भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1937, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1937

७५

कबीर चरित्रबोध

( १८५९ )

सिद्धियां उनके वशमें हैं और वे सब अपनी रचनाके रचयिता और स्वामी हैं और वे लोग जगत्प्रभु कहलाते हैं। सांसारिक मनुष्योंमें वह बल और बुद्धि कहाँ है कि, साधुओंके भेदको पहचान सकें। ये बातें केवल सत्यगुरु द्वारा प्राप्त होती हैं जिनके ऊपर पारख गुरुकी दया हो वह इस विषयको जान सकता है और किसी मनुष्यमें इतना पौरुष नहीं। सात स्वर्ग, सात द्रौप, पृथ्वी और नरक यह ब्रह्मांडके इक्कीस भाग सब निरञ्जनके अधीन हैं और सबके ऊपर वह आज्ञा चलाता है। सात द्रौप जो पृथ्वीके हैं उनमें भांति भांतिके सुख दुःख हैं और जो सात स्वर्ग हैं उनमें बहुतसे सुख हैं पर वहाँ यह दुःख है कि, एक दूसरेकी ईर्षासे जलते रहते हैं और स्वर्गके लोगोंको किसी सीमापर्यन्त ज्ञान होता है कि, अब हम स्वर्गसे गिर पड़ेंगे और हमारा सब सुख पृथक् हो जावेगा और आपत्तियों तथा दुर्दशाओंमें फँस जावेंगे, इस दुःखसे वे अत्यन्त कातर-तासे विलाप करते और दुःख करते हैं, अन्त उनका स्वर्गीय शरीर छूट जाता और वे पृथ्वीपर आकर जन्म लेते और जैसे उनके ध्यान अच्छे अथवा बुरे होते हैं वैसा ही चोला वे पाते हैं। और जितने स्वर्ग हैं और क्रमानुसार जिस प्रकार एक दूसरेके ऊपर हैं वैसे ही उनका सुख विशेष होता जाता है। जैसे २ ऊपर हैं वैसे ही वैसे सुख तथा आनन्दका आयोजन विशेष होता जाता है और नीचेके विभागोंमें न्यून है। और वह सब सुख अस्थायी तथा अल्पकालिक हैं। कुछ समयके उपरांत स्वप्नके समान भंग हो जानेवाले हैं। सो सब स्वर्गों और चारों स्थान जिनको वेदने मुक्तिदाता कहा है यहाँलों मनुष्योंको ज्ञान होता है इसके आगे कोई कुछ नहीं जानता। परन्तु