कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कबीर चरित्रबोध
( १८२३ )
कुछ हुआ, उसके नेत्र रक्तवर्ण हो गये। उसने कहा ऐ कबीर ! तूने जादू किया इसी कारण जलमें नहीं डूबे। तब कबीर साहबने कहा कि ऐ शेखजी ! जैसे आप हो वैसा मुझको मत समझो, मैं जादू क्या जानूँ; मुझको तो केवल साहब नामका आधार है।
आगमें जलाया जाना
तब शेखने कहा अब आगसे बचो तब मैं आप पर विश्वास करूँगा। तब कबीर साहबने कहा कि जो आपकी इच्छा हो सो करो, अब आगमें जलाओ। तब शेखजीने बहुत सा काष्ठ मँगवाया और कबीर साहबका हाथ पाँव बाँधकर आगमें डाल दिया। उसी समय वह अग्नि बुझ गयी और बिलकुल ठंडी हो गयी।
तलवारसे काटा जाना
फिर शाहसिकन्दरने अपने पीरको बहुत समझाया कि ऐ पीरजी ! अब कबीर साहबसे आप वैर छोड़ दीजिये, पर शेखजीने इस बातको ग्रहण नहीं किया। फिर शेखजी तलवार लेकर अपने हाथसे काटने लगे-कबीर साहबकी शरीरसे तलवार इस प्रकार बाहर निकल जाती थी कि जैसे हवा, अथवा आकाशसे कृपाण निकलकर पार हो जाय। कबीर साहबके शरीर पर तनिक चिह्न भी नहीं हुआ-और न कोई रोम मैला हुआ। शेखजी मारते-मारते थक गये।
देगमें चुराया जाना
तब शेखजीने कबीर साहबको एक देगमें बंद करके और देगका सुँह भली भाँति बन्द करके अग्निपर धर दिया और स्वयं खड़ा हो देगके नीचे अग्नि जलवाने लगा। उस समय