भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कबीर चरित्रबोध

( १८६९ )

करे क्या यह बनी आदम बेचारा । मदद पावे न जबतक आसमानी ॥ पेयालाइशक पीकर मस्त होजा । जो चाहे चेहरे खुद अरगवानी ॥ पड़े खाते हैं गोता भेष पारखंड । बरहमन भाट औं मुखा कुरानी ॥ मेहर हो गाय बकरी सुरगिया । खुरावन्द मोहाफिजपासवानी ॥ उतर चलपारइसदरियाके आजिज । हुई तुझपरजौसुरशिदमेहवाणी ॥

यह चार गुरु तथा बयालीस वंश जो मुख्य कबीरपंथी कहलाते हैं उनका विवरण हो चुका । इस समय धर्मदासके साहबके वंश उपस्थित हैं और उन्हींके पंथ दिखानेसे समस्त मनुष्य सत्यलोकको जाते हैं । दश स्थानोंका चिह्न जो मैंने दिया उन सब स्थानोंका पंथ इन्हींकी दया द्वारा प्राप्त होता है और नौ स्थानोंका पार करके दशमें स्थानको पहुँचता है । इन समस्त स्थानोंके बीचमें शून्यकी डोरी लगी हुई है । वे शून्य ( खला ) की डोरियाँ हैं उन डोरियोंके भिन्न २ नाम कबीर साहबने कहे हैं । उन डोरियों पर सत्यगुरुके पंथ दिखानेसे हंस चढ़कर पार जाते हैं । जबलों पारख गुरु नहीं मिलता तबलों उन डोरियोंकी तनिक भी सुध नहीं मिलती । ये गुरु लोग भवसागरके पार उतारनेवाले हैं । उनकी प्रशंसा अनेक बेर स्वयम् कबीर साहबने की है । देखो ग्रन्थ श्वासगुआर ।

साखी-बिरछा नहीं फल भरवैं, नदी न अचवैं नीर ।

परमारथके कारणे, सन्तन धरा शरीर ।

सन्त बड़े परमारथी, धन जो बरसै आय ॥

तस बुझावे औरकी, अपनो पारस लाय ।

साधु सराहैं ताहिका, जाको सतगुरु टेक ॥

टेक बनाए देह भर, रहे शब्द मिल एक ।

सत्य शब्द हित जानके, सुमिरे सतगुरु धीर ॥

धरमदास तुम वंशको, सिरज्यो गुरु कबीर ।