भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1908, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1908

( १८३० )

बोधसागर

४६

रख दिये और कहा कि, महाराज ! आप तीनों साधु भोजन कीजिये । तब कबीर साहबने तीन पत्तलके छः टुकड़े किये और छः भाग करके कहा सम्मन अब तुम अपने पुत्रको बुलाओ कि, हम छः मनुष्य एक साथ भोजन करें । सम्मनने कहा कि, महाराज ! हम तीनों पीछे आवेंगे आप तीनों संत पहले भोजन कर लीजिये । कबीर साहबने कहा कि ऐसा कदापि न होगा, हम सबके सब एकत्रित भोजन करेंगे । जब सम्मन अनेक प्रकारका बहाना करने लगे, तब कबीर साहबने कहा कि, शिव तू कहाँ है ? तब शिवके शीशसे शब्द निकला कि, महाराज ! मैं किस प्रकार आऊं ? मेरा तो शीश कटा हुआ ताकपर धरा है और धड़ कहीं पड़ा है, तब कबीर साहबने कहा कि, शिर तो चोर डाकू और ठग इत्यादिके कटते हैं । भक्तोंके शीश नहीं कटते तू चला आ । जब इतना कबीर साहबने कहा तब शिवका शव आकर मस्तकसे मिल गया । और वह उसी समय जैसा था वैसा जीवित होकर प्रसन्नतापूर्वक कबीर साहबके पास आ बैठा और छः मनुष्योंने भोजन किया ।

कबीर साहबका भैंसेसे वेद पाठ कराना

एक बार कुछ वैरागी जो रामानन्दके चेले थे कबीर साहबके सहित अपने गुरुद्वारे दक्षिण देश तोतादरीको चले । एक भैंसा भी अपने साथ ले लिया । उसके ऊपर सब साधुओंने अपनी गुदड़ी तथा कठारी इत्यादि लाद ली । चलते चलते अपने गुरुद्वारे जो स्थान राजानुज स्वामीका है वहाँ पहुँच गये । रामानुज स्वामीके सम्प्रदायी आचारी हैं वे स्नानादिका बहुत ध्यान रखते हैं और अपने हाथसे परदा करके भोजन बनाते और भोजन करते हैं । यदि किसी शूद्रकी छाया भोजन

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण) · पृष्ठ 1908, कुल 2136 में से · BharatKosha