भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

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पहुँच नहीं सकता । जिसके गुरुकी जहाँलों पहुँच है वह अपने शिष्यको वहीँलों पहुँचा सकता है । वेद और पुस्तकों द्वारा तो केवल चार प्रकारकी विद्या मनुष्य प्राप्त कर सकते हैं । कर्म जो है उसकी पहुँच नासूत स्थानपर्यत है । उपासना मलकूत पर्यत पहुँचाती है । योग जीवहृत स्थानमें स्थित करता है । जहाँ सहस्र पंखुड़ियोंका कमल है और अलख निरञ्जन ज्योतिस्वरूप रहता है । निर्विकल्प समाधि लगाकर योगी लोग उसी स्थानपर्यत जा पहुँचते हैं और जिसको मार्फतकी श्रेणी प्राप्त हो और उरफानकी विद्याका प्रकाश धारण किये हो वह लाहृत स्थानको जाता है । लोक और वेद द्वारा मनुष्योंके निमित्त ये चार स्थान ठहराये गये हैं । अचिन्त्य द्रौपपर्यत कभी कभी कोई कोई साधुओंमेंसे इंगित करने वाले हैं, मनुष्यको इससे पारका समाचार तनिक भी नहीं है, सब व्यर्थही हवाई बांधते और मुक्तिमार्ग बतलाते फिरते हैं और समस्त धर्मके मनुष्य प्रण रोपते हैं कि, हमारे धर्ममें मुक्ति है, और कोई कहीं नहीं पा सकता । जीवरूप स्थानमें तीनोंका सृजन कर्ता रहता है और उसीकी वंदना सब करते हैं और उसीके द्वारा चार प्रकारकी मुक्ति और समस्त स्वर्गोंका सुख प्राप्त करते हैं और इन समस्त स्थानोंमें शारीरिक आनन्द तथा पाशविक कामनाके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है । त्रियाती-तकी श्रेणी जिसको वेद सबसे बढ़कर बतलाता है, इस श्रेणीमें अलख निरञ्जन अधिकृत है और जितने साधुगण उस श्रेणीको हस्तगत कर लेते हैं सो सब उसके समान हो जाते हैं और सब सृष्टिकी रचना करनेकी सामर्थ्य रखते हैं । और सबका हृदय उस विद्यासे प्रकाशित है और समस्त