भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १८३० )

बोधसागर

४६

रख दिये और कहा कि, महाराज ! आप तीनों साधु भोजन कीजिये । तब कबीर साहबने तीन पत्तलके छः टुकड़े किये और छः भाग करके कहा सम्मन अब तुम अपने पुत्रको बुलाओ कि, हम छः मनुष्य एक साथ भोजन करें । सम्मनने कहा कि, महाराज ! हम तीनों पीछे आवेंगे आप तीनों संत पहले भोजन कर लीजिये । कबीर साहबने कहा कि ऐसा कदापि न होगा, हम सबके सब एकत्रित भोजन करेंगे । जब सम्मन अनेक प्रकारका बहाना करने लगे, तब कबीर साहबने कहा कि, शिव तू कहाँ है ? तब शिवके शीशसे शब्द निकला कि, महाराज ! मैं किस प्रकार आऊं ? मेरा तो शीश कटा हुआ ताकपर धरा है और धड़ कहीं पड़ा है, तब कबीर साहबने कहा कि, शिर तो चोर डाकू और ठग इत्यादिके कटते हैं । भक्तोंके शीश नहीं कटते तू चला आ । जब इतना कबीर साहबने कहा तब शिवका शव आकर मस्तकसे मिल गया । और वह उसी समय जैसा था वैसा जीवित होकर प्रसन्नतापूर्वक कबीर साहबके पास आ बैठा और छः मनुष्योंने भोजन किया ।

कबीर साहबका भैंसेसे वेद पाठ कराना

एक बार कुछ वैरागी जो रामानन्दके चेले थे कबीर साहबके सहित अपने गुरुद्वारे दक्षिण देश तोतादरीको चले । एक भैंसा भी अपने साथ ले लिया । उसके ऊपर सब साधुओंने अपनी गुदड़ी तथा कठारी इत्यादि लाद ली । चलते चलते अपने गुरुद्वारे जो स्थान राजानुज स्वामीका है वहाँ पहुँच गये । रामानुज स्वामीके सम्प्रदायी आचारी हैं वे स्नानादिका बहुत ध्यान रखते हैं और अपने हाथसे परदा करके भोजन बनाते और भोजन करते हैं । यदि किसी शूद्रकी छाया भोजन

४७

कबीर चरित्रबोध

( १८३१ )

पर पढ़ जावे तो वे उसको नहीं खाते हैं उन लोगोमें जातीय अभिमान भी विशेष है। प्रायः वे जातिके ब्राह्मण होते हैं। उन आचार्योंने कबीर साहबको अपने बराबरमें बैठकर भोजन कराना उचित न समझा इस कारण उन लोगोंने एक बहाना निकाला और कहा कि, जो कोई वेदकी ऋचा पढ़े वह हमारे साथ बैठकर भोजन करे जिसको वेद पाठ न आवें वह हमारी पंक्तिमें न बैठे। सर्वोने वेदका कोई न कोई विशेष भाग पढ़ पढ़कर सुना दिया। उन लोगोंका मुख्य अभिप्राय यही था कि, कबीर साहब वेदपाठी नहीं हैं, इस बहानेसे हम अपनी पंक्तिमें कबीर साहबको न बैठवेंगे। जब कबीर साहबकी पारी आई तब कबीर साहबने भैंसेके शीशपर हाथधर दिया और कहा कि, ऐ भैंसे ! तू वेद पढ़। तब वह भैंसा अत्यन्त स्वच्छता और स्वरके साथ वेद पढ़ने लगा। जब उस भैंसेको वेद पढ़ते देखा तब समस्त आचारी कबीर साहबके चरणोंपर गिरे और अपना अपराध क्षमा करवाया।

रविदासका झगड़ा

कबीर साहब तथा रविदासजीसे सत्संग हुआ। तब रविदासजीका पक्षपात करनेके निमित्त देवी तथा ब्रह्मा विष्णु शिव सब आये, कबीरसाहबने सबको परास्त कर दिया।

जहांगस्तका वृत्तान्त

जहांगस्तशाह एक सिद्ध साधु था, और वह समस्त भारत की सैर किया करता था। उससे साधुओंने पूछा कि, तुमने कभी कबीरसाहबका दर्शन किया ? तब जहांगस्तशाह काशीको चले। कबीर साहबने जान लिया कि, जहांगस्त शाह आते हैं। तब कबीर साहबने एक सूवर मँगाकर अपने द्वारपर

( १८३२ )

बोधसागर

४८

बँधवा दिया । जब जहाँगस्तने दूरसे कबीर साहबकी कुटीको देखा और द्वारपर सूवर बँधा हुआ पाया तब बड़े कुद्ध हुए और झल्काकर पलट पड़े । तब कबीर साहबने पुकारा कि, ऐ जहाँगस्त ! क्यों पलटे जाते हो ? मेरे समीप आओ । इतनी बात सुनकर जहाँगस्तने मालूम कर लिया कि, कबीर साहबने जान लिया और मुझको पहचान लिया । तब उनके मनमें निश्चय हो गया कि, कबीर साहब कोई सिद्ध पुरुष हैं । वहाँ से पलटे और कबीर साहबके पास आकर कहने लगे कि, मैंने सुना था कि, कबीर साहब बड़े सिद्ध हैं इस कारण मैं आपसे भेंटके निमित्त आया था । आपने द्वारपर हराम बाँध रक्खा है, यह कैसी बात है ? यह बात सुनकर कबीर साहब ने उत्तर दिया कि, ऐ जहाँगस्तशाह ! मैंने तो हरामको अपने घरके बाहर बाँधा है आपने हारामको अपने भीतर बाँध रक्खा है । फिर बाहर निकाल देना अच्छा कि, भीतर बाँध रखना अच्छा । कारण यह कि, कोध अहंकार मद आदि सब हराम हैं सो तुम्हारे भीतर हैं । जिसको तुमने हराम समझा है वह हराम नहीं बरन् कोध हराम है । इस शिक्षासे जहाँगस्तशाह प्रसन्न हो गये संध्याका समय निकट आया तब जहाँगस्तशाहने इच्छा प्रकट की कि, मैं मक्कामें निमाज पढ़ा चाहता हूँ । कबीर साहबने एक पलमें मक्कामें प्रवेशित करा दिया । यहाँ फिर सिद्धोंके बीच जहाँगस्तसे जाया न जावे तब कबीर साहबने उनको वहाँ भी पहुँचाया, तब जहाँगस्त अधीन हुए ।

रामदासको विष्णुदर्शन

रामदास नामक धनाढ्य एक ब्राह्मण जागीरदार था । वह दक्षिण देश नर्मदा नदीके किनारेपर रहता था । एकबार कबीर साहब

४९

कबीर चरित्रबोध

( १८३३ )

उसके गाँवके निकट भ्रमण करते हुए पहुँचे और विश्राम करनेके लिए नदी तटपर बैठे । जब रामदास स्नान करनेके निमित्त गया तो वहाँ कबीर साहबको बैठे देखा, तब उसने निवेदन किया कि, महाराज ! आप समर्थ हो मुझको विष्णु दर्शन करवाओ । तब कबीर साहबने उससे कहा कि कल दोपहरको विष्णु तुम्हारे घरपर जावेंगे । यह बात सुनकर रामदासको निश्चय हुआ कि, कबीर साहबका वचन हुआ है । अब विष्णु निश्चय कल मेरे घर आवेंगे तब उसने अपने घर जाकर बड़ी तैयारी की दूसरे दिवस घरको भली भाँति स्वच्छ और पवित्र कराया विछोने इत्यादि विछवाये और नाना प्रकारके स्वादिष्ट भोजन पकवाये । और सिंहासन इत्यादि रखकर प्रतीक्षा करते हुए बैठे कि, अब विष्णु महाराज आया चाहते हैं । कुछ कालके उपरान्त देखा तो एक भैंसा कीचड़से लतपत आया और उस फर्शके ऊपर बैठ गया । तब रामदासको अत्यन्त क्रोध आया कि, इस भैंसेने फर्शको बिगाड़ दिया । सोटा लेकर इस भैंसेको मार भगाया जब दिवस व्यतीत हो गया कोई नहीं आया । तब वह ब्राह्मण निराश हुआ । जब प्रातःकाल वह नदी स्नानके निमित्त गया तब फिर कबीर साहबको उसी स्थान पर बैठा देखकर कहा कि, महाराज ! मुझको विष्णु महाराजका दर्शन तो न हुआ आपकी बातें मिथ्या कैसे हुईं । तब कबीर साहबने कहा कि, ऐ रामदास ! मेरे कथनानुसार विष्णु तुम्हारे घर गये परन्तु तुमने अच्छी विष्णुपूजा की, सोटे मारकर भगा दिया । यह बात सुनकर वह ब्राह्मण लज्जित तथा दुःखी हुआ । कारण यह कि, विष्णुका भक्त था इससे जान लिया कि, विष्णु भैंसाके सरूपमें थे ।

नं. ११ बोधसागर -

( १८३४ )

बोधसागर

५०

कमालीका प्रकट होना

कमालको कबीर साहबने सुरदासे जीवित किया तब शेख-तकीने कहा कि, मैं इस लीलाको नहीं मानता कारण यह कि, यह लड़का सकते मेंथा इस कारण जीवित हो गया—मेरी बेटी आठ दिवसोंसे कब्रमें मरी पड़ी है यदि आप उसको जीवित करें तब सुझे विश्वास हो । कबीर साहब सिकन्दर शाह और शेखतकी सहित उस लड़कीकी कब्रपर गये । वहाँ पहुँचकर कबीर साहबने पुकारा ‘उठ शेखतकीकी बेटी’ वह नहीं उठी; फिर कहा ‘उठ शेख-तकीकी बेटी, फिर भी वह न उठी तब तीसरी बेर कबीर साहबने कहा उठ ‘कबीरकी बेटी’ उस समय वह लड़की जीवित होकर कब्रसे निकल पड़ी । शेखतकी उसके जीवित होनेसे उसका हाथ पकड़कर अपने घरको ले चले; तब उस लड़कीने कहा कि, मैं तुम्हारे नामसे जीवित नहीं हुई हूँ—वरन् कबीर साहबके नामसे उठी हूँ । अब मैं कबीर साहबकी बेटी हूँ अब मैं इनके साथ रहा करूँगी, तुम्हारे गृहपर न जाऊँगी । वही लड़की कबीर साहबकी बेटी प्रसिद्ध हुई और उसका हृदय सत्यगुरुकी कृपासे प्रकाशित हो गया ।

तेरह गाड़ी कागजोंका लिख जाना

बादशाहने तेरह गाड़ी सादे पुस्तकोंकी कबीर साहबके पास भेजी और कहा कि, मैं तब विश्वास करूँगा जब आप उन समस्त पुस्तकोंको ढाई दिवसमें लिख देंगे । जब वे पुस्तकें कबीर साहबके पास पहुँची तब कबीर साहबने अपनी लाठी उन सब पुस्तकोंपर फेरकर कहा कि, इन लिखी हुई किताबोंपर क्या लिखें ? बादशाहको यह लीला देखकर विश्वास हो गया कि, कबीर साहबने उन ग्रंथोंको दिल्लीमें गढ़वा दिया ।

५१

कबीर चरित्रबोध

( १८३५ )

ग्रन्थोंमें लिखा है कि, जब मुक्तामणि साहबका समय आवेगा और उनका झण्डा दिल्ली नगरीमें गड़ेगा तब वे समस्त पुस्तकें पृथ्वीसे बहिर्गत होंगी । सो मुक्तामणि साहबका अवतार वंशकी तेरहवीं पीढ़ीमें होगा । तब वंशगुरुगद्दी दिल्लीमें स्थिर होगी ।

सर्वानन्दका वृत्तान्त

सर्वानन्द ब्राह्मण भारतवर्षके समस्त नगरोंमें जाकर और पंडितोंके साथ शास्त्रार्थ करके विजयी हुआ था । कोई पंडित जब उसके सामने न ठहरा तब वह अपने घर आया और अपनी मातासे कहा कि, हे मातः ! अब तुम मेरा नाम सर्वजित् रक्खो और मेरे माथे पर विजय तिलक कर दो । क्योंकि, अब मेरा सामना करनेको कोई पंडित नहीं रहा । तब माताने कहा कि, ऐ पुत्र ! तूने काशीमें जाकर कबीर साहबके साथ भी वाद-विवाद और सामना किया था ? तब उसने कहा कि, नहीं । तब माताने कहा कि, जबलों तू कबीर साहबपर विजयी न होगा तबलों तेरा नाम सर्वजित् नहीं रक्खूँगी । तब सर्वानन्दने कहा कि, कबीर कैसा बड़ा पंडित है । मैं अब चलकर उसके साथ वाद विवाद करता हूँ । और बहुतसे ग्रन्थ और वेद इत्यादि लादकर काशीमें कबीर साहबके पास पहुँचे । कबीर साहबने कितनी लीलाएँ दिखलाईं तो भी सर्वानन्दको निश्चय नहीं हुआ । अन्तमें सर्वानन्द कबीर साहबके साथ वाद विवाद करने पर उद्यत हुए । सर्वानन्दने श्लोकोंकी झड़ी लगा दी; यद्यपि कबीर साहब समझाते पर वह न मानते । बात बात पर श्लोक, प्रमाण, तथा पुस्तकोंकी साक्षी देते । तब कबीर साहबने देखा कि, इसके पीछे तो घमंडका भयानक रोग लगा है, यह

( १८३६ )

बोधसागर

५२

कदापि न हटेगा और न कहना मानेगा । तब कबीर साहबने कहा कि, ऐ सर्वांनन्द अब तुम्हारी क्या कामना है और किस बातके इच्छुक हो ? तब सर्वांनन्दने कहा कि, मेरी विजय लिख दो तब कबीर साहबने कहा कि, मैं तो लिखना नहीं जानता तुम स्वयम् लिख लो तब सर्वांनन्दने लिख लिया कि, कबीर साहब हार गये और सर्वांनन्द जीत गये । भली भांति लिखकर तथा वह विजय पत्र कबीर साहब तथा अन्यान्य लोगोंको दिखलाकर अपने घरको चले और आनकर अपनी मातासे कहा कि, माता मैं कबीर साहबसे वादविवाद करके उनपर विजय पा गया हूँ । तब माताने कहा कि, ऐ पुत्र ! मुझको तो विश्वास नहीं होता कि, तुम कबीर साहबपर विजयी हुए हो । तब सर्वांनन्दने कहा कि, मैं विजयपत्र लिखवा लाया हूँ तू देख ले । तब माताने कहा कि कागज निकालो । जब कागज निकाला और पढ़ा तो उसमें लिखा था कि सर्वांनन्द परास्त हो गए और कबीर साहब विजयी हुए । यह लिखा देखकर आश्चर्यान्वित हुए कि, यह तो मेराही लिखा था यह उलटा कैसे हुआ । कदाचित् मैं लिखनेमें भूल गया और मातासे कहा कि मातः ! मैं लिखनेके समय भूल गया अब पुनः जाता हूँ और अत्यंत सावधानीपूर्वक ले आऊंगा । तब सर्वांनन्द पुनः कबीर साहबके पास आये और कहा कि, मैं लिखनेमें भूल गया अबकी बेर सँभाल कर लिखूँगा । तब कबीर साहबने कहा कि भली प्रकार सँभालकर लिखो तब फिर सर्वांनन्दने उसी विषयको भली प्रकार सँभालकर लिखा और अपनी माताके समीप आकर प्रकट किया कि अब मैं सँभाल कर लिख लाया हूँ । जब कागज खोला तो वही पूर्वकी बात लिखी पाई कि, कबीर साहब विजयी हुए तथा सर्वांनन्द

५३

कबीर चरित्रबोध

( १८३७ )

परास्त हुए । जब इस प्रकार तीन बेर हुआ तब सर्वानन्दको निश्चय हो गया कि, निस्सन्देह कबीर साहब ईश्वर है और चरणों-पर आन पड़े और शिष्य हो गए । कबीर साहब तथा सर्वानन्दका विवरण भिन्न भिन्न स्थानोंमें लिखा है ।

चौरासी सिद्धोंका परास्त होना

एक स्थानपर नव नाथ चौरासी सिद्ध कबीर साहब तथा नानक साहब सहित एकत्रित थे । उस समय एक महाजन जो नानक साहबका परिचयी अथवा सेवक था जा पहुँचा, तब उसने विचारा कि, सन्त गुरुके समीप विना कुछ लिए जाना उचित नहीं कुछ भेंटके निमित्त ले चलना उचित है । तब उसने अपनी जेबमें हाथ मारा पर कुछ न पाया, परन्तु एक तिल उसके वस्त्रोंमें मिला । तब उसने उसी तिलको नानक शाहके समक्ष रक्खा-तब नानक शाहने कबीर साहबसे कहा कि, मैं इस तिलको इतने साधुओंमें किस प्रकार बाँटूँ-तब कबीर साहबने कहा कि, इस तिलको जलमें घोटकर सकल साधुओंमें बाँटो तब नानक शाहने कहा कि, यहां तो जल भी नहीं है, किस प्रकार घोटे । यह बल आप ही में है इसको बाँटिये । तब उस स्थानपर एक शुष्क नदी थी, उसको कबीर साहबने जारी ! किया और उसमेंसे जल भरकर उस तिलको घोटा और सब साधुओंको पिलाया और उसके पीनेसे अत्यन्त आनंद आया और उन्होंने कहा कि, कबीरजी मांगो जो मांगो सो हम लोग आपको देंगे । तब कबीर साहबने कहा कि, तुम लोग तो दरिद्री जान पड़ते हो मैं तुमसे क्या मांगू और तुम मुझको क्या देंगे ? तब उन लोगोंने कहा कि जो कुछ तुम मांगोगे सो हम तुमको देंगे । तब कबीर साहबने कहा पाँच पैसेभर दरिद्रता

( १८३८ )

बोधसागर

५४

मुझको दो । तब नवनाथ चौरासी सिद्धोंने परामर्श किया कि, यह गुण तो हम लोगोमें नहीं कारण यह कि, हम लोगोको तो अपनी सिद्धि और जप तपका घमंड है । चलो ब्रह्मासे पाँच पैसे-भर दरिद्रता मांगें । तब ब्रह्मलोकमें गए और पाँच पैसेभर दरिद्रता ब्रह्मासे मांगी । ब्रह्माने शोच समझकर उत्तर दिया और कहा कि मेरे पास दरिद्रता कहाँ मैं तो इस बातका अहंकार करता हूँ कि, मैं सृष्टिका उत्पन्न करता हूँ यह अहंकार मुझमें है । तब नवनाथ और सब सिद्ध कैलासको शिवजीके पास गए और वही प्रश्न किया तब शिवजीने भी वही उत्तर दिया कि, मुझमें दरिद्रता तो नहीं, कारण यह कि, मुझमें तो यह अहंकार है कि, मैं नष्ट करता हूँ तब सब ओर ढूँढ़ते ढूँढ़ते थके परन्तु दरिद्रताको कहीं न पाया । अन्तमें विष्णुके पास गए और दरिद्रताके निमित्त प्रार्थना किया तब विष्णुने कहा कि, ऐ सिद्ध साधु पाँच पैसेभर दरिद्रता अथवा जो कुछ दरिद्रता है सो सब कुछ उसीके पास है जिसने तुमको भेजा है । मेरे पास तो केवल तीन पैसेभर दरिद्रता है, जिसके कारण मैं समस्त संसारका रचयिता कहलाता हूँ, दरिद्रताके समूह तो स्वयम् कबीर साहब हैं, और दूसरा कोई नहीं । तब समस्त सिद्ध साधु कबीर साहबके पास पलट आए-और आपको दण्डवत् तथा प्रणाम करके प्रदक्षिणा किया । और समस्त वृत्तांत प्रकट किया । तब कबीर साहबने कहा कि, क्या मैंने तुमसे इतः पूर्व ही न कहा था कि, तुम लोग तो दरिद्री हो तुमसे क्या मांगूँ ।

नानक बोध

कबीर साहब नानक साहबके निकट पञ्जाब देशमें आए तब नानक शाह अत्यंत आवभगत तथा सन्मान सहित उनसे

५५

कबीर चरित्रबोध

( १८३९ )

मिले और कहा कि, जिस सेवाके निमित्त आप आज्ञा देवें उसको मैं कहूँ। तब कबीर साहबने आज्ञा दिया कि, पाँच दिवसकी उत्पन्न हुई बछियाके स्तनसे दूध दुहकर मेरा कमण्डलु भर दो—तब नानक शाहने कहा कि, पाँच दिवसोंकी उत्पन्न हुई बछिया कैसे दूध दे सकती है? तब कबीर साहबने कहा कि, यही मेरी सेवा है तुम करो। तब नानकशाहने हूँद ढाँढ़ कर पाँच दिनसोंकी उत्पन्न हुई बछियाको उपस्थित किया, जब दूध लेनेको उसके समीप गए, तब वह बछिया लात चलाकर भाग गई। तब नानकशाहसे कबीर साहबने कहा कि, अब तुम जाओ और मेरे नामसे उस बछियासे दूध माँगो—और कमण्डलु उसके स्तनके नीचे रख दो। नानकशाहने बछियाके स्तनके नीचे कमण्डलु रखकर कबीर साहबके नामसे दूध माँगा और बछियाके स्तनसे आपसे आप इतना दूध निकला कि वह कमण्डलु भर गया। तब कबीर साहबने नानक साहबसे कहा कि, ऐ नानकजी! आपने वंदना तो बहुत की परन्तु अभीलों आपकी कगाईमें बुटि है। और आपका पंथ चलेगा और बहुत लोग आपकी आज्ञामें चलेंगे और भविष्यतमें ये रंग ढँग होंगे। और नानकशाहसे कबीर साहबने बहुत कुछ कहा—और इसी ग्रन्थमें नानक शाहके विषयमें भविष्य वाणी है। और नानक धर्मका विवरण किया जो भविष्यतमें होनेवाला है। और इसी स्थानपर यह साखी है। “तिल घोंटतारे लगे” इत्यादि है और इसी स्थानपर यह है।

ऐसो दाता सत्य कबीर, सूखी नदी बहावे नीर । भूखेको खिलावै खीर, नंगेको पहनावे चीर ॥

( १८४० )

बोधसागर

५६

इत्यादि महाराजा श्रीरामचन्द्रजीको कबीर साहब ( मुनी- न्द्रजी ) ने योगशक्ति सब कछु सिखलाया और सीताके चुराये जानेके समय अत्यंत कठिना उपस्थित हुई और समुद्रोच्छ्वन करना अत्यंत कठिन था—तब रामचन्द्रजीपर कबीर साहबकी दया हुई । और पत्थरोंपर सत्य नाम लिखा उसके कारण बहुतेरे पर्वत तथा पत्थर पैरने लगे । और पुल प्रस्तुत हो गया । और इसी साहबकी दयादृष्टिके कारण लंका पर विजय पाकर मंगलपूर्वक अपने घर पहुँचे । देखो ग्रन्थ ज्ञान संबोध तथा अन्यान्य ग्रंथोंमें ।

कबीर साहबका बाँसुरी बजाना

कृष्णचन्द्र बाँसुरी बजाते और गोपियोंका मन चुरा लिया करते थे जब कबीर साहबने बाँसुरी बजाया तब तीनों लोक मोह गये । और जड़ चैतन्य सभी मोहित हो गए । और यमुना नदीका जल स्थिर हो गया । और स्थावर जंगम सभीको आनन्द आया वह बाँसुरी ऐसी बजी कि, फिर कभी न बजी । लोगोंने जाना कि, कृष्णचन्द्रने बजाया था । गोप तथा गोपियोंकी बड़ी कामना थी कि, वैसी वंसी पुनः बजे, परन्तु वह फिर किस प्रकार बजे ? उस बाँसुरीके बजाने वाले तो कृष्ण नहीं थे उसके बजानेवाले तो कबीर साहब थे और इस बाँसुरीकी प्रशंसा हंस कबीर किया करते हैं, जिनको इसका ज्ञान है ।

गोरखको जीतना

जब प्रथम कबीर साहब और गोरखनाथका सामना हुआ और गोरखनाथ कबीर साहबकी श्रेष्ठता कीर्तिसे अन- भिन्न थे तब गोरखनाथने कबीर साहबसे कहा कि, आओ हम

५७

कबीर चरित्रबोध

( १८४१ )

तुम वादविवाद करें। उस समय गोरखनाथने अपना त्रिशूल गाड़ दिया और कहा कि, आओ कबीर साहब उस त्रिशूलकी एकशाखापर आप बैठो और एकपर मैं बैठता हूँ, तब वादविवाद करें। तब कबीर साहबने सूतके एक तारको अकाशकी ओर चलाया और शून्यमें उस सूतके ऊपर जा बैठे और कहा कि, नाथजी ! आओ हम और तुम इस सूतपर बैठकर वाद विवाद करेंगे, तुम्हारा त्रिशूल तो पृथ्वीसे लगा हुआ है कबीर साहबकी यह लीला देखकर गोरखनाथ दंग हो गये।

गोरखनाथजीने कबीर साहबसे कहा कि, मैं छिपता हूँ आप मुझको ढूँढ़ निकालो, तब गोरखनाथ मेंड़क होकर जलमें छिप रहे। तब कबीर साहब उस मेंड़कको पकड़ लाये और कहने लगे कि, अब किधर जाओगे ? तब गोरखनाथ पुनः अपने प्राकृतिक स्वरूपमें आयेगे ? तब कबीर साहबने कहा कि, अब मैं छिपता हूँ तुम ढूँढ़ लो। तब कबीर साहबने जलमें डुबकी मारी और जल होकर जलके साथ मिल गये और गोरखनाथ ढूँढ़ते २ थके और तीनों लोकमें ढूँढ़ते फिरे परन्तु कहीं पता नहीं लगा तब विश्वास हो बैठे। जब कबीर साहबने देखा कि, अब तो गोरखनाथ हारके बैठ गये तब कमण्डलुके जलमेंसे कबीर साहब प्रकट हो गये।

गोरखनाथने कबीर साहबके मारनेके निमित्त दो सर्प भेजे वे दोनों साँप कबीर साहबके पास आये और आपने उन दोनोंको अपने शरीरमें लगा लिया, जब बहुत विलंब हुआ और वे सर्प पलटकर नहीं गये तब स्वयं गोरखनाथ कबीर साहबके गृहपर पधारे और पुकारा कि, कबीर साहब ! बाहर आइये

( १८४२ )

बोधसागर

५८

तब कबीर साहबने भीतरसे उत्तर दिया कि, नाथजी मेरे गृह दो अतिथि आये हैं, मैं सेवा सत्कारमें लगा हुआ हूँ। तब गोरखनाथने जाना कि, कबीर साहब कैसे प्रतिष्ठित पुरुष हैं और आपमें कैसी क्षमा तथा संतोष है। प्रथम तो गोरखनाथने कबीर साहबसे बहुत वाद विवाद किया और बहुत कौतुक देखे जब भली प्रकार जान लिया कि, आप अद्वितीय हैं और मनुष्ययमात्रमें दूसरा ऐसा कोई नहीं और कबीर साहबने गोरखनाथका भली प्रकार संतोष किया और बहुत कुछ कहा और सब कौतुक दिखलाये और गोरखनाथको भलीप्रकार निश्चय कराया कि, कबीर साहब स्वयं अलख अविनाशी हैं तब सत्यगुरुके चरणोंपर गिरे और शिष्य होकर परम गतिको पहुंचे और योग युक्ति सबको व्यर्थ समझा।

सिद्ध बना देना

जब कबीर साहबने कमालीके मस्तकपर हाथ रक्खा तब उसका हृदय प्रकाशित हो गया और उसपर आरंभसे अन्त-पर्यंत समस्त समयोंका वृत्तान्त प्रकट होगया और उसकी जिह्वासे ज्ञानके फौन्वारे छूटे और सब वृत्तांतोंका विवरण करने लगे और जब कत्रसे बाहर आतेही उसका हृदय प्रकाशित हो गया तब वह यह शब्द बोली।

कमाली वचन शब्द

हंसा निकल गया मैं न लडीसी। पांच सहेली संग हैं मेली, पांचों मेंसे मैं अकेली खडीसी ॥ नौ दरवाजे बन्द करलीने, दशवीं मोरी खुली जो पडीसी ॥ न मैं बोली न मैं चाली, ओढ़े दोपट्टा किनारे खडीसी ॥ कहत कमाली कबीरकी बालकी, सादीसे मैं कुमारी भलीसी ॥

५९

कबीर चरित्रबोध

( १८४३ )

इसी प्रकार माई आमीन जो धर्मदास साहबकी स्त्री थी उसके शिरपर जो कबीर साहबने हाथ रक्खा उसकी जिह्वासे ज्ञान-सोता बहने लगा और सब वृत्तांत कहने लगी ।

आमीन बचन शब्द

साधो नाम सबनसे न्यारा लखि पुरन गुप्त विस्तारा । जानेगा कोइ जानगहारा ॥

जब नहीं अंशवंश निर्मायो, नहीं कछु किया पसारा । चर औ अचर चराचर नाहीं, नहीं मनको विस्तारा ॥ जब नहीं पुरुष नहीं तब ज्ञानी, यह मत सबसे न्यारा । जब नहीं पांच अमी निर्माया, नहीं सोहंग विस्तारा ॥ धर औ अधरधराधर नाहीं, नहीं पुरुषकी काया । तब नहीं पूरम नहीं जल रंगी, नहीं तब जलकी छाया ॥ धूप दीपलीला दहजा हैं, नहीं अदली औ तारा । करमन कहै सुनो धर्मदासा, यह मत सबसे न्यारा ॥ इसी प्रकार रानी इन्द्रमती राजा चन्द्रविजयकी जो रानी थी मंदोदरी राजा रावणकी स्त्री माणिकमती राजा वीरसिंहकी स्त्री । लीलावती पुरती राजा योगधरकी पचास स्त्रियां, राजा अमरसिंहकी रानी, मीराबाई राजा उदयपुरकी रानी, क्षेम श्रीगवालिन, और वह अनगिनत स्त्रियां जिनके माथेपर कबीर साहबने हाथ रक्खा वे सब परमधामको गयीं ।

कबीर साहबका उपदेश

तीन कालके जितने धर्मके अगुवा हैं और हुए, तथा होंगे उन सबसे कबीर साहबकी शिक्षा पृथक् है-इस शिक्षाका मुख्य अभिप्राय यही है कि, गर्भका आवागमन बंद हो जावे । इस आवागमनका बड़ाभारी दुःख है । जिस शिक्षा तथा धर्मसे

( १८४४ )

बोधसागर

६०

बारम्बार जन्म और मृत्युका दुःख दूर हो वही मनुष्यका धर्म है। और उसी गुरु तथा शास्त्रको धारण करना मानुषिक बुद्धिका कर्तव्य है। जो कोई मनुष्य देह पाकर मुक्तिमार्ग न ढूँढे वह महा अभाग है। कारण यह कि, वह पुनः ऐसा समय न पावेगा और सदैव भवसागरमें डुबकियाँ खावेगा। योगमुक्ति तथा समस्त तंत्र मंत्र बंधनके प्रधान कारण हैं। यदि योग समाधिसे योगी अमर होता तो फिर कदापि कोई योगी न मरता। संन्यासी जो ब्रह्मके ध्यानमें रहते हैं सो ब्रह्म उनका भ्रम है सो संन्यासी भ्रमरूप होकर आवागमनमें पड़ा रहता है, सो ब्रह्म उनका भ्रम होकर भ्रममें फँसे रखते हैं। ब्रह्मा विष्णु शिव सनकादिक इत्यादि सब भ्रम नदीमें पड़े डुबकियाँ खारहे हैं इस भ्रमकी कोई सीमा नहीं है।

स्वयम् वेदके विना पढ़े किसीकी मुक्ति नहीं होती जो कोई ध्यानपूर्वक पढ़े और उसके विषयोंपर विचार करे और स्वसम्वेदकी आज्ञाओंपर भली भाँति दृढ़ हो और समस्त मिथ्या ओंसे पृथक् हो सो मनुष्य है और वही कालपुरुषके पक्षेसे छुटकारा पावेगा। कंजूस, व्यभिचारी पुरुषको स्वसम्वेद पढ़नेसे किसी प्रकारका लाभ नहीं है।

अपने गुरुके स्वयम् सत्य पुरुष करके जानना और गुरुके मुँहसे स्वयम् सत्यपुरुष खाता पीता है और गुरुके शरीरसे वस्त्रादि पहनता है जिसको गुरुकी बातपर विश्वास न होवे और जिसके मनमें घमंड हो तथा जिसके मनमें नव्रता न हो तो वह नरकमें जावेगा। सेवा सब पुण्योंसे बढ़ा चढ़ा पुण्य है। सेवाका कर्तव्य सबके ऊपर है जो गुरुकी सेवाका कर्तव्य पूर्ण करेगा उसका हृदय प्रकाशित होगा और उस गुरुकी ही

६१

कबीर चरित्रबोध

(१८४५)

मूर्तिसे पारख गुरु निकलकर उसकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करेगा और कोई अपने गुरुके प्रतिका कर्तव्य न पालन करे और उससे अपने प्रतिका कर्तव्य पालन करावे और उसकी दी हुई वस्तुओंको मांगे तो वह चोर और ठग है। एक अवस्थामें गुरुकी सेवा न मांगी जावेगी जब कि, मनुष्य भली भांति डुबा रहे और दिनरात वंदनामें संलग्न हो जावे और किसी अन्य ओर ध्यान न हो और अपने शरीरकी चिता भी न हो तब गुरुसेवा क्षमा होगी और गुरु उसकी वंदनाका भागी होगा। जबलें ऐसी अवस्था न हो तबलें गुरुसेवासे यदि अपनेको न बचायेगा तो उसके मनमें तेज न चमकेगा, इस कारण समस्त जीवन गुरुकी सेवा तथा उसकी आज्ञामें रहना उचित है। कारण यह कि, गुरुके प्रतिका कर्तव्य कभी किसीसे पूर्णरितिसे निबह नहीं सकता। केवल एक नामके प्रतिफलमें तीनों लोकोंमें कोई वस्तु नहीं हैं जो दी जावे। गुरु ही धर्मकी जड़ है और जड़के सींचनेसे डाल पात सब हरे होते हैं और निश्चयके वृक्षमें सब फल फूल लगते हैं।

कंजूसकी मुक्ति कभी नहीं होती यह कंजूस बहुत बड़ा शैतान है यह जिसके मनमें प्रवेशित होता है वह जीवित श्मशानीभूत है। यह एक घृणा उत्पादक लत है और इससे स्वयम् परमेश्वरको घृणा होती है और समस्त पीर पैगम्बर तथा सिद्ध साधु इसको बुरा जानते हैं। किसी प्रकारकी वंदना तथा सेवा मनुष्य करे परन्तु एक कृपणता ऐसी वस्तु है जिससे वह सब विनाश हो जाती है। और कंजूससिद्धकी समस्त सिद्धि धूलमें मिल जाती है।

( १८४६ )

बोधसागर

६२

साखी-कामी तो बहुतै तरे, क्रोधी तरे अनन्त । लोभी जिवडा ना तरे, कहैं कबीर सिधन्त ॥

साधुओंकी सेवा बहुत बड़ी पूजा है और भक्ति तथा मुक्तिकी देनेवाली है । और जो कोई साधुओंको भोजन इत्यादि देता है और उनकी आवश्यकताकी वस्तुओंको एकत्रित कर देता है उसकी समस्त कठिनाइयाँ और पाप दूर होते हैं और साधुओंकी कृपासे समस्त पदार्थ प्राप्त होते हैं और साधु समस्त युक्तियाँ बतलाते तथा समस्त अच्छे कार्योंको सिखलाते हैं और साधु नरकसे बचाते और वैकुण्ठको स्वीचकर ले जाते हैं और ज्ञान तथा मुक्तिकी समस्त युक्तियाँ समझाते हैं और समस्त भ्रम और धोखेको पृथक् कर देते हैं और साधु सत्यपदमें लगाते हैं और साधु समस्त संसारके पदार्थपर आज्ञा करते हैं । और साधु समस्त दुःख संतापका अपहरण करते और साधु समस्त पातकसे पृथक् हो जाते हैं और साधु तो अनेक हैं परंतु वह साधु जो समस्त भ्रम तथा धोखेको दूर कर दे और सत्यपदसे लगावे उस साधुसे विशेष प्रेम करना और उसीकी वंदना तथा सेवासे उसकी हार्दिक मना पूर्ण होगी । रोटी कपड़ा इत्यादि आवश्यकीय वस्तुओंका देना और मानसंभ्रम तो समस्त साधुओंका करना चाहिये परंतु विशेषतः वह साधु जो अपने स्वरूपमें मिलनेका भाग्य बतलावे वही साधुशिरोमणि है । साधुके विवरणसे बाहर है । साधुओंकी सेवा तथा आज्ञापालन सौभाग्यके लक्षण हैं, वे बड़े बड़ाभी हैं सो जो साधुओंकी संगत करते हैं साधुओंको भोजन देना बड़े पुण्यकारक कार्य हैं उसके समान अन्य कार्य जगत्में नहीं हैं । और साधुओंको वस्त्र देनेसे समस्त दुःख निवारण होते हैं । और जबतक साधुओंके शरीरपर

६३

कबीर चरित्रबोध

( १८४७ )

वस्त्र रहता है तबतक देनेवालेकी समस्त आपत्तियाँ उससे दूर रहती हैं। साधुकी सेवासे समस्त बंधनोंसे मुक्ति होती है। यदि साधुकी दया न हो तो कोई मनुष्य गतिको प्राप्त न होगा। साधुओंकी दयासे मनुष्य धर्म तथा संसारकी समस्त विद्या और बुद्धि प्राप्त करता है। कितनेक साधु ऐसे भी हैं जो सत्य पुरुषकी भक्तिसे भटकाते हैं और काल पुरुषकी भक्तिमें लगा देते हैं। सो उनकी शिक्षा और बातोंसे पहचान लेना चाहिये। ऐसा न हो कि, उनके धोकेमें आ जावें। वे साधु कालपुरुषके दूत हैं उनसे सावधान रहना और जिस साधुमें अपने गुरुका ज्ञान और उसकी शिक्षा देखना उसकी मर्यादा तथा सेवा अपने गुरुके समान करना और धोखा धड़ी देनेवाले साधु अपनी वार्तालापसे पहचाने जाते हैं।

सत्य पुरुषकी भक्तिके अतिरिक्त और समस्त भक्तियाँ जाल तथा बंधनमें डालनेवाली हैं। कालपुरुषका विष ब्रह्मा विष्णु और शिव सनकादिकसे लेकर समस्त जीवोंमें समाया हुआ है। बिना सत्यगुरुकी दयासे कोई सत्य पदमें लग नहीं सकता है, समस्त शरीर तथा नक्षत्रोंमें काल पुरुषका विष छिपा हुआ है। जिसको सत्यगुरु अपनी ओर दया करके खींचे वह आवे और दूसरेमें क्या सामर्थ्य है कि, यमके नीचेसे निकल सके धर्मरायके मंत्रने समस्त मनुष्योंकी बुद्धिको अंधी कर रक्खा है और किसीको इस विषयका ध्यान तथा सोच नहीं कि, मैं जान बूझकर क्यों कुएँमें पड़ता हूँ मेरे पुरुषा तो सब इसी धोकेमें पड़कर मरे, मैं इस अंधकारमय पथपर क्यों चलूँ। इनकी बुद्धि डुबकियाँ खारही है और सत्यको मिथ्या तथा मिथ्याको सत्य मान रही है। और छुटकारेको बंधन तथा बंधनको

( १८४८ )

बोधसागर

६४

छुटकारा मान रही है। इनकी बुद्धि तथा इनका चित्त ठिकाने नहीं है। इनकी बुद्धि तथा पाशविक बुद्धिमें मनुष्यताका लेश-मात्र नहीं है।

चार वेद तथा चार पुस्तकें ये आठों काल पुरुषके जाल हैं। इस जालमें फँसाकर उसने समस्त मनुष्योंको मार लिया और मनुष्योंको उसने ऐसा धोखा दिया कि, जितने नाम सत्य पुरुषके थे वे सब अपने नाम प्रकट किये। और सत्य पुरुषके धोखेमें समस्त मनुष्य कालपुरुषकी बंदनामें लगे और काल-पुरुषने सत्यपुरुषका नाम छिपाया और यह भेद ब्रह्मा विष्णु और शिवसे भी नहीं कहा इस धोखेसे समस्त मनुष्य इस शिकारीके शिकार हो गये। जो कोई चार वेद तथा चार पुस्तकों से पृथक् होगा उसको सूक्ष्म वेदकी ज्ञान प्राप्ति होगी। जिनका प्रेम पुरुषम वेदसे है वे स्वसम्वेदसे कैसे प्रेम कर सकते हैं।

विष्णुको तीनों लोकोंकी सरदारी तथा अधिकार मिला है उसीके अधीन सब हैं। निर्गुण निरञ्जन और सगुण विष्णु यही समस्त लोकोंके रचयिता तथा कर्ता धर्ता हैं, तीनों लोकोंमें विष्णु सम्यक् रूपसे उपस्थित रहते हैं। दोनों रूपसे निरंजन तीनों लोककी ठकुराई करता है।

तीनों लोक भवसागरका ठीकादार निरंजन है। और सत्रह असंख्य चौकड़ी युगका उसका ठीका है इतने समयपर्यन्त तो बिना पारख गुरुके कोई मुक्ति नहीं पावेगा। जब ठीकाकी यह सीमा बीत जायगी तब अक्षर पुरुषके राज्यका समय आवेगा। इस राज्यमें समस्त जीवोंके छुटकाराकी आशा होगी।

प्रथम स्वसम्वेद ब्रह्मसृष्टिमें था। जब कालपुरुषने भरमाया सृष्टिकी रचना की तब उसमेंकी निकृष्ट बातोंको निकालकर

६५

कबीर चरित्रबोध

( १८४९ )

पुरुषमवेद बनाया और इस पुरुषम वेदमें अपनी मत्यनुसार समस्त सृष्टिको उपदेश दिया और अज्ञानी लोग इस पुरुषम अर्थात् पराकृत वेदको अपने धर्मका मार्ग और मोक्षकी निसेनी समझने लगे । तब निरंजनने अपनी सन्तानको पृथ्वीपर भेजना आरंभ किया और सहस्रों ऋषि मुनि पीर पैगम्बर पृथ्वीपर आए । और काल पुरुष निर्गुण तथा सगुणकी भक्ति सिखलाते चले आए और इन ऋषी-श्वरोंमें सहस्रोंने अपना नवीन ढंग निकाला और वेदकी शिक्षाको अरुचिकर समझकर दूसरा पंथ बतलाया । वह भी काल पुरुषके फन्देमें फँस मरे और किसीने बिना पारख गुरुके सत्य लोकके पथको नहीं पाया ।

जो कोई किसी जीवका रक्तपान करेगा उसका प्रतिशोध अवश्य देना पड़ेगा । जो कोई किसीको दुःख देवे अथवा मांसाहारी हो वह भी निश्चय दुख पावेगा और अपना मांस उसको खिलावेगा किसीका प्रतिशोध कदापि नहीं छोड़ेगा ।

मांसाहारी तथा मद्यप कदापि मुक्ति नहीं पावेगा जो पुरुष मुक्तिके इच्छुक हैं उनको सम्यक् प्रकारसे स्वच्छ तथा पवित्र होना चाहिये ।

गृहस्थके निमित्त अपनी स्त्रीके अतिरिक्त समस्त दूसरी स्त्रियोंके साथ संभोग करना महापापकी गणनामें है और साधुके निमित्त विवाहिता अथवा विनविवाही दोनोंसे संभोग निषेध है ।

गुरुकी आज्ञोच्छेदनके समान मनुष्यके निमित्त और कोई महापाप नहीं है ।

सत्यगुरुकी शरण सब जीवोंके निमित्त सुखदायी है । उसीकी शरणमें समस्त पातक क्षमा हो जावेंगे । इस कलियुगमें गुरुके