भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

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नहीं संशय निश्चित होइ, निर्भयदास कबीर ॥ गंगाजलपर भइ आसन, बंद परे खहराय । जन कबीर सत नाम बल, निर्भय मंगल गाय ॥ शाह सिकन्दर देखही, औ ठाढ़े सब लोग । धन्य कबीर सब कोइ कहै, शेखतकी भा सोग ॥ शेखतकी तब मीजै हाथा । सूखे सुहँ नहीं आवे बाता ।

सिकन्दर वचन

शाह सिकन्दर जोर कर, कहै सुनो तुम पीर । किसको बाँध डुबावहु, निर्भयदास कबीर ॥

जब शेखतकीने कबीर साहबको इस प्रकार लोहेकी शृंखलामें जकड़कर गंगामें डाल दिया उस समय जज्जीरें गलकर जलके नीचे बैठ गईं और कबीर साहब जलके ऊपर आसन मारकर बैठे मंगल गा रहे थे ।

यह कौतुक देखकर काशीके लोग धन्य कबीर २ कहने लगे । शाह सिकंदरने अपने पीरसे कहा कि ऐ पीरजी ! आप किसको जलमें डुबाते हैं; कबीर साहब तो अच्छे जलके ऊपर बैठे हैं । उस समय शेखतकीका मुँह सूख गया और मुँहसे बात नहीं निकली । तब शेखतकीने कहा मैं जानता हूँ कि कबीरने जादू किया, इस कारण वह नहीं डूबा । यदि अबकी मैं कबीरको पाऊँ तो अग्निमें जला दूँ-यदि वह अग्निसे बच जावेगा तो मैं उसको परमेश्वरका सत्य अंश समझूंगा ।

उसी समय कबीर साहब गंगासे बाहर निकल आये और शाह सिकन्दरके निकट गये । आपको देखते ही शाह उठ खड़ा हुआ और अत्यन्त मान संभ्रम सहित कबीर साहबको अपने बराबर आसन पर बैठाया । यह देखके शेख अत्यन्त