भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कबीर चरित्रबोध

( १८०५ )

गरीबदास निर्भर कहैं, जो कोई नाम जपन्त ॥ मैं बालक मैं बृद्ध हूँ, मैही जवों जमान । गरीबदास निज ब्रह्म हूँ, हमही चारों खान ॥ गगन शून्य गुसा रहूँ, हम परकट परवाह । गरीबदास घट घट बसूँ, विकट हमारी राह ॥ आवत जात न दीसहूँ, रहता सकल समीप । गरीबदास जलतरैंग ज्यों, हमहिं सागरसीप ॥ गोता लाऊँ स्वर्गमें, फिर पैठूँ पाताल । गरीबदास टूँढत फिरैं, हीरे माणिक लाल ॥ इस दरिया कङ्कर बहुत, लाल कहीं कहिं ठाउँ । गरीबदास माणिक चुगूँ, हम मरजीवा नाउँ ॥ बोले रामानन्दजी, हम घर बड़ा सुकाल । गरीबदास पूजा करें, मुकुट फई जद माल ॥ सेवा करो सम्हालके, सुन स्वामी सुरज्ञान । गरीबदास शिरधर मुकुट, माला अटकी जान ॥ स्वामी घुंडी खोलके, फिर माला गले डार । गरीबदास इस भजनको, जानत हैं करतार ॥ डचोढ़ी परदा दूरकर, लीना कण्ठ लगाय । गरीबदास गुजरी बहुत, बदनन बदन मिलाय ॥ मनकी पूजा तुम लखी, मुकुट माल परवेश । गरीबदास किनको लखे, कौन वरन क्या भेष ॥ यह तो तुम शिक्षा दयी, मान लिये मन मोर । गरीबदास कोमल पुरुष, हमरो बदन कठोर ॥ हे स्वामी तुम स्वर्गकी, छोड़ो आशा रीत । गरीबदास तुम कारणे, उतरे शब्द अतीत ॥