कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
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प्रतिका कर्तव्य कौन पूर्ण कर सकता है । परन्तु सत्यपुरुषको अपने शरणकी लज्जा है उसकी शरण आकर धर्मपर स्थिर रहो । जो धर्मविमुख हुवा वह निर्दयी तथा घातक शैतानके जालमें फँसा । सत्यगुरुके शरणपर पूर्णतया निर्भर रहना और यह समझे कि, सत्यगुरु मेरे अपराधोंको क्षमा करेगा मेरी और नहीं वरन् अपनी दयाकी ओर दृष्टिपात करेगा कारण यह कि उसका नाम पतितपावन है ।
घमंडी तथा द्वेषीको सत्यपुरुषकी भक्ति कदापि नहीं प्राप्त होगी जो मनुष्य बड़ाई और उग्र श्रेणी पाकर नम्र हो गए तथा अपना शीश नवा दिया और धन पाकर दान तथा साधु सेवाको ग्रहण किया, उनके निमित्त भक्ति और मुक्तिका द्वार खोला जावेगा । वह मनुष्य जिसने ऐसा ध्यान किया कि, मैं तुच्छ सेवक हूँ और जितनी मूर्तियाँ हैं, सब मेरे अधीन और सत्य गुरु हैं । और सब जीवोंमें उसकी कान्ति जाने तो मुक्तिका अधिकारी है ।
मैं अपने कार्योंका अधिकारी नहीं वरन् सत्यगुरुसे सहायता माँगते रहना कि, वह मेरी मनकामना पूर्ण करें और भले कार्योंमें सदैव उद्योग करते रहना ।
मैं नहीं जानता कि, मैं क्या हूँ और मेरा परमेश्वर क्या है, इस कारण सत्यगुरुपर पूर्णतया निर्भर रहना कि, जब वह मुझको दृष्टिप्रदान करेगा तब मैं जानूँगा ।
कालपुरुषके जितने धर्म पृथ्वीपर प्रचलित हैं, सबमें वैष्णव धर्म श्रेष्ठ—और सबका सरदार है । यह सतोषुणी धर्म है । इस धर्मके नियम तथा इसकी आज्ञाएँ सत्यपथकी सीढ़ी हैं और सत्यपथ परम धामकी सोपान है ।
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कबीर चरित्रवोध
( १८५१ )
सत्यगुरु कबीरका नाम बंदीछोर है । और वह सर्वाधिकारी है जिसको चाहे मुक्ति प्रदान करै, जिसको इस बातका पूर्णतया विश्वास हो गया उसका बेड़ा पार हुआ ।
सत्यपुरुष और कबीर साहबको जिसने एक जाना उसका बंधन टूट गया और कालके पक्षेसे छूट गया । तन मन धन गुरुके अर्पण करना तो भलाईका निचोड़ है, परन्तु अपनी कमाईसे दशवाँ भाग देना गुरुका हक है । बुद्धिमान् पुरुषही मुक्तिका भागी होता है ।
जो कोई मनुष्यताकी श्रेणी प्राप्त करने योग्य है, उसीमें बुद्धि होती है । पशु सुन्दर मनुष्य हैं-उनमें बुद्धि नहीं होती है ।
पारख गुरु प्रत्येक स्थानोंपर उपस्थित है, परन्तु जबल्लों उसके पथमें अपनेको मैं न्योछावर न कहूँ तबल्लों उसका दर्शन न होगा ।
सब झूठे झूठोंके साथ मिलते हैं-जो कोई सत्यका प्रेमी होगा वह झूठेके साथ कभी योग नहीं देगा ।
यह तीनों लोक विषवृक्षका फल है । और प्रत्येक वस्तु प्रत्येक खाना तथा मकानमें विष भरा हुआ है बिना सत्यगुरुकी भक्तिसे वह विषयोंसे बहिर्गत नहीं होगा और न किसी अन्य युक्तिसे पृथक् हो सकता है ।
जान बूझकर विष खाना मनुष्यताके विरुद्ध है । आप सत्य पुरुषकी भक्ति करना और दूसरोंसे करवाना और करते देखकर प्रसन्न होना-वंदना है ।
प्रत्येक मनुष्य बिना जाने बूझे अपने २ धर्मकी ओर खींचता और द्वेष करता है । परन्तु मनुष्य वह है कि, जो द्वेषरहित होकर वह धर्म हूँदे जिससे उसके आवागमनका मार्ग एकबारगी ही बंद हो जावे ।
( १८५२ )
बोधसागर
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मनुष्यके चार चक्षु हैं परन्तु पशु चारों चक्षुसे अंधे हैं, यद्यपि उनकी आँखें प्रत्यक्षमें खुली हुई हैं, तो भी वे अन्धे माने जाते हैं। इस कारण कि वे देखकर भी घातक मार्गसे नहीं टलते। इस कारण वस्तुतः वे पशु मनुष्यके स्वरूपमें हैं।
पशुओंकी मानवी शिक्षा रुचिकर नहीं होती—जैसे चोर, डाकू, व्यभिचारी इत्यादि सत्संग तथा सत्य पथसे भागता है।
सत्यपुरुषके जो अंकुरी जीव हैं वे सत्यगुरुकी शिक्षा सुनकर ऐसे दौड़कर मिलते हैं—जैसे लोहेसे चुम्बक चिपट जाता है। और जो काल पुरुषके जीव हैं उनपर सत्यपथकी शिक्षाका कुछ प्रभाव नहीं पड़ता है।
दान, वीरता, न्याय और धर्म इन चारों गुणोंकी शिक्षा सब लोग करते हैं, परंतु सत्यगुरुके साथ नहीं करते, इस कारण उनकी कामना पूर्ण नहीं होती।
यह कलियुग अत्यन्त कठिन समय है। इसमें पापीकी ओर तो तुरत मनुष्योंकी रुचि होती है और पुण्यसे दूर भागती है, ऐसी अवस्थामें सत्यगुरुके शरणके अतिरिक्त और कोई दूसरा उपाय नहीं है।
हलाकके भोजनसे हृदयकी स्वच्छता होती है।
जो कोई न्यायी बादशाहके सामने पाप करेगा और अत्याचारपर बद्धपरिकर होगा तो उसका सत्यानाश होगा। ऐसेही जो कोई कबीरपंथमें प्रवेशित होकर पापकी ओर चित्त लगावेगा, तो उसकी दशा बड़ीही दीन होगी।
जिसको अपने गुरुपर सच्ची श्रद्धा है उसकी बुद्धिपर पिशाची बल काम नहीं करता है। उसकी बुद्धि बदल नहीं
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कबीर चरित्रबोध
( १८५३ )
सकती है और न काल किसी प्रकारकी बाधा उपस्थित कर सकता है ।
जो कोई अपने गुरुसे सच्ची प्रीति करेगा उसका विश्वास अचल रहेगा और उसकी बुद्धि स्वच्छ रहेगी । विना गुरुके मनुष्यके हाथका जलपान पर्यंत उचित नहीं है ।
कबीर साहबका रेखाता
खलक है रैनका सपना । समझ दिल कोई नहीं अपना ॥ कहीं है लोभकी धारा । बहा जग जात है सारा ॥ घड़ा ज्यों नीरका फूटा । पतर जैसे डारसे दूटा ॥ ऐसी निर्जान जिदगानी । अजौं क्यों न चेत अभिमानी ॥ सजन परवार सुतदारा । सभी उस रोज हों न्यारा ॥ निकल जब प्राण जावेंगे । कोई नहीं काम आवेंगे ॥ निरख मतभूल तन गोरा । जगतमें जीवना थोरा ॥ तजो मद लोभ चतुराई । रहो निस्संग जगमाहीं ॥ सदा जिन जान यह देही । लगाओ सतनामसे नेही ॥ कटे यम कालकी फाँसी । कहें कबीर अविनाशी ॥
यथा
साँई यादमें रहना, नहीं यह जिन्द जावेगा । करो उस पीरकी बन्दगी, तुझे यारां लखाऊंगा ॥ बना है खाकका खेला, इसीमें खोज पावेगा । मुझे मुर्शिद मेहर मनशाल, गो दीदार पाया है ॥ मुझीको देखले परकट, किसी से न छिपाया है । कबीरा पीर है साचा, सकलमें आप छाया है ॥
यथा
समझ दिलसोच अबकीना । मुर्शिदसे पूछ नालीना ॥
(१८५४)
बोधसागर
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कहाँसे रंग यह आया । न काहूँ मोहिं बतलाया ॥ सुरति बहि रंगकी प्यारी । पपरा भये हैं वनवासी ॥ न आवे हाथ वह करनी । सिधारो जाय गुरु शरनी ॥ मुझे मुर्शिद मेहर करके । मुरीदी मन सिखाया है ॥ किताबें खोल दिल अन्दर । हकीकत निज बताया है ॥ कि है कोई गैबका वासी । दिखावे खेल परकासी ॥ बसावैं गैबका खोरा । मिटावे भर्मका फेरा ॥ अचम्भौ देश है न्यारा । लखे कोई नामका प्यारा ॥ दिया जिन प्रेमका प्याला । सोई हैं संत मतवाला ॥ कि निशिदिन मोह ना भूले । विरहकी झोंकमें झूले ॥ चरण कबीरको ध्यावे । इलाही ज्ञान भर पावे ॥
पद
हैली तीरथ जाय बुलाए । रे हरदम परब नहाये ॥ तीरथ कोटि अनन्त हैं रे गंग यमुन जहाँ दुई । मध्य सरस्वती बहत है रे नहाय निर्मल होवे ॥ ब्रह्म अग्निके घाटमें रे आगे शिवके लिंग । ताहुपे दछिना दीजिये रे बहुत सहसमुख गंग ॥ आगे कलालीकी हाट है रे चोखा फूल चुनन्त । बिन सदगुरु पावे नहीं रे कोई साधू जन पीवन्त ॥ शीश उतार धरणी धरे रे ऊपर धरले पाए । ब्रह्म अग्निके घाटपे रे इस विधिपर बेनहाए ॥ ऋग यजुर साम अर्थनवारे चारों वेदका ज्ञान । उनके वहां कहो कौन गति रे बांधे गांठ पखान ॥ चारों वेदको पिता है रे सूक्ष्म वेद संगीत । साहब कबीरजूके मुकद्दमेरे अविगतब्रह्म अतीत ॥
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कबीर चरित्रबोध
( १८५५ )
यथा
पण्डित सतपद भाजो रे भाई । जाते आवागमन नशाई ॥ ज्ञान न उपजा ब्रह्म नहीं चीना आप कहाँते आए । एक योनिसे चार बरन भए ब्रह्मदेह कहा पाए ॥ बारह वेदी ब्रह्म बखान् स्वर औ शक्ति समानी । संध्या तर्पन तहां करलीना जहां कुशा नहीं पानी ॥ ऋग यजुरज्ञानको बुद्धी साम अर्थवेन सोई । सूक्ष्म वेदको भेद न जाने कयोंकर ब्रह्मन होई ॥ शूद्र शरीर ब्रह्म तेहि भीतर भिन्न भेद कछु नाहीं । लखचौरासी जिया जन्तुमें बरत रहो सब ठाई ॥ नौगुण सूतसंयोग बखान् तिरगुण गाँठ दयानी । तासु जनेउ कबहुँ ना टूटे दिन दिन बारह वानी ॥ कहैं कबीर गुरुब्रह्म चीन्हले जगत जनेऊ सोई । पाखण्डकी गति सबही मिटावे तब निज ब्राह्मण होई ॥
यथा
हिरवा गँवाए सास चली वारी धनियां ।
कौन सौतिन है कौन सुमन है कौन वेद तुम जानियां ॥ कौन पुरुषको ध्यान धरत हो कौन है नाम निशानियां ॥ एही तनु ओंकार सुमन है सूक्ष्म वेद हम जानियां ॥ सत्य पुरुष तो ध्यान धरत हैं सत्य है नाम निशानियां ॥ यह मत जानो हिरवा जरवा बनियां दूकान बेगानिया ॥ अलख मूलक हिरवा मोरा अगम देशते अनियां ॥ एक है चोर सकल जगमोंसे राजा रैयत रनियां ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो अलख है नाम निशानियां ॥
( १८५६ )
बोधसागर
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कबीरपन्थका प्राकट्य
जब कबीर साहबने अपना धर्म पृथ्वीपर प्रचलित किया और सत्य पुरुषकी भक्ति प्रकट की और सत्यलोका समाचार दिया तब किसीको निश्चय नहीं हुआ । और वेद तथा पुस्तकोंकी लिखावटोंको सत्य माना और चार प्रकारकी मुक्तिको मोक्षमार्ग जाना तथा कबीर साहब इन चारों प्रकारकी मुक्तिको बंधन और कालपुरुषका महाजाल बतलाते और लोगोंको वह पथ छोड़ना तथा इस पंथको ग्रहण करना दुष्कर हुआ, इस कारण सब आपके वैरी हो गये और आपके साथ ऐसा व्यवहार करने लगे इस कारण मैं उन स्थानोंको परिलक्षित किया चाहता हूँ जिनसे संसार नितांत ही अनभिन्न तथा अज्ञ है और केवल चार मुक्तिको सत्य मानते हैं जो वस्तुतः बंधन है । निम्नलिखित विवरणको देखो ।
दश सोहंगका वृत्तांत
कबीर साहबने ग्रन्थ मुहम्मदबोधमें जिन दश स्थानों का विवरण किया है वह यही दश सोहंग हैं । १-सत्यपुरुष सोहंग २-सहज सोहंग । ३-अंकुर सोहंग । ४-इच्छा सोहंग । ५-सोहंग सोहंग । ६-अचिन्त्य सोहंग । ७-अक्षर सोहंग । ८-निरञ्जन और माया सोहंग । ९-ब्रह्मा विष्णु और शिव सोहंग । १०-समस्त जीव सोहंग ।
यह दश सोहङ्ग हैं और समस्त संसार सोहङ्ग है । जिसका गुरु जहांकी सूचना देगा वह उसी स्थानको पहुँचेगा और समस्त जीवोंमें वह प्रवेशित हो रहा है और समस्त शरीरसे यही शब्द निकल रहा है और समस्तका निचोड़ तथा सिद्धांत यह है कि इसके ध्यानसे ज्ञान है और उससेही शान्ति है ।
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कबीर चरित्रबोध
( १८५७ )
जितने पृथ्वीके मनुष्य हैं सो सब इस विषयसे एकबार-गीही अनभिज्ञ हैं, उन लोगोंको केवल चार प्रकारकी मुक्तिकी सुध है और जितने अवतार पीर पैगम्बर पृथ्वीपर प्रकट हुए सो सब निर्गुण तथा सगुणका समाचार देते रहे । वेद तथा अन्यान्य पुस्तकोंमें इस बातका तनिक भी विवरण नहीं है कि, सत्यपुरुष कौन है । सब अचेत निद्रा तथा धोखेमें पड़े और कालपुरुषो अपना पथदर्शक और मुक्तिदाता समझने लगे और जितने पीर पैगम्बर हुए किसीने भी सत्यपुरुषका स्थान स्वप्नमें भी नहीं देखा और न जाना । सब निर्गुण तथा सगुणका समाचार देते चले आये । यदि उनसे कहा जावे कि, तुम भूलकर यमके फंदेमें न पड़ो तो उनको कदापि निश्चय नहीं होता । अनुग्रहीत होनेके स्थान वैर तथा विरोध करनेपर बद्धपरिकर हैं और कबीर साहबके धर्म प्रचलित करनेके समयसे आज पर्यंत कबीरपंथियोंके मतको सुनकर लोग अप्रसन्न होते हैं और तीर्थ व्रत मूर्तिपूजा आदिको भला समझते हैं और लोक तथा वेदकी आज्ञाओंको सर्वोत्तम समझते हैं और सत्य पुरुषकी भक्तिसे भागते हैं । कोई बड़ाभागी इस भक्तिमें लगता है इस भक्तिबिना किसीको पथ नहीं मिलेगा
कबीर साहबने दश स्थान प्रकट किये हैं उन दश स्थानोंके निमित्त इस प्रकारकी विद्याएँ कही हैं । १-शरीअत । २-तरी कत । ३-हकीकत । ४-मारफत । ५-तरोवहत । ६-ध्यान दोर हियत । ७ जुलकार चन्द्रगी । ८-हुकम सुरतिद । ९-दण-नाका । १०-शब्दसार ।
यह दश प्रकारकी विद्याएँ हैं । जिस किसीको जहाँका ज्ञान देता है उसी स्थानको पहुँचता है बिना विद्याके कोई
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बोधसागर
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पहुँच नहीं सकता । जिसके गुरुकी जहाँलों पहुँच है वह अपने शिष्यको वहीँलों पहुँचा सकता है । वेद और पुस्तकों द्वारा तो केवल चार प्रकारकी विद्या मनुष्य प्राप्त कर सकते हैं । कर्म जो है उसकी पहुँच नासूत स्थानपर्यत है । उपासना मलकूत पर्यत पहुँचाती है । योग जीवहृत स्थानमें स्थित करता है । जहाँ सहस्र पंखुड़ियोंका कमल है और अलख निरञ्जन ज्योतिस्वरूप रहता है । निर्विकल्प समाधि लगाकर योगी लोग उसी स्थानपर्यत जा पहुँचते हैं और जिसको मार्फतकी श्रेणी प्राप्त हो और उरफानकी विद्याका प्रकाश धारण किये हो वह लाहृत स्थानको जाता है । लोक और वेद द्वारा मनुष्योंके निमित्त ये चार स्थान ठहराये गये हैं । अचिन्त्य द्रौपपर्यत कभी कभी कोई कोई साधुओंमेंसे इंगित करने वाले हैं, मनुष्यको इससे पारका समाचार तनिक भी नहीं है, सब व्यर्थही हवाई बांधते और मुक्तिमार्ग बतलाते फिरते हैं और समस्त धर्मके मनुष्य प्रण रोपते हैं कि, हमारे धर्ममें मुक्ति है, और कोई कहीं नहीं पा सकता । जीवरूप स्थानमें तीनोंका सृजन कर्ता रहता है और उसीकी वंदना सब करते हैं और उसीके द्वारा चार प्रकारकी मुक्ति और समस्त स्वर्गोंका सुख प्राप्त करते हैं और इन समस्त स्थानोंमें शारीरिक आनन्द तथा पाशविक कामनाके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है । त्रियाती-तकी श्रेणी जिसको वेद सबसे बढ़कर बतलाता है, इस श्रेणीमें अलख निरञ्जन अधिकृत है और जितने साधुगण उस श्रेणीको हस्तगत कर लेते हैं सो सब उसके समान हो जाते हैं और सब सृष्टिकी रचना करनेकी सामर्थ्य रखते हैं । और सबका हृदय उस विद्यासे प्रकाशित है और समस्त
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कबीर चरित्रबोध
( १८५९ )
सिद्धियां उनके वशमें हैं और वे सब अपनी रचनाके रचयिता और स्वामी हैं और वे लोग जगत्प्रभु कहलाते हैं। सांसारिक मनुष्योंमें वह बल और बुद्धि कहाँ है कि, साधुओंके भेदको पहचान सकें। ये बातें केवल सत्यगुरु द्वारा प्राप्त होती हैं जिनके ऊपर पारख गुरुकी दया हो वह इस विषयको जान सकता है और किसी मनुष्यमें इतना पौरुष नहीं। सात स्वर्ग, सात द्रौप, पृथ्वी और नरक यह ब्रह्मांडके इक्कीस भाग सब निरञ्जनके अधीन हैं और सबके ऊपर वह आज्ञा चलाता है। सात द्रौप जो पृथ्वीके हैं उनमें भांति भांतिके सुख दुःख हैं और जो सात स्वर्ग हैं उनमें बहुतसे सुख हैं पर वहाँ यह दुःख है कि, एक दूसरेकी ईर्षासे जलते रहते हैं और स्वर्गके लोगोंको किसी सीमापर्यन्त ज्ञान होता है कि, अब हम स्वर्गसे गिर पड़ेंगे और हमारा सब सुख पृथक् हो जावेगा और आपत्तियों तथा दुर्दशाओंमें फँस जावेंगे, इस दुःखसे वे अत्यन्त कातर-तासे विलाप करते और दुःख करते हैं, अन्त उनका स्वर्गीय शरीर छूट जाता और वे पृथ्वीपर आकर जन्म लेते और जैसे उनके ध्यान अच्छे अथवा बुरे होते हैं वैसा ही चोला वे पाते हैं। और जितने स्वर्ग हैं और क्रमानुसार जिस प्रकार एक दूसरेके ऊपर हैं वैसे ही उनका सुख विशेष होता जाता है। जैसे २ ऊपर हैं वैसे ही वैसे सुख तथा आनन्दका आयोजन विशेष होता जाता है और नीचेके विभागोंमें न्यून है। और वह सब सुख अस्थायी तथा अल्पकालिक हैं। कुछ समयके उपरांत स्वप्नके समान भंग हो जानेवाले हैं। सो सब स्वर्गों और चारों स्थान जिनको वेदने मुक्तिदाता कहा है यहाँलों मनुष्योंको ज्ञान होता है इसके आगे कोई कुछ नहीं जानता। परन्तु
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बोधसागर
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कबीर साहबने कहा है कि, ब्रह्मा विष्णु तथा शिव ये जो तीन देवता हैं वे सहज द्रौपपर्यत पहुँच सकते हैं इसके आगे किसी-को तनिक भी सुध नहीं है। तीन देवता सहज द्रौप पर्यतकी सुध रखते हैं परंतु मनुष्योंसे वे नहीं बतलाते, अपना भेद अपने मनमें रखते हैं और भलाई बुराईके समस्त कार्योंका रचयिता निरञ्जन हैं, भलाई करो तो स्वर्ग और वैकुण्ठमें जाय, यदि बुराई करे तो नरकमें प्रवेशित हो, चाहे मृत्युलोकमें जन्म लेता रहे। जैसे आकाशके सुखका विवरण है वैसे ही नरकयंत्रणा अत्यन्त भयानक है। सुतरां मुसलमानी पुस्तकोंमें मैंने पढ़ा था कि जिस समय हजरत दाऊद नरकयंत्रणाका विवरण किया करते थे उस समय सुननेवाले बेतरह रोते तथा तड़पते और कितने भयके मारे मर जाते थे।
और लिखा है कि एक बेर नरकयंत्रणाको सुनकर सत्तर मनुष्य मारे भयके मर गये। और स्वयम् दाऊद ऐसा रोता था और तड़पता था कि, अचेत हो जाता था। और ऐसा हाथ पाँव और शिर पीटता था कि, उसकी लौडियाँ और लोग लासको पकड़ लेते और वह अत्यन्त विह्वल तथा बेशुध हो जाता था और दाऊद यद्यपि बादशाह था तथापि समस्त निशा वह ऐसा रुदन किया करता था कि उसका बिछौना भीग जाता था और जब वह परमेश्वरके प्रेममें गाता और नाचता तब स्थावर तथा जंगम हिल जाते थे।
और कबीर साहबकी आज्ञा है कि, जिसमें परमेश्वरका भय नहीं है और हार्दिक प्रेम नहीं है वे कदापि मुक्ति नहीं पा सकेंगे सो समस्त पीर पैगम्बरों और सिद्ध साधुओंका सच्चा
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कबीर चरित्रबोध
(१८६१)
गुरु कबीर साहब हैं जिनमें परमेश्वरका भय और सच्चा प्रेम पाता है उनको परमधामको पहुंचाता है और सबकी ओर दया तथा उदारताको समान दृष्टिसे देखता है। अब जानना चाहिये कि, यह काल पुरुष इस प्रकार भय तथा यंत्रणाकी अवस्थामें फँसाकर बंधनमें डाल देता है, किसी युक्तिसे किसीका छुटकारा होने नहीं देता है और तस शिला पर सबको भून भूनकर खाया करता है जैसे भेड़ बकरी तथा गऊ कसाईको प्यार करती हैं जिनका परिणाम प्रकट है, ऐसाही मनुष्य निरअनको प्यार करके उसका फल पाते हैं। और हांक मार २ कर कबीर साहब कहते चले आते हैं तो भी लोगोंको विश्वास नहीं होता है।
माया सृष्टि और पिण्डब्रह्मका जो समस्त मिथ्या बाँधन है इन सबका रचयिता निरअन है। जो कोई इस मिथ्या जाल तथा कामके वशीभूत होकर रहेगा वह कदापि सुक्ति नहीं पावेगा।
इस प्रकार कबीर साहबने अपना ज्ञान और शिक्षा पृथ्वी पर प्रकट की और लोग आपके वैरी हुए कारण यह कि, लोगोंका चित्त कामक्रोधादिके प्रपञ्चमें फँसा हुआ है और उनकी बुद्धि कालसे घिरी हुई है।
जबलों मनुष्योंके चित्तमें सुबुद्धि और स्वच्छ कामनाएँ उत्पन्न नहीं होतीं तबलों यह निश्चय कालका भोजन होता जाता है जब सुबुद्धि होगी तथा अच्छे विचार मनमें उदित होंगे तब तो कदापि कालकी राहमें न चलेंगे। सो थोड़े लोग हैं जो आपत्तिमय पथ देखकर भागते हैं और अभागे अपनी हठसे नहीं हटते।
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बोधसागर
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सारखी-कालको जीव माने नहीं, कोटिन कहूं बुझाय । मैं र्वीच्छू सत लोकको, बांधा यमपुर जाय ॥ बहता है बहजान दे, बहैं लगावन ठौर । कहा हमारा न आदरै, छों धक्का दो और ॥
इस प्रकार कबीर साहबका धर्म पृथ्वीपर प्रचलित हुआ । और वैरी और दूत भूत सब निराश हो गये किसीका कुछ वश नहीं चला । जो समर्थ धनी स्वयम् सत्यपुरुषने धर्म प्रचलित किया फिर किसोका सामर्थ्य थी कि, रोक सकता ? ऐसा वेगसे चला कि, लाखों सेवक और शिष्य हो गये और सत्य कबीर और सत्यनामकी पुकार समस्त संसार में पड़ी । किसीके रोके रुक नहीं सका । पश्चात् कबीरपंथ स्थापित करके कबीर साहब सत्यलोकको गये ।
कबीरपंथकी स्थापना
पहले मैं वर्णन कर आया हूँ कि, सत्यपुरुषने कहा कि, ऐ ज्ञानीजी ! पृथ्वीपर जाओ और सुकृतिजी ( धर्मदास ) को जगाओ, वह भूलकर मूर्तिपूजक हो गये हैं उनको उनकी अचेत निद्रासे जाग्रत करो और सत्यपुरुषकी भक्तिमें लगाओ और सत्य पंथ पृथ्वीपर प्रचलित करो । और बयालीस वंश नियत करके कलियुगके मनुष्योंका उद्धार करो । सत्यपुरुषकी आज्ञानुसार कबीर साहबने धर्मदासको जगाया और सत्यपुरुषकी भक्तिमें लवलीन किया । फिर चारों दिशाके चार गुरु नियत किये ।
चार गुरुका वृत्तान्त
पहले गुरु धर्मदासजी हैं और उनको उत्तरके ओरकी गुरुवाई प्रदान की है और उनके बयालीस वंश हैं । दूसरे चतुर्भुजदास
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कबीर चरित्रबोध
( १८६३ )
उनको दक्षिण ओरकी गुरुवाई प्रदान की गयी और सत्ताईस वंश हैं । तीसरे गुरुराज बंकजी हैं । उनको पूर्व ओरकी गुरुवाई प्रदानकी गयी और उनके सोलह वंश हैं । चौथे गुरु सहतीजी हैं और उनके सात वंश हैं और उनको पश्चिम ओरकी गुरुवाई प्रदान की गयी । ये चारों गुरु चार ओर ठहराये गये हैं और जब ये चारों गुरु चारों ओरसे सत्यनामका डंका बजावेंगे तब कबीर साहबका धर्म भलीभाँति पृथ्वीपर प्रचलित होगा । इन चारों गुरुओंमें केवल धर्मदासजी अबलों प्रकट हुए और उनकी वंशगद्दी स्थिर हुई । और पूर्वोक्त लिखित तीनों गुरु अबलों प्रकट नहीं हुए जब वे भी प्रकट हो जावेंगे तब इस धर्मका प्रचार विशेष होगा । अब तो केवल धर्मदासजीके वंश बयालीसका विवरण करता हूँ ।
धर्मदासके बयालीस वंशका वृत्तांत
धर्मदासके बयालीस वंशका यह ठीका सत्यगुरुने ठहराया है कि प्रत्येक वंश पच्चीस वर्ष और बीस दिवसों पर्यंत गद्दीपर बैठा करे और इससे अधिक तथा न्यून कोई न रहे । और सत्यगुरुकी आज्ञानुसार उनका अवतार और उनका अधिकार होता आता है । फिर वे अपनी इच्छासे शरीर छोड़ कर सत्यलोकको सिधारते हैं । जिस दिवस साहबका चलना होता है उसके पूर्व अनेक सन्त महन्त दर्शनार्थ एकत्रित होते हैं और जिस दिवस पच्चीस वर्ष तथा बीस दिवस पूरा होता है उस दिवस जो गद्दीका अधिकारी होता है उसको अपने स्थान गद्दीपर बैठा देते हैं और समस्त कार्य सौंप देते हैं । जब सब कार्य ठीक हो चुकता है उस समय आय पानका बीड़ा लेते हैं इसको चलानेका बीड़ा कहते हैं । जब वह चलाने-
( १८६४ )
बीधसागर
८०
का बीड़ा लेते हैं उस समय हंस तो सिधार जाता है और शरीर ठंडा हो जाता है और उस शवकी समाधि कर देते हैं। इतना कौतुक कबीर साहबका अबलों पृथ्वीपर प्रकट है। यही लोग अपने चेलों सहित इस भवसागरके मांझी और नावके चलानेवाले हैं।
चारों गुरुकी प्रशंसा—उर्दू सेर
गुरु चारको पहले ताजी मकर। सातएं शकुनी स्वामए हाथ धर॥ गुरुवार सतगुरुकदमके हैंखाक। चढ़े अर्श ऊपर शबद बादपाक॥ मोअज्जित हुए खाक खाकीहुए। बाहरखू रजाजू खुदाकी हुए ॥ बुजुरगी किया अजमुबारकजबाँ। बनाया इन्हें दुजदके पासबाँ ॥ बअतराफ चारों निगहबाँ किया। मकाँ मुक्तिके चार दरबाँ किया॥ जहां बैठे वहकादिरे जुलजलाल। किबरतरुतशाहंशहीला मिसाल वजीरान चारों खिरदमंद हैं। यह अरकाने दौलत खुदावंद हैं॥ जबानिब जहाँमें किया चार हैं। बहर सिम्त यक यक मददगार हैं॥ जो इनसाँको सतगुरु हजूरी करें। निजाते शफाअतासो पूरी करें॥ परमधाम पहुँचावे चारों वजीर। चले साथ ले मर्दुमाने अफीर॥ धरमदासऔवलब सिमते शुमाल। किरोशन है जिसकी मुहब्बतकमाल यह औवल गुरु सबके शिरताज हैं। कि सब आदमी पैरवाँ आज हैं॥ बयालीसवंश उनके रोशनजमीर। मुकाबिल है जिसहेच बद्रे मुनीर॥ गुरु दूसरे हैं बजानिब जुनूब। चतुर्भुजसाहबजिवअमाबरुशखूब सत्ताईस वंश उनके हैं ताजदार। दखिन देशके आदमीबाजदार ॥ गुरु तीसरे रायबनके बशिक। लियातरुत ओ ताजशाहीबफकी॥ सोलहवंशले हुकम जारी करें। जो सतगुरुतवरसल तयारी करें॥ गुरु चौथे सदते बमगरब कहे। बमै सात फरजंदके छिप रहे ॥ ये चारों गुरु मुक्तिके रास हैं। फकत एक जाहिर धरमदास हैं॥
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कबीर चरित्रबोध
( १८६५ )
धरमदासका सब पसारा हुआ । जहाँमें जहाँतक हजार हुआ ॥ न अबतक वह जाहिर गुरु तीन हैं। कि सतगुरुके फरमान आधीन हैं॥ गुरु चार दुनियाँमें जब आयेंगे । नहजदे करी दौर दिखलियेंगे ॥ तो सारीजमीमें हो यह गुलगुलः। है सतनामसतऔर सब बुलबुलः॥ सिलहशोरतीनों कभी गाहमें । है पोशीदः सतगुरु हुकुम चाहमें ॥ निकल जब पड़ीं फौजसालार तीन । हो सुक्तिसे मामूर सारीजमीन ॥ बमै वंश चारों हुकुम पायेंगे । शपातीं किधरके किधर जायेंगे ॥ पड़े शोरआलममें सत् नामका । हो शोदरः निजाते सरअज्जामका ॥ बहर सिम्र डंका है साहब कबीर । फिरें बोलते सत्यनाम सफ़ीर ॥ गुरु चार सतनाम डंका दिया । पुरुषकालके दिलमें सनका दिया ॥ बहरसू जुझाऊ बजे डट्टठोल । कि सबकैदियोंकीही जंजीर खोल ॥ बजै झांझ औ शंख मिरदंग जो । जिसे देखते दूत दल दंग हो ॥ न वे जूर पुर नूर है सब समात । तुलू महहै कटगई सारी रात ॥ गुरु चार हरजाय बोले नकीब । न बाकी रहा और कोई है कीब ॥ करे गुफतगू उनसे जो दूबदू । मती सारे उनके न कोई अदू ॥
धर्मदास साहबके बयालीस वंशकी प्रशंसा ।
उर्दू शेर
धरमदासके जो बयालीस वंश । सो सब सत्य सुकृतिके रूपहंस ॥ जुदागानः तारीफ़ उनकी लिखैँ । कदमदतकेपर अपने शिरकोरखैँ ॥ है औवल मचन वंशचौरामनी । गुरु सत्यमारग धरमके धनी ॥ कि इनसांका जिसमें गुजारः हुवा । परमपुर्ष यह पर नजारः हुवा ॥ वचन जो सतगुरुका अवतार है । उसीके महर्जीव भवपार है ॥ सुदर्शन साहब दूसरे नाम जो । करे जीव भवपार कण्डहारसो ॥ जोकुलपतिसाहबतीसरेनामदार । पनह जिसके सबजीवहों कामगार ॥ जोपरमोदगुरुचैथेबाला हैं पीर । सोशाफीबनाजीजेखतर खतीर ॥
नं. ११ बोधसागर - १
( १८६६ )
बोधसागर
८२
कमलनाम साहब कहुँ पाँचवाँ । जगतके गुरु पीर सो बेगमाँ ॥ हैं छठएँ खुदावन्दनामेअमोल । किजिसखौफसेभागजायमकेगोल॥ जो सूरत सनेही साहब सातवाँ । कि जंगी मेहर देखिये आतमाँ ॥ जो पैदा हुए आठवें नामइक । मलिकमौतका होगया सीनःशक ॥ नवैपाकसाहब हुए नामपाक । सरमभूतको सो मिलाया है खाक॥ प्रकट नामसाहब प्रकट हैं दहम । किसामानमुक्ती किया सोबहम॥ धीरजनामसाहबइग्यारहवें जो आये । किधीरजनिगहजीवधीरज हुए॥ उगरनाम साहब हुए बारहवें । परमपंथ परचार इस अहदमें ॥ तेरहवीं उदय पहने आदमकबा । तोजमशेर गुराँभगाहुम दबा ॥ हुई तेरहवीं कुरसी आली दिमाग । कि दरजा हरेहोगयेखुशकबाग॥ हुवा जोर वो शोरसंतनामको । सला है करमखास ओ आमको॥ मिलीं बारहों पथ इस अहदमें । सतायश करें गुरुकी यकमहदमें ॥ कुरु नामसाहब कहे चौदहवाँ । कि जिनकी बुजुर्गी बदरहो जहाँ॥ जो परकाश परकाश हो रही । सना इन्द्रअस्त नाम दरजा कहीं॥ उदितसोलहवीं साथ जोशन हुए । तो जम जङ्गमें नाम रोशनहुए॥ किजब सत्रहवींहोवें साहबसुकुन्द।हुएकालके दाँत इसवक्त कुन्द॥ अरधनाम अट्टारवी दर्दमंद । कि आवागमनकी किया राह बंद॥ जो उन्नीसवीं नाम ज्ञानी गुरु । करै जीवको पुर्षके हबरू ॥ कहो बीसवीं साहब हंस मन । न जिनसे लगे कालका कोई फन ॥ सुकृतिनामसाहबहुएबीसएक । तो सुरकीरतकी जगमें रहैखुब ठीक॥ अरजनाम बाईस जाहिर हुए । तो इनसां परमपदके माहिर हुए ॥ हैरसनाम साहब जरसबीस तीन । सुन आवाजताबेहुई सबजमीन॥ हों चौबीसवीं गंग मुनिसाहब गुनहसे हों सब आदमी तायब ॥ पुरुषनामसाहबदरसबीसपाँच । नजिउकोलगेसंगेसोजाकी प्राँच ॥ छबीसवीं जाग्रतनाम साहब जगे । नइनसाँकोरहजनवठगतबठगे ॥
८३
कबीर चरित्रबोध
( १८६७ )
हुए भृगुमुनि साहब सातबीस । रहेरास्त दुश्मनदियाजिसनेदींस ॥ अस्त नामसाहबकहेबीसआठ । कियमदूतकोजोदियामारकाट ॥ हैं उन्तीसवीं साहबकंठ मुन । कियाकालको मारकरसो दफन ॥ हैं सन्तोष मुनिसाहब तीसवें । पयान पुरुष आवें इस अहदमें ॥ यह खुशवक्त दैरांदिखाया हमें । परमपुरुष पैगामा आया हमें ॥ जमीं सारीसतनामकी हाँकहै । तोदरकौमको सुत्तिकी झाँक है ॥ हुई सारे आलममेंयहधूमधाम।तअस्सुबत जो और भजोसत्यनाम॥ जमी सारी पर हुक्मरानी हुई । बाहर कौमपर मेहरबानी हुई ॥ यहूदी तिसार मुसलमां हिन्दू । पढ़े कमलये सत्यनामसे हुरूदा ॥ चातर्कनामसाहबकाएकतीसदौर । जमींपरनबाकीरहेयमकाजोर ॥ बत्तीसवेंबरामदहुएआदिनाम । हुएसारेनफसानीहरकतगुलाम ॥ हैं तेतीसवें वेद नामें बुजुर्ग । कि जिस सामने हो न शैता सतर्ग ॥ साहब आदिनाम हुए तीस चार । कि उसमेहसेजीवहों कामगार ॥ महानाम साहब हैं पैँतीसवाँ । जमीपरहुवा है अमन ओ अमाँ ॥ छ्तीसवें हैं निजनामसाहबखदीन । नबाकीरहेरेवकुछनफसदेन ॥ साहबदाससाहबकासैतीसअक्ष । दियबारशइनसानकेजिसने वक्ष ॥ उदयदाससाहबहों अडतीस पुश्त । इलमतिलमसबमें न कोईदुरस्त ॥ कुरदनामसाहबकानौतीसवक्त । बहरहोजहाँजिनकोहैताजोतरक्त ॥ चेहले हग मुनीसाहबनामले । तोसत्यलोककोआदमीसबचले ॥ महामुनि साहबनामचालीसएक । बदी बेखकुन आदमीसारेनेक ॥ बयालीस मुक्तामनी साहब है । आखिर जमां सत्पुरुष नायब है ॥ यह जबतक बयालीस पीढ़ी रहे । परमधामकी जगमें सीढ़ी रहे ॥ बयालीसका जबतलक नाम है । नकब्बीरका जगतमें काम है ॥ यह सद्गुरुकेसबहंस हैं जानशीं । परमपुरुषके सारशब्द अभी ॥ बयालीस जबतक रहेंगे वजीर । जहाँमें न जाहिरफिरेंफिर कबीर ॥
( १८६८ )
बोधसागर
८४
बहर एक करमाँ खाईं खिताब । कहे हैं खुदावनन्द ऐसा हिसाब ॥ बरसइनके पच्चीस ओबीसरोज । हरकेतख्तपरहोवैरौनकफिरोज ॥ हजार एक ऊपर दो पआहसाल । महेतीनदिनबीसगद्दीबजाल ॥ इतेरोज सतपुर्ष फरमान है । जो आवे शरण सोईं निर्वान है ॥ जो सतपुर्षके हंस गायब हुए । न होंबहरःवरकोइजो साहब हुए ॥ यहकलियुगमेंसतयुगगुजरजायगा । पुरुषकालकाअहदतबआयगा करे आदमीफिरजोतदबीरकोट । कर्मीसोसकेनाबचाययमकी चोट ॥ मेरी बात जो कोइ जाने दरोग । कभीफेर उसको न होवे फरोग ॥ परमपुर्ष पीरों शनासिन्दगाँ । उसी लोक जावैगे सो वन्दगाँ ॥ यहकलियुगमें सतयुगलगी हैलडी । वहरसिम्तहैआवेहैवांवाझाड़ी ॥ हैंगुरुमुखकोईउसकेनोशिन्दगाँ । जोसतगुरुमोब्बतमेजोशिन्दगाँ ॥ जोउसगुरुकेमिलनेकीकोशिशकरे । अजरओअमरजामःपोशिशकरे जो पहचानसोईं हैं शाहशहाँ । न जाने जिन्हें आदमी इवलहाँ ॥ बयालीसका जबसे ठीका हुवा । नइनसानका बाल बीकाहुवा ॥ यह माहूद ठीका जो पूरा हुवा । तो यमजालका फिर जुहरा हुवा ॥ मो इसअदहमें हो कोई बख्तमंद । जेदे बामबाला बनामैं कर्मद ॥
गजल
बयालीसवंशतगुरुकीनिशानी । हैं बखशिन्दःहयातेजानहानी ॥ उसीहमशक्कु सबनाखुदायह । रहे दुनियामें जबतक यह कहानी ॥ सनारुवानीहैंकरतेहंसजिनकी । कहे सौबारसत गुरुखुद जबानी ॥ तमीजो अबल से खुद पर्वलीजे । मकामें हंस आये कामकानी ॥ दरोगोंरास्त अब पहचाना होगा । जो मुतफार्क करेंगे दूधपानी ॥ कदमउनकेपकड़परवाज कर अब । गुजरबग चालसे अपने डुरानी ॥ हवासे अकू ओ हम लंगपा हैं । वहाँ पहुँचे नकुुरआं वेदबानी ॥ समझओ बूझकरलीजैखमोसी । अब जिसिकेमिलेगी आसमानी ॥
८५
कबीर चरित्रबोध
( १८६९ )
करे क्या यह बनी आदम बेचारा । मदद पावे न जबतक आसमानी ॥ पेयालाइशक पीकर मस्त होजा । जो चाहे चेहरे खुद अरगवानी ॥ पड़े खाते हैं गोता भेष पारखंड । बरहमन भाट औं मुखा कुरानी ॥ मेहर हो गाय बकरी सुरगिया । खुरावन्द मोहाफिजपासवानी ॥ उतर चलपारइसदरियाके आजिज । हुई तुझपरजौसुरशिदमेहवाणी ॥
यह चार गुरु तथा बयालीस वंश जो मुख्य कबीरपंथी कहलाते हैं उनका विवरण हो चुका । इस समय धर्मदासके साहबके वंश उपस्थित हैं और उन्हींके पंथ दिखानेसे समस्त मनुष्य सत्यलोकको जाते हैं । दश स्थानोंका चिह्न जो मैंने दिया उन सब स्थानोंका पंथ इन्हींकी दया द्वारा प्राप्त होता है और नौ स्थानोंका पार करके दशमें स्थानको पहुँचता है । इन समस्त स्थानोंके बीचमें शून्यकी डोरी लगी हुई है । वे शून्य ( खला ) की डोरियाँ हैं उन डोरियोंके भिन्न २ नाम कबीर साहबने कहे हैं । उन डोरियों पर सत्यगुरुके पंथ दिखानेसे हंस चढ़कर पार जाते हैं । जबलों पारख गुरु नहीं मिलता तबलों उन डोरियोंकी तनिक भी सुध नहीं मिलती । ये गुरु लोग भवसागरके पार उतारनेवाले हैं । उनकी प्रशंसा अनेक बेर स्वयम् कबीर साहबने की है । देखो ग्रन्थ श्वासगुआर ।
साखी-बिरछा नहीं फल भरवैं, नदी न अचवैं नीर ।
परमारथके कारणे, सन्तन धरा शरीर ।
सन्त बड़े परमारथी, धन जो बरसै आय ॥
तस बुझावे औरकी, अपनो पारस लाय ।
साधु सराहैं ताहिका, जाको सतगुरु टेक ॥
टेक बनाए देह भर, रहे शब्द मिल एक ।
सत्य शब्द हित जानके, सुमिरे सतगुरु धीर ॥
धरमदास तुम वंशको, सिरज्यो गुरु कबीर ।