कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कबीर चरित्रबोध
( १८४९ )
पुरुषमवेद बनाया और इस पुरुषम वेदमें अपनी मत्यनुसार समस्त सृष्टिको उपदेश दिया और अज्ञानी लोग इस पुरुषम अर्थात् पराकृत वेदको अपने धर्मका मार्ग और मोक्षकी निसेनी समझने लगे । तब निरंजनने अपनी सन्तानको पृथ्वीपर भेजना आरंभ किया और सहस्रों ऋषि मुनि पीर पैगम्बर पृथ्वीपर आए । और काल पुरुष निर्गुण तथा सगुणकी भक्ति सिखलाते चले आए और इन ऋषी-श्वरोंमें सहस्रोंने अपना नवीन ढंग निकाला और वेदकी शिक्षाको अरुचिकर समझकर दूसरा पंथ बतलाया । वह भी काल पुरुषके फन्देमें फँस मरे और किसीने बिना पारख गुरुके सत्य लोकके पथको नहीं पाया ।
जो कोई किसी जीवका रक्तपान करेगा उसका प्रतिशोध अवश्य देना पड़ेगा । जो कोई किसीको दुःख देवे अथवा मांसाहारी हो वह भी निश्चय दुख पावेगा और अपना मांस उसको खिलावेगा किसीका प्रतिशोध कदापि नहीं छोड़ेगा ।
मांसाहारी तथा मद्यप कदापि मुक्ति नहीं पावेगा जो पुरुष मुक्तिके इच्छुक हैं उनको सम्यक् प्रकारसे स्वच्छ तथा पवित्र होना चाहिये ।
गृहस्थके निमित्त अपनी स्त्रीके अतिरिक्त समस्त दूसरी स्त्रियोंके साथ संभोग करना महापापकी गणनामें है और साधुके निमित्त विवाहिता अथवा विनविवाही दोनोंसे संभोग निषेध है ।
गुरुकी आज्ञोच्छेदनके समान मनुष्यके निमित्त और कोई महापाप नहीं है ।
सत्यगुरुकी शरण सब जीवोंके निमित्त सुखदायी है । उसीकी शरणमें समस्त पातक क्षमा हो जावेंगे । इस कलियुगमें गुरुके