कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
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प्रतिका कर्तव्य कौन पूर्ण कर सकता है । परन्तु सत्यपुरुषको अपने शरणकी लज्जा है उसकी शरण आकर धर्मपर स्थिर रहो । जो धर्मविमुख हुवा वह निर्दयी तथा घातक शैतानके जालमें फँसा । सत्यगुरुके शरणपर पूर्णतया निर्भर रहना और यह समझे कि, सत्यगुरु मेरे अपराधोंको क्षमा करेगा मेरी और नहीं वरन् अपनी दयाकी ओर दृष्टिपात करेगा कारण यह कि उसका नाम पतितपावन है ।
घमंडी तथा द्वेषीको सत्यपुरुषकी भक्ति कदापि नहीं प्राप्त होगी जो मनुष्य बड़ाई और उग्र श्रेणी पाकर नम्र हो गए तथा अपना शीश नवा दिया और धन पाकर दान तथा साधु सेवाको ग्रहण किया, उनके निमित्त भक्ति और मुक्तिका द्वार खोला जावेगा । वह मनुष्य जिसने ऐसा ध्यान किया कि, मैं तुच्छ सेवक हूँ और जितनी मूर्तियाँ हैं, सब मेरे अधीन और सत्य गुरु हैं । और सब जीवोंमें उसकी कान्ति जाने तो मुक्तिका अधिकारी है ।
मैं अपने कार्योंका अधिकारी नहीं वरन् सत्यगुरुसे सहायता माँगते रहना कि, वह मेरी मनकामना पूर्ण करें और भले कार्योंमें सदैव उद्योग करते रहना ।
मैं नहीं जानता कि, मैं क्या हूँ और मेरा परमेश्वर क्या है, इस कारण सत्यगुरुपर पूर्णतया निर्भर रहना कि, जब वह मुझको दृष्टिप्रदान करेगा तब मैं जानूँगा ।
कालपुरुषके जितने धर्म पृथ्वीपर प्रचलित हैं, सबमें वैष्णव धर्म श्रेष्ठ—और सबका सरदार है । यह सतोषुणी धर्म है । इस धर्मके नियम तथा इसकी आज्ञाएँ सत्यपथकी सीढ़ी हैं और सत्यपथ परम धामकी सोपान है ।