ्गी बिछरू नहीं, आदि अन्त बहु जाहिं । दास गरीब सकल बसौँ, बाहर भीतर माहिं ॥ हे स्वामी मैं सृष्टिमें, सृष्टि हमारे तीर । दास गरीब अधर बसूँ, अविगत पुरुष कबीर ॥ अनन्तकोटि सलिता बड़ो, अनन्तकोटिधर ऊँच । दास गरीब सदा रहूँ नहीं हमारे कूँच ॥ पुहमी धरनि अकाशमें, मैं व्यापक सब ठौर । दास गरीब न दूरसा, हम सम तुल नहिं और ॥