भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1882

( १८०४ )

बोधसागर

२०

मैं माया मैं काल हूँ, मैं हंसा मैं वंश । दास गरीब दयाल हम, हमहीं करें विध्वंस ॥ ममता माया हम रची, काल जाल सब जीव । दास गरीब प्राण पद, हम दासा तन पीव ॥ हम दासनके दास हैं, कर्ता पुरुष करीम । दास गरीब अवधूत हम, हम ब्रह्मचारी सीम ॥ हम मौला सब सुल्कमें, सुल्क हमारे माहिं । दास गरीब दलाल हम, हम दूसर कछु नाहिं ॥ हम मोती मुक्ताहल, हम दरिया दरवेश । दास गरीब हम नित रहें, हम तजि जात हमेश ॥ हमहीं लाल गुलाल हैं, हम पारस पद सार । दास गरीब अदालतंग, हम राजा संसार ॥ हम पानी हम पवन हैं, हमहीं धरणि अकाश । दास गरीब तत्त्वपञ्चमें, हमहीं शब्द निवास ॥ सुनु स्वामी सत भाखहूँ, झूठ न हमरो रञ्ज । दास गरीब हम रूप बिन, और सकल परपञ्ज ॥ हम रोवत हैं सृष्टिको, जो रोवति है मोहिं । दास गरीब वियोगको, और न बूझे कोइ ॥ मैं बूझूँ मैं ही कहूँ, मैं ही किया वियोग । गरीब दास गलतान हम, शब्द हमारा योग ॥ चारों रुकुनमें हम फिरेँ, नहिं आवें नहिं जाउँ । गरीब दास गुरु भेदसे, लखे हमारा ठाउँ ॥ रजगुण सतगुण तमगुण, रजबीरज हम कीन्ह । गरीब दास हम सकलमें, हम दुनियाँ हम दीन्ह ॥ लगी महम गनीम पर, काल कटक कट कन्त ।