कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कबीर चरित्रवोध
( १८५१ )
सत्यगुरु कबीरका नाम बंदीछोर है । और वह सर्वाधिकारी है जिसको चाहे मुक्ति प्रदान करै, जिसको इस बातका पूर्णतया विश्वास हो गया उसका बेड़ा पार हुआ ।
सत्यपुरुष और कबीर साहबको जिसने एक जाना उसका बंधन टूट गया और कालके पक्षेसे छूट गया । तन मन धन गुरुके अर्पण करना तो भलाईका निचोड़ है, परन्तु अपनी कमाईसे दशवाँ भाग देना गुरुका हक है । बुद्धिमान् पुरुषही मुक्तिका भागी होता है ।
जो कोई मनुष्यताकी श्रेणी प्राप्त करने योग्य है, उसीमें बुद्धि होती है । पशु सुन्दर मनुष्य हैं-उनमें बुद्धि नहीं होती है ।
पारख गुरु प्रत्येक स्थानोंपर उपस्थित है, परन्तु जबल्लों उसके पथमें अपनेको मैं न्योछावर न कहूँ तबल्लों उसका दर्शन न होगा ।
सब झूठे झूठोंके साथ मिलते हैं-जो कोई सत्यका प्रेमी होगा वह झूठेके साथ कभी योग नहीं देगा ।
यह तीनों लोक विषवृक्षका फल है । और प्रत्येक वस्तु प्रत्येक खाना तथा मकानमें विष भरा हुआ है बिना सत्यगुरुकी भक्तिसे वह विषयोंसे बहिर्गत नहीं होगा और न किसी अन्य युक्तिसे पृथक् हो सकता है ।
जान बूझकर विष खाना मनुष्यताके विरुद्ध है । आप सत्य पुरुषकी भक्ति करना और दूसरोंसे करवाना और करते देखकर प्रसन्न होना-वंदना है ।
प्रत्येक मनुष्य बिना जाने बूझे अपने २ धर्मकी ओर खींचता और द्वेष करता है । परन्तु मनुष्य वह है कि, जो द्वेषरहित होकर वह धर्म हूँदे जिससे उसके आवागमनका मार्ग एकबारगी ही बंद हो जावे ।