कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1935, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें७३
कबीर चरित्रबोध
( १८५७ )
जितने पृथ्वीके मनुष्य हैं सो सब इस विषयसे एकबार-गीही अनभिज्ञ हैं, उन लोगोंको केवल चार प्रकारकी मुक्तिकी सुध है और जितने अवतार पीर पैगम्बर पृथ्वीपर प्रकट हुए सो सब निर्गुण तथा सगुणका समाचार देते रहे । वेद तथा अन्यान्य पुस्तकोंमें इस बातका तनिक भी विवरण नहीं है कि, सत्यपुरुष कौन है । सब अचेत निद्रा तथा धोखेमें पड़े और कालपुरुषो अपना पथदर्शक और मुक्तिदाता समझने लगे और जितने पीर पैगम्बर हुए किसीने भी सत्यपुरुषका स्थान स्वप्नमें भी नहीं देखा और न जाना । सब निर्गुण तथा सगुणका समाचार देते चले आये । यदि उनसे कहा जावे कि, तुम भूलकर यमके फंदेमें न पड़ो तो उनको कदापि निश्चय नहीं होता । अनुग्रहीत होनेके स्थान वैर तथा विरोध करनेपर बद्धपरिकर हैं और कबीर साहबके धर्म प्रचलित करनेके समयसे आज पर्यंत कबीरपंथियोंके मतको सुनकर लोग अप्रसन्न होते हैं और तीर्थ व्रत मूर्तिपूजा आदिको भला समझते हैं और लोक तथा वेदकी आज्ञाओंको सर्वोत्तम समझते हैं और सत्य पुरुषकी भक्तिसे भागते हैं । कोई बड़ाभागी इस भक्तिमें लगता है इस भक्तिबिना किसीको पथ नहीं मिलेगा
कबीर साहबने दश स्थान प्रकट किये हैं उन दश स्थानोंके निमित्त इस प्रकारकी विद्याएँ कही हैं । १-शरीअत । २-तरी कत । ३-हकीकत । ४-मारफत । ५-तरोवहत । ६-ध्यान दोर हियत । ७ जुलकार चन्द्रगी । ८-हुकम सुरतिद । ९-दण-नाका । १०-शब्दसार ।
यह दश प्रकारकी विद्याएँ हैं । जिस किसीको जहाँका ज्ञान देता है उसी स्थानको पहुँचता है बिना विद्याके कोई