कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कबीर चरित्रबोध
( १८१९ )
स्वयम् परमेश्वर हैं। आप और कबीर एक ही हैं। मैं जलनकी बीमारीसे मर रहा था, मेरे जाते हुए प्राण उसने रख लिये और मैंने घातक रोगसे आरोग्य लाभ किया।
जब बादशाहने ऐसा कहा तब शेखतकी चुपचाप अपने डेरोंको चले गये। शेखतकी और बादशाहसे जो जो बातें हुईं उन सबोंका पता लगाकर वैरियोंने अपने मतलबका अवसर पाया। जब शेखतकी अपने डेरोंमें बैठे तब वे लोग शेखतकीके पास आकर एकत्रित हुए। और ब्राह्मण तथा मुल्ला सब मिलकर कहने लगे कि, यह कबीर बड़ा काफिर है। यह हिन्दू तथा मुसलमान दोनोंकी निन्दा करता है। हम लोग गुरु तथा देवताके नामपर जो बलिप्रदान करते अथवा कुरबानी चढ़ाते और बकरी सुरगा चढ़ाते हैं उसको देखकर यह हम लोगोंको कसाई कहता है। इसको समस्त काशीवासी मानते हैं और हमारी कोई बात नहीं पूछता, यदि यह जोलाहा किसी प्रकार मारा जावे तो हमारी छातियोंपर का भारी बोझा टल जावे।
जब शेखतकीने ब्राह्मणों तथा मुसलमानोंसे ऐसा सुना तब अत्यंत प्रसन्न हुए और कहने लगे कि, जोलाहेसे और मुझसे तो पहलेसे ही वैर हो रहा है और अब तुम लोग इस बातपर उद्यत हो तो मैं निश्चय कबीरका वध करूँगा उसे कदापि जीवित न छोड़ूँगा। मेरा नाम शेखतकी है और मैं बादशाह सिकंदरका पीर हूँ। देखूं तो वह मेरे हाथसे किस प्रकार बचता है। चाहूँ तो नदीमें डुबवाऊं, चाहूं तो अग्निमें दहन कर दूं, चाहूं तो दीवारमें चुन दूं, चाहूं तो टुकड़े टुकड़े काटकर चूरा करूं और यदि चाहूं तो देगमें चुरा डालूं