कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1884, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १८०६ )
बोधसागर
२२
सुन बच्चा मैं स्वर्गकी, कैसे छौँट्टै रीत । गरीबदास गुदड़ी लगी, जन्म जात है बीत ॥ चार मुक्ति वैकुण्ठमें, जिनकी मोरे चाह । गरीबदास घर अगमक, कैसे पाऊँ थाह ॥ हेम रूप जहाँ धरणि है, रत्न जड़े बहु शोभ । गरीबदास घर वैकुण्ठको, तन मन हमरो लोभ ॥ शंख चक्र गदा पद्म है, मोहन मदन सुरार । गरीबदास सुरली बजै, स्वर्गलोक दरबार ॥ दूधोंकी नदियां बहैं, श्वेत वृक्ष शोभान । गरीबदास मन्दिर मुकुट, सर्वगपुरी अस्थान ॥ रत्न जड़ाऊ मनुष सब, गण गँधर्व सब सेव । गरीबदास उस धामकी, कैसे छौँट्टै सेव ॥ चार वेद गावैं उसे, सुर नर मुनी मिलाप । गरीबदास ध्रुव पुर यश, मिट गये तीनों ताप ॥ नारद ब्रह्मा यश रटें, गावैं शेष गणेश । गरीबदास वैकुण्ठसे, और परे को देश ॥ सुन स्वामी निज मूलगति, कहि समझाऊँ तोहिं । गरीबदास भगवानको, राखा जगत समोहिं ॥ तीनलोकके जीव सब, विषय वासना भाय । गरीबदास हमको जपैं, तिसको धाम दिखाय ॥ कृष्ण विष्णु भगवानके, जहां गये हैं जीव । गरीबदास त्रिलोकमें, काल कर्म सर शीव ॥ सुनु स्वामी तोसों कहैं, अगम द्रीपकी सैल । गरीबदास डूबे परे, पुस्तक लादे बैल ॥ कहो स्वामी कहाँ रहोगे, चौदह भुवन बिहंड ।