कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कबीर चरित्रबोध
( १८०७ )
गरीबदास बीजक कहो, चलत प्राण और पिंड ॥ बोलत रामानन्दजी, सुन कबीर करतार । गरीबदास सब रूपमें, तुमही बोलनहार ॥ तुम साहब तुम संत हो, तुम सदगुरु हम हंस । गरीबदास तुम रूप विनू, और न पूजो वंस ॥ मैं भक्ता मुक्ता भया, किया कर्म कुल नाश । गरीबदास अविगत मिले, मेटी मनकी ध्यास ॥ दोनों ठौर मैं एक तू, भया एकसे दोय । गरीबदास हम कारणे, उतरे मगहर जोय ॥ बोले रामानन्दजी, सुनो कबीर सुजान । गरीबदास मुक्ती भयी, उधरे पिंड औ प्राण ॥ गोष्ठी रामानन्दसे, काशी नगर मँझार । गरीबदास जिन्द पीरकी, हम पाये दीदार ॥
कबीर वचन
रामानंद गुरुदीक्षा दीजै । गुरुदक्षिणा कुछ हमसे लीजै ॥
रामानन्द वचन
शूद्रके कान न लगौं भाई । तीन लोकमें मोर बड़ाई ॥ जब रामानंदने उत्तर दिया कि, मैं दीक्षा नहीं दूँगा, कबीर साहब चुपचाप चले आये, स्वामीजीका यह नियम था कि, चार घड़ीके तड़के गंगास्नानको जाया करते थे, एकदिन जब स्वामीजी स्नान करने चले तब कबीर साहब एक छोटे बालक- का रूप धरके स्वामीजीके पथमें जा पड़े । स्वामीजी खड़ाऊँ पहने चले आते थे, आपकी खड़ाऊँकी ठोकर कबीर साहबके शिरमें लगी, कबीर साहब रोने लगे । एक लड़केको रोते देखकर स्वामीजी खड़े हो गये, और बालकके शीशपर हाथ धरकर