भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कबीर चरित्रबोध

(१८२९)

कबीर चरित्र

द्वितीय भाग

आश्रय चरित्रोंका वर्णन

सम्पनभक्तकी कथा

एक बार कई संतोंको साथ लिये हुए कबीर साहब सम्पन भक्तके घर गये। सम्पनकी स्त्रीका नाम नेकी और पुत्रका नाम शिव था। जिस दिन कबीर साहब सम्पन भक्तके घर गये उस दिन खानेकी कुछ भी सामग्री नहीं थी। कई घरोंमें उधार माँगने पर भी निराश होकर सम्पन अपने पुत्रके साथ किसीके घरमें चोरी करनेका विचार करके बाहर हुआ और एक साहूकारके घरमें जाकर संधमार कर शिव अन्दर गया वहाँसे आवश्यकतानुसार खानेकी सामग्री लेकर बाहर खड़े पिताको दिया। जब शिव संधसे बाहर निकलने लगा। तब महाजनने भीतरसे पांव पकड़ लिया। तब शिवने अपने पितासे कहा कि, मैं तो पकड़ा गया अब मेरी डुरमत जाती रहेगी, इस कारण तू मेरा शिर काट ले-जिसमें मैं पहिचाना न जा सकूँ। तब सम्पनने अपने पुत्रका शिर काट लिया और आटा सीधा और अपने पुत्रका शिर लेकर अपने घर आया। शिवका शव वहाँही पड़ा रहा। सम्पनने अपने बेटेके शीशको एक ताकपर रख दिया और आटा सीधा अपनी स्त्रीको देकर कहा कि, भोजन तय्यार कर रोना नहीं। यदि रोवोगी और दुःख प्रकट करोगी तो साधु भोजन नहीं करेंगे। तब नेकीने तुरंत भोजन तय्यार किया और सम्पन उन तीनों साधुओंके निमित्त भोजन ले गया तीन पतल कबीर साहबके सामने