कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
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चौपाई
सत्य सुकृति सुमिरो मन माही । दूटत बन्न राखलेउ ताही ।
साखी-सत्य सुकृतिकी बालक है, जो चितवै कर डीठ ।
ताजन तोरौ चौहटे, गुनहगारकी पीठ ॥
जदि्या कहूँ तो जगतरै, परकट कहो न जाय ।
गुस परवाना देत हौं, राखो शिरे चढ़ाय ॥
जिन डरपो तुम कालका, कर मेरी परतीत ।
समद्रीप नौ खण्डमें, चलिहौ भवजल जीत ॥
यहाँलौं तो चार गुरु और बयालीस वंशका लेखा लग चुका है इनके अतिरिक्त कबीर साहबके बारह पंथ और भी कबीर-पन्थी ही कहलाते हैं ।
कबीर साहबके पंथोंका वृत्तान्त
१-नारायणदासजीका पंथ । २-यागौदासजीकापंथ । ३-सूरत गोपाल पंथ । ४-मूलनिरञ्जनका पंथ । ५-टकसारी पंथ । ६-भगवान्दासजी का पंथ । ७-सत्यनामी पंथ । ८-कमालीपंथ । ९-राम कबीर पंथ । १०-प्रेमधामकी वाणी । ११-जीवा पंथ । १२-गरीबदास पंथ ।
यह तो कबीर साहबके बारह पंथ हैं । इनमें कोई २ अच्छे हैं । और कोई निबेल विश्वासके हैं । और रामकबीरके लोग ठाकुरपूजा करते हैं । और सत्यनामियोंके ध्यान भी विचलित प्रायः हैं । इन बारह पंथोंका यही विवरण है और इन बारह पंथोंके अतिरिक्त कबीर साहबके और पंथ भी हैं ।
कबीर साहबके भिन्न २ पंथोंका वृत्तान्त
नानकपंथ-दादू पंथ-यानिप पंथ-मूलकदास पंथ-गणेश पंथ इत्यादि ।
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कबीर चरित्रबोध
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इन पंथोंके अतिरिक्त हिन्दू और मुसलमानोंमें कबीर साहबके कितने ही पंथ हैं जिनकी यथार्थता अभीलों भली भाँति ज्ञात नहीं हुई है इस कारणसे मैं कुछ लिख नहीं सकता हूँ। और कितने पंथके लोग ऐसे हैं कि, जिनके पंथके मनुष्य अब कबीर साहबको नहीं मानते सुतरां नानकशाह और दाउद राम और शिवनारायणदास इत्यादि।
जो लोग कबीर साहबको नहीं मानते उनका नाम शिष्योंमें लिखना किसी प्रकार युक्तिसंगत नहीं है। तो भी यह नहीं कहा जा सकता है कि, जो कबीर साहबको नहीं मानते हैं उसमें उनके गुरुओंका दोष है। अथवा उनके पंथदर्शकोंका जिसको दोष होगा वही दोषी माना जावेगा।
महाप्रलयका वृत्तांत
महाप्रलयके विवरणका निचोड़ यह है कि, प्रलयके अनेक भयानक चिह्न परिलक्षित होंगे और पृथ्वीपर पाप विशेष होंगे। महाप्रलयके सवासौ वर्ष पूर्वपर्यन्त बराबर ग्रहण लगाता जावेगा, एकसौ वर्ष पर्यन्त बगबर चन्द्रग्रहण होगा और इसके उपरान्त सूर्यग्रहण होगा जब सूर्य और चन्द्रग्रहण समाप्त हो चुकेगा तब महाप्रलय आवेगी। इतनी पानीकी विशेषता होगी कि, पृथ्वीसे ऊपर इतना ऊँचा चढ़ेगा कि, जलकी लहर व झाग दश सहस्र योजन ऊँची उठेगी और समस्त जीव मर जावेंगे और समस्त शून्य हो जावेगा। पृथ्वी तथा आकाशमें कहीं कुछ दिखलाई नहीं देगा। और समस्त संसारकी रचनाको कालपुरुष समेट लेगा। और पांच तत्त्व तीन गुण कालपुरुषमें समाजावेंगे और आद्याको कालपुरुष निगल जावेगा। और निरंजनके मस्तकमें एक अर्ध गोलाकार
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बोधसागर
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प्रसादशृंगके समान एक स्थान है उसी स्थानमें समस्त रचना सूक्ष्म वेषमें होकर प्रवेशित हो जाती हैं । और समस्त रचनाको वह अपने मस्तकके उसी विशेष स्थानमें रख लेता है और समस्त रचनाको अपने शिरके बीचके गुम्बदमें लिये हुए सत्तर युगपर्यन्त बराबर शून्यमें फिरा करता है, सत्तरयुगके उपरान्त उसका चित्त व्याकुल होता है । जब एकान्त होनेके कारण उसके मनमें अत्यन्त घबराहट होती है और उससे कुछ हो नहीं सकता है और वह अपने चित्तमें यह सोचता है कि, मैं स्वयम् सत्यपुरुष हूँ और वह बल अपनेमें नहीं पाता और दुःखी होता है कि अब क्या करूँ ? तब वह सत्यलोककी छाया अर्थात् आस पास जाकर निवेदन करता है तब समर्थकी आज्ञा होती है कि, ऐ ज्ञानी ! शून्यमें निरंजनके पास जाओ और कहो कि, वह जाकर अब कर्मजीकी पीठके ऊपर तीन लोककी रचनाका प्रस्तार करे । उस समय ज्ञानीजी सत्यपुरुषका समाचार लेकर निरंजनके पास जाते और समर्थकी आज्ञा सुनाते जब पुरुषकी आज्ञा सुनता है, उसी समय निरंजन दौड़कर कर्मजीकी पीठके ऊपर तीनों लोककी रचनाका सामान करते । तब निरंजन अपने मुँहसे आद्याको उगल देता और आद्या तथा निरंजन मिलकर तीन देवताको उत्पन्न करते फिर पांचों मिलकर सब सृष्टिकी उत्पत्ति करते और पहले सत्यस्वरूप सृष्टि उत्पन्न होती है और सब लोक नितान्त ही धर्मात्मा होते हैं और जैसा कुछ कि, मैंने पूर्वमें लिखा है उसी प्रकार समस्त रचना प्रकट होती है । इस प्रकार उत्पत्ति, स्थिति तथा विनाश हुआ करता है । और जब उत्पत्ति होती है तब इसी प्रकार कबीर साहब मनुष्योंकी शिक्षा
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कबीर चरित्रबोध
( १८७३ )
के निमित्त पृथ्वीपर आया करते और मनुष्योंको मुक्ति प्रदान किया करते हैं ।
यह तो ब्रह्माण्डके महाप्रलयका विवरण हुआ और इसी प्रकार पिंडकी प्रलय भी होती है । कारण यह कि, जो कुछ पिंडमें है सोई ब्रह्माण्डमें है तनिक भी न्यूनता नहीं है । परन्तु सबसे बड़ा महाप्रलय भी एक दिवस होगा । जब केवल एक सत्यपुरुष और सत्य लोकही रह जावेगा और कहीं कुछ न रहेगा । अर्थात् दयाद्वीप नासुतसे लेकर सहज द्वीप अर्थात् आहूत स्थान पर्यंत सब विलोपित हो जावेंगे । केवल सत्य-लोकमें ही शान्ति रहेगी । और सत्य लोकके हंस सब सुरक्षित और सत्यपुरुषकी रक्षामें सदैव समान रहेंगे ।
कबीर साहबके अन्तर्धान होनेका वृत्तान्त
जब काशीके मनुष्योंने कबीरसाहबकी अनेक लीलाएँ देखली और जान लिया कि, यह तो स्वयम् परमेश्वर हैं और न किसीके मारनेसे मरते हैं न काटनेसे कटते हैं और न डुबानेसे डूबते हैं और न जलानेसे जलते हैं और न कोई हथियार आपके ऊपर फलित होता है और न मनुष्य तथा पशु और देवता आदि आप पर किसी प्रकारकी क्षति पहुँचा सकता है । तब उन लोगोंने आपसे पूछा कि, आपकी मृत्यु क्यों कर होगी ? उस समय आपने कहा था कि मैं मग्नह देशमें जाकर छिप जाऊंगा । अपने कथनानुसार जब कबीर साहब एकसौ बीस वर्ष पर्यंत काशीजीमें रह चुके । दो दिवस आपके जानेमें शेष रह गए तब आपने लोगोंसे कहा कि, अब मैं यहाँसे कूच करूँगा और मग्नह देशको जाऊंगा-वहाँ छिप रहूँगा । यह बात सुनकर
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बोधसागर
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काशीके लोगोंको अत्यन्त दुःख हुआ और दुखका बादल काशीजीपर छा गया और लोग अत्यन्त दुखित हुए और कहने लगे कि, आज काशी शून्य तथा उजाड़ जान पड़ती है। आज काशीका सूर्य छिप चला और नेत्रोंके सामने अन्धकार होने लगा, सब लोग कहने लगे कि हाय ! हम बड़े ही अभागे हैं हमने ऐसे सत्यवादी महात्माकी आज्ञाको अंगीकार नहीं किया। समस्त नगरमें इस बातकी धूम मच गई कि, अब कबीर साहब काशीजीसे चले जावेंगे। समस्त नगर दुःख तथा कष्टसे भर गया। काशीके लोग हाहाकार करते और कहते थे कि अब हम क्या करेंगे ? हाय ! हमने ऐसे महात्माका कहना नहीं माना। पीछेसे खरा खोटा जान पड़ता है। अबलों हम लोगोंको दिखलाई नहीं दिया। राय वीरसिंह बघेल राजा बनारसने जब सुना कि, सत्यगुरु मग्नह देशको जावेंगे वहां जाकर अन्तर्धान हो जावेंगे। अब जानेके केवल दो दिवस शेष बचे हैं तब उक्त राजा अपने दलबल सहित पहलेहीसे वहां जा पहुँचा और वहांपर सत्यगुरुकी प्रतीक्षा कर रहा था। काशीवासी कबीर साहबको घेर रहे थे और उस समय आपके समीप दश सहस्र सेवक शिष्य उपस्थित थे, उनमें कुदराम पड़ रहा था और सब बिलाप कर रहे थे और मग्नह देशका अधिपति नन्बाब बिजलीखां पठान था। वह पठान कबीर साहबका शिष्य था। जब उसने सुना कि, कबीर साहब अपना अन्तिम दिवस यहाँ करेंगे तब बड़ा प्रसन्न हुआ कि, भली बात हुई कि, सत्यगुरु अपना अन्तिम दिवस यहाँ करेंगे मैं अंतिम किया तथा कफन दफन सब कुछ अपने मत्यनुसार करूँगा। वह आपकी प्रतीक्षा
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कबीर चरित्रबोध
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कर रहा था और कबीर साहब काशीसे चलकर मग्नहदेश को जा पहुँचे । आमी नदीके किनारेपर किसी साधुकी कुटी थी इस कुटीमें जाकर वह बैठ गये । और इस समय राजा वीरसिंह और नौवाब बिजलीखाँ और कबीर साहबके बहुत सेवक और शिष्य थे । वह नदी जिसके किनारेपर कबीर साहब आकर बैठ गए थे, वह अनेक दिवसों शुष्क पड़ी थी तब कबीर साहबने गुप्त रीतिसे कमलपुष्प तथा दो चादरें मँगाई और आप लेट गये और लोगोंसे कहा कि, अब ताला बंद कर दो । तब राजा वीरसिंहने कहा कि, गुरुजी मैं आपके शवको लेकर हिन्दू धर्मानुसार किया कर्म इत्यादि करूँगा । तब नौवाब बिजलीखाँ बोले कि, मैं आपको ऐसा कदापि करने नहीं दूँगा, मैं मुसलमानधर्मानुसार उनकी कफन दफन करूँगा, तब कबीर साहबने देखा कि, ये दोनों युद्धके निमित्त प्रस्तुत हैं, इसमें व्यर्थका रक्तपात होगा और दोनोंको युद्धके निमित्त प्रस्तुत-दोनोंको दलबल सहित-प्रस्तुत पाया । तब आपने दोनोंसे समझाकर कहा कि, सावधान दोनों आपसमें विवाद न करना और कदापि शस्त्र मत चलाना जो मेरी बात मानेगा सो प्रसन्न रहेगा, और सत्यगुरुकी आज्ञाको दोनों दलने स्वीकार कर लिया । तब सबोंने सत्यगुरुको दंडवत् प्रणाम किया और सबका चित्त खेदसे भर गया तब कबीर साहबने चलानेका शब्द पढ़ा और चादर तानकर लेट गये अपने सुंहपर कपड़ा ले लिया और लोगोंसे कहा कि, अब इस कोठरीका ताला बन्द कर दो लोगोंने वैसाही किया । जब ताला बन्द किया तब एक ऐसा शब्द हुआ कि, जिसको सुनकर उपस्थित मनुष्योंके चित्तपर बड़ा प्रभाव पड़ा और जयजयकार हुआ कि, सत्यगुरु सत्यलोकको सिधार गये ।
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बोधसागर
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जब उस कोठरीका ताला खोला तब केवल दो चादर मिले और कुछ कमलके पुष्प मिले, इनमेंसे एक चादर और आधे फूल राजा वीरसिंहने लिये और दूसरी चादर और कमलके फूल नौवाब बिजलीखाने लिया। कबीर साहबका शव कहीं दिखलाई नहीं दिया। राजाने चादर तथा पुष्प लेकर सत्यगुरु की समाधि काशीमें बनायी और बिजलीखाने भी समाधि बनायी जो मगहरमें है।
हिन्दू मुसलमान दोनों गुरुभाइयोंने एक मंदिर बनाया। अब्यापि हिन्दू मुसलमान दोनों कबीरपंथी वहाँ मौजूद हैं। आमीनदी जो बहुत कालसे शुष्क पड़ी थी उसमें जल भर गया। जो अबतक प्रवाहित है, अगहन सुदि एकादशी सम्बत् १५७५ विकमीको कबीर साहब छिप गये। अन्तिम प्राकट्य में एक सौ उन्नीस वर्ष पाँच महीने और सत्ताईस दिवसों पर्यंत आम पृथ्वीपर लोगोंको शिक्षा देते रहे थे।
कबीर साहबका आदि और अन्तमें शरीर नहीं था केवल एक तेजका प्राकट्य था। ऐसा ही कबीर साहबका प्रकट होना तथा छिप जाना है। जब इच्छा हो तब प्रकट हों और जब इच्छा हो तब छिप जावें। जब कबीर साहब मगहरमें गुप्त हुए तब पुनः मथुर नगरमें प्रकट हुए, वहाँ रत्नको शिक्षा देकर फिर धर्मदासजीको बाँधोगढ़में दर्शन देकर उनको सब सत्यपंथका पथ और धर्म धर्मकी राह बता बयालीस वंशके नियम भली प्रकारसे कह और कालपुरुषके कपट जालसे भली भांति सावधान करके अन्तर्धान हो गये।
गजल
खुरशेद परख परतव मादूम हुआ है इन्सान खबर खैरसे
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कबीर चरित्रबोध
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महकूम हुआ है ॥ आई जो खिजां और गया वक्त बहारी । बुलबुल गुजरा जाए नशीं बूम हुआ है । है कौन जहाँमें जो मिट्टा डाले वह तस्तीर । जो कुछ कि कजा काजी से मरकूम हुआ है ॥ तकदीर बयक नाकः बिठाला है दो महमल । एक नेकनुमा दूसरा बदशूम हुआ है बाकी न रहे और कहीं शम्स शोआय । अफवाज लिये तब मेह मालूम हुआ है ॥ पा खाक तेरेसे धरा एक जर्ः सर अपने । सो रहम दो दारैन का मौसूम हुआ है ॥ जो जहर मो अस्सर बहमः सालिको मसलूक । हर इन्स व जिन उससेही मससूम हुआ है ॥ आई सब और पुशत दिखाया शहे आदल । रैयत जमाः जम जोरसे मजलूम हुआ है । इस अहदमें कोई न सुन मर्दूम फरियाद । मखलूक मलिक मौतका महकूम हुआ है ॥ है मौत का चारः आदम जाद बिचारः । अज रोजे अजल उसके ही मकसूम हुआ है ॥ क्या कह सके तुझे न कहा जाय सो आजिज । जो कुछ कि तुझे गैबसे मफहूम हुआ है ॥
कबीरपंथके धार्मिक नियम
कबीर मन्शूरसे
१—एक अविगत अतीत ब्रह्म सत्य पुरुषकी भक्ति करना, उसके अतिरिक्त किसी ओर भी ध्यान न करना । वह ब्रह्म ( सत्य पुरुष ) केवल पारख गुरुकी शिक्षा और स्वसंवेदक अध्ययन ( पढ़ने ) से जाना जाता है, अन्य कोई भी मार्ग उसके प्राप्तिका नहीं है ।
२—सत्य पुरुष और कबीर साहब एकही हैं, केवल नाम मात्रका ही भेद है ! वह एकही दो नामसे कहे जाते हैं, उनमें
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बोधसागर
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लेशमात्र भी भेद नहीं समझना, जो भेद समझेगा उसकी मुक्ति होनेमें भी भेद रहेगा ।
३—अपने गुरुकी सेवा तन, मन, धनसे करना । गुरु वचन का विश्वास करना । गुरुका आज्ञाकारी रहना । सत्य कबीर और गुरुमें कुछ भी भेद न समझना, गुरुके ऐश्वर्य्य और सिद्धि आदिका विचार न करना । जो अपने गुरु को ईश्वर करके मानता है और ईश्वरके समान ही उसमें भक्ति रखता है उसीका कार्य्य पूर्ण होता है । जो गुरुमें भेद बुद्धि करता है वह हतभाग्य सदा निष्फलता ही पाता है ।
अपने उपार्जनका दशवाँ भाग अवश्य गुरुके भेंट करना । सदा अधीनतासे गुरुका धन्यवाद करते रहना ।
४—साधुकी सेवा, भेदबुद्धि त्यागकर, सदा प्रेम और भक्तिसे करना जिसपर सत गुरुकी दया होती है, वही दोनों लोकोमें भाग्यवान होता है । वही दोनों लोकोमें सफलकाम होता है ।
सर्व प्रकारकी साधुओंकी सेवा निष्कपट हृदयसे करना परन्तु ज्ञानी विचारवान, विवेकी पारखी सन्त जो सत्य पुरुषकी भक्तिका उपदेशकर सदाचरणमें लगावें, उनकी सेवामें सदा तत्पर रहना । विशेषतः स्वधर्मके सच्चे विवेकी सन्तोंकी शिक्षाको सावधानीसे सुनना और उनको ध्यानपूर्वक विचारना चाहिये क्योंकि, स्वधर्ममें पूर्ण और दृढ़ सन्तोंके वचनसे धर्ममें दृढ़ आस्था और स्वधर्म प्रवीणता होती है । इसके उलटा परधर्म ( विपक्षीधर्म ) के पक्षपाती साधुओंके वचनसे स्वधर्ममें अश्रद्धा और भ्रम होता है ।
१ पर धर्मके पक्षपातीको अपने धर्म पुस्तकमें भी किसी प्रकारसे हस्ताक्षेप करने न दे । उनसे कभी भी अपनी धर्म पुस्तकके गुढ़ करने अथवा अनुवाद आदिकी अभिलाषा न करे ।
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कबीर चरित्रवोध
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जिस साधुमें अपने गुरुसे मिलते हुए गुण पाये जावें उसको अपने गुरुसे भिन्न न समझना, अभेद बुद्धिसे श्रद्धापूर्वक निष्क-पट भक्ति करना ।
५-सर्वे चराचर जीवधारियों पर समान भावसे दया रखना किसी स्वरूप आकारमें भी कोई जीवधारी हो सबको अपने शरीर और आत्मा समान जानना । किसी देशकालमें भी किसी जीवधारीको दुःख न देना । संसारमें अपना निर्वाह इस प्रकार करना कि, कभी भी अपनी ओरसे किसी जीवधारीको किसी प्रकारकी हानि न पहुँचे । सब जलचर, थलचर, वनचर, पशु, पक्षी, स्थावर जंगम पर समान दया दृष्टि रखना, सबको अपने ही शरीर और प्राणके समझना ।
६-मांस आहारको सब घोर पापोंमें बड़ा पाप समझना । मांस अहारी चाहे कैसे भी गुण और पुण्यसे पूर्ण क्यों न हो परंतु कभी भी वह सत्य मार्गको प्राप्त नहीं कर सकता । मांसाहारी आत्मज्ञानका अधिकारी नहीं हो सकता, उसकी मुक्ति कदापि नहीं हो सकती ।
७-मदिरा तथा अन्य सर्वे मादकपदार्थ भी मांसके समान ही त्याज्य हैं । कोई मादकपदार्थका व्यसनी ध्यान नहीं कर सकता, ध्यान बिना ज्ञान प्राप्त नहीं होता, ज्ञान बिना मोक्ष नहीं मिलता ।
८-व्यभिचारी नर्कको प्राप्त होता है ।
९-जितने आकार और रूप ब्रह्माण्ड हैं वे बुत कहलाते हैं, उनमेंसे किसीको भी पूजनेवाला मोक्षका अधिकारी नहीं हो सकता । जिस प्रकार बुतपरस्ती ( मूर्तिपूजा ) ज्ञान
१-आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पश्यति ।
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बोधसागर
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मार्गकी टट्टी है, उसी प्रकार गुरु मूर्तिके ध्यान और उसकी भक्ति, ज्ञानद्वारकी कुंजी है ।
१०—जो कुछ भोजन, छाजन आदि अर्थात् अपने यात्रा सम्बन्धी पदार्थ होवे, सो सब प्रथम परमात्मा ( सत्यपुरुष ) को अर्पण करले तब स्वयम् स्वीकार करना ।
कोई भी पदार्थ जो प्रथम किसी देवी देवताको अर्पण हो चुका हो उसे सत्यपुरुषके भक्ति करनेवालेको कदापि ग्रहण न करना चाहिये उसे कभी भी अपने काममें न लगाना चाहिये क्योंकि सत्यपुरुषको अर्पण किये बिना किसी भी पदार्थका ग्रहण करना महापाप है और जो पदार्थ दूसरे देवी देवताको भोग लग गया वह सत्यपुरुषको अर्पण हो नहीं सकता क्योंकि दूसरे देवका अर्पित पदार्थ सत्यपुरुषको अर्पण करना एक तुच्छ सेवकके जूठे पदार्थका बादशाहको अर्पण करनेके तुल्य महान अपराध और अनर्थका कर्ता है ।
सत्यपुरुषको भोग लगाये बिना भी कदापि कोई पदार्थ ग्रहण न करे । जो सत्यपुरुषको अर्पण करके किसी पदार्थको ग्रहण करता है उसका फल अमृत समान मिलता है इसलिये उचित है कि, अत्यन्त शुद्ध और स्वच्छ भोजन आदि काममें लावे ।
११—न झूठ बोलना न झूठ वचन देना, न झूठे का संग करना और न झूठेसे किसी प्रकारका व्यवहार करना ।
१२—न चोरी करना, न चोरोंको साथ देना, न उनकी सम्मतिमें सहमत होना, न उनको सम्मति देना न उनका माल लेना, न उनके निकट जाना ।
१३—जूआ न खेलना, जूआ महान दुखका घर है,
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कवीर चरित्रबोध
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जुआरियोंकी महान् दुर्दशा होती है। महाराज नल, महाराजा युधिष्ठिर आदि पुण्यस्वरूप धर्मावतारोंको भी इस जूआने कैसा नष्ट और दुर्दशाग्रसित कर दिया। जूआ, झूठ, चोरी, व्यभिचार और हिंसा आदि सब पाप परस्पर ऐसे संबन्ध रखते हैं कि, एक दोष आनेसे क्रमशः सर्व आपही आप आ जाते हैं। इनमेंसे एकको भी धारण करनेवाले पुरुष महान् कष्ट और दुःखोंको संसारमें अनुभव करते हुए परलोकमें नर्कके भागी होते हैं।
१४-शरीरके ऊपर द्वादश तिलक लगाना, कपालमें खडी लकीरके समान सीधी तिलक करना, वैसे ही मस्तक, दोनों आंख, नाभि, हृदय, दोनों भुजा और दोनों छातीसे लेकर मोटे-की ओर फिरता हुआ, पीठपर और कानपर तिलक करे।
१५-बल्ल श्वेत और उज्ज्वल रखे।
१६-ग्रीवामें तुलसीकी माला और तुलसीकी कंठी धारण करे।
१७-सत्य नामका जप, कीर्तन और भजन करे।
१८-सत्य पुरुषकी भक्ति और सत्य पंथका उपदेश करे।
एक मनुष्यको सत्य पुरुषकी भक्ति और सत्य पंथमें प्रवेश करानेका फल कोड़ों गऊको कसाईके हाथसे बचानेके पुण्यसे भी बढ़कर है।
१९-यंत्र, मन्त्र, तन्त्रादिकी ओर कभी ध्यान भी न दे, ये मुक्ति और भक्तिके शत्रु हैं, इनका साधन करनेवाला छल कपटक न्यसनमें फँसकर महा दुराचारी हो नर्कका अधिकारी होता है, जितने तन्त्रादिके साधन हैं सब नर्कके मार्ग हैं।
२०-स्वसंवेदके बिना दूसरी पुस्तकोंसे मुक्तिपथ मिलनेकी
१ यंत्र मन्त्र तन्त्रका आशय देखो, पण्डित श्रद्धामणि फिल्लोरी विरचित सत्यामृत प्रवाह पृष्ठ १८० में।
२-वेदादी विद्या सब, बोध हेतु हिय धार। सब मत महर्षम करे, तब देखो निजसैन ॥
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बोधसागर
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आशा न रखना, परन्तु अन्य पुस्तकोंको बोध और ज्ञान वृद्धिके हेतु पढ़ना ।
२१-सत्य कबीर और उनके सच्चे हंस और कडिहारके अतिरिक्त दूसरेको मुक्तिपथका दर्शन नहीं समझना ।
२२-पारख गुरुकी शिक्षा बिना मुक्ति कदापि नहीं हो सकती ।
२३-सत्य पुरुषकी भक्तिके अतिरिक्त अन्य सब भक्तियां भवसागरमें डुबानेवाली हैं ।
२४-तीर्थ, व्रत आदि सब यमके बन्धन हैं ।
२५-नौधा भक्ति और चार प्रकारकी मुक्ति सब बन्धनही हैं ।
२६-निर्गुण और सगुणके ध्यान करनेवाले सदा बन्धनमें रहते हैं ।
२७-हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी आदि सब जाति और धर्मके लोग कबीरपन्थमें मिल सकते हैं सबके हेतु समान ही भक्ति और मुक्ति है ।
२८-नर्क स्वर्ग तथा अन्य सर्व लोक अज्ञानियोंके हेतु ठहराये गये हैं जिसको सत्य आत्मज्ञान प्राप्त हुआ उसके हेतु सब असत्य और भ्रममात्र हैं ।
२९-सार शब्दके अतिरिक्त मुक्तिका द्वार कोई भी नहीं ।
३०-निन्दा, ईर्षा, वैमनस्य, छल, कपट, अभिमान आदि मुक्तिके शत्रु हैं ।
३१-अधीनताके द्वारा सर्व शुभगुण और पुण्य प्राप्त होते हैं ।
३२-मुक्ति मार्ग बहुत सांकरा और नर्कका मार्ग बहुत चौड़ा है ।
१-कबीर-हम बासी वहि देशके, जहाँ जाति वरण कुल नाहिं, । शब्दमिलवा होय रहा, देह मिलावा नाहिं, ॥ जाकी मयांदा जोन विधि, बरते सोई प्रमान । जमा मांहि कछु भेद नहीं, उज्ज्वल धर्म औ ज्ञान ।
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कबीर चरित्रबोध
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३३-कबीर साहब विदेह हैं उनका देह कभी नहीं कल्पे ।
३४-कैसीहू विपत्ति क्यों न आन पड़े अपने सत्यगुरुके अतिरिक्त किसी दूसरेकी सहायताका ध्यान न करें । सत्यगुरुके अतिरिक्त किसीसे भी किसी प्रकारकी आशा न रखे ।
३५-जो कोई सतगुरुकी शरणमें आवे उसे शरणके नियमोंको भली प्रकार पूर्ण करना उचित है । पूर्ण विश्वास रखे कि सत्य गुरु अवश्य कालके जालसे निकालेगा और दुःख सागरसे पार करेगा ।
३६-सत्यगुरुकी कृपाका धन्यवाद कभी न भूले, क्षण क्षण में धन्यवाद ही देता रहे । ऐसा नहीं कि, प्रथम तो प्रार्थना करता रहे और पश्चात् भूल जावे । कृतघ्नी कभी भी मुक्त नहीं होता ।
३७-ईश्वरीय भय मुक्तिका चिह्न है मृत्युको सदा स्मरणमें रखना ।
३८--सच्चे प्रेमके बिना भक्ति निष्फल है ।
३९--धन्य हैं वे जो शरीरका मोह छोड़कर भक्तिमें लगते हैं ।
४०--उदारताके बिना कोई भी भक्तिता पद प्राप्त नहीं कर सकेगा । उदार दोनों लोकमें सुखी होता है उसका थोड़ा पुण्य भी बहुत फलदायक होता है । कृपणके भजन और तपस्या निष्फल होते हैं, चाहे वह जितना भक्ति और भजनका ढोंग करे परन्तु निष्फलताके अतिरिक्त उसको कुछ भी प्राप्त न होगा । कृपण दोनों लोकमें दुःखका ही भागी होता है ।
४१--मौन परम उत्तम गुण है । आवश्यकताके अनुसार यथा अवसर बोलना, निरर्थक बकबक न करना । मिथ्यालाप करनेसे आत्मा और शरीर सबकी हानि है ।
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बोधसागर
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४२-सत्यगुरु ( कबीर साहब ) की वाणीका पाठ करना, बारम्बार मनन करना, उनके आशयके ऊपर विचार करना, उसके भेदको भली प्रकार सोचना, समझना और सदाकाल उन्हींका चिंतन रखना उनके आशय समझनेमें कोई भी युक्ति उठा नहीं रखना । सत्यगुरुके शब्दोंको यथा अवसर गाना और कीर्तन करना, सत्य गुरुकी प्रशंसा और प्रार्थना सदा करते रहना ।
४३-जितने धर्म संसारमें प्रचलित हैं सबके आचार्य कबीर साहब हैं परन्तु मुक्तिदाता तो स्वयम् ( कबीर साहब ) और चार गुरु तथा उनके वशोंकोही ठहराया है, अन्यको नहीं ।
४४-किसीको कभी शाप न देना, किसीको कुवचन न कहना, न किसीका अहित चिंतन करना ।
४५-परमात्माको सर्वत्र पूर्ण जानना । किसी प्राणीको भी दुःख देनेको ईश्वरको दुःख देनेके तुल्य जानना ।
४६-अभिमानी कभी परमात्माको व्यापक नहीं देख सकता ।
४७-गुरुकी आज्ञाकारिता परम तपस्या है ।
४८-जबतक शरीरसे लाड़ प्यार है उसकी पोषणमें वृत्ति लगी है तबतक आज्ञाकारिता असम्भव है ।
४९-मूर्ख, शठ और विद्याहीनको मुक्तिपद कदापि नहीं मिलता ।
५०-जबतक शरीरका भय और चिंतन है अर्थात् देहाभिमान है तबतक विदेह कदापि प्राप्त नहीं हो सकता । जो स्वयम् विदेह हो वही विदेहको प्राप्त हो ।
कबीर साहबके लोक और हंसोंका वृत्तांत
कबीर साहबका वह लोक है जिसका गुण कहने और सुननेके बाहर है, केवल स्वसंवेद थोड़ासा विवरण करता है
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कबीर चरित्रबोध
( १८८५ )
जिस समय उस लोकको हंस चलते हैं उस समय उनके प्रतापका वर्णन कुछ किया नहीं जा सकता है, उनके सौन्दर्यका बखान किससे हो सकता है जिनका एक एक बाल ऐसा देदीप्यमान और तेजमय है कि, जिसके सामने करोड़ों सूर्य और चन्द्र छिप जावें, उनके सौन्दर्यका वर्णन कौन कर सके उन हंसोंके मनमें तनिक भी बासना नहीं रहती है और निरंजन, आद्या, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, ऋषि, मुनि इत्यादि वासनाके ही अधीन हो वारम्बार संसारमें जन्म लेते हैं। राम कृष्ण सिद्ध साधु इत्यादि सब धर्म वासनासे जन्म लेते हैं।
जिस समय कोई मनुष्य मरता है तब उत्तरकी ओर होकर ऊपर चलकर प्रथम विष्णुके निकट अपने पाप पुण्यका लेखा देनेके निमित्त वैकुण्ठको जाता है और जब हंस कबीर चलते हैं तब सत्यगुरुके शब्दके लवद्दारा अपने पूर्ण बलसे ऊपर की ओर चढ़े चले जाते हैं जब ब्रह्माण्डके पार हुआ चाहते हैं तब धर्मरायकी तीन सौ साठ कन्या मिलती हैं जिनके वस्त्र आभूषण और सौन्दर्य आदिका मैं क्या विवरण कहूँ? सत्यकबीरके अतिरिक्त ऐसा कोई भी तीनों लोकोंमें नहीं है कि, उनको देखकर आसक्त न हो जावे; वे कन्यायें उस स्थानपर इस कारण नियत की गई हैं कि, हंस कबीरको अपने जालमें फँसालेंवे जब वे हंस कबीरके निकट जाती हैं तब नाना प्रकारके हावभाव कटाक्ष द्वारा उनको मोहित करना चाहती हैं। परन्तु वे उनकी ओर तनिक भी ध्यान नहीं देते! वे कहते हैं कि, दूर हो और चली जा तुम्हारी तनिक भी इच्छा तथा कामना हमको नहीं है। तब वे निराश होकर लौटती हैं। भला मकड़ीके जालमें भारी पदार्थ कैसे फँस सकते हैं। जब
( १८८६ )
बोधसागर
१०२
हंस उनको अनादर करके चलते हैं तब आगे धर्मराय मिलते हैं दंडवत् प्रणाम करते हैं और हंस ऊपरकी ओर चले जाते हैं । जब सत्यलोकको पहुँचते हैं तब सत्यलोकके हंस उनकी अगवानीके निमित्त बाहर निकलते हैं और प्रत्येक हंस अपने हृदयसे लगता मिलता और प्रसन्न होकर कहता है कि, बहुत दिवसोंके पृथक् हुए हंस आज हमसे आकर मिले । समस्त हंस मिलकर उनको सत्य पुरुषके निकट ले जाते हैं और वे हंस सत्य पुरुषका दर्शन पाते और दंडवत् प्रणाम करके कृतार्थ हो लोकमें वास करते हैं ।
शेर
मुगैँ रुह आखिरी नफसको । जब छोड़े इस उनसरी कफसको ॥ सतलोक सिधार साथ सतमाज । उसवक्त करे बुलन्द परवाज ॥ दरसिम्त शुमाल सरबसर जाय । बासुर अत सो उबूर कर जाय ॥ वह नूरो जलाल बेबयाँ है । गुफ्तारे कबीरमें अयाँ है ॥ जब सुकृत लोक रुखरवाँ हो । रागोंरंग देखते दवाँ हो ॥ देखे कही सञ्जः लाल जारों । बाहुस्नोजमाल गुलअजराँ ॥ सदहा गुलशन चमनबहारी । शीरीं नहरों पुर आब जारी ॥ गहे बर्क बदन है नाजनीनाँ । हे खूब लगी बजार मीनाँ ॥ है फिरते कहीं ये दूरो गिलमाँ । बैठे कहीं जाहिदो मुसलमाँ ॥
सैकड़ों प्रकार की वस्तियाँ और स्मृष्टिकी रचना देखते हुए ऊपरको चलता है-और स्वगों तथा वैकुण्ठोंकी सैर करते और समस्त वस्तियों और शून्यको पार करके तब सत्यलोकको पहुँच जाता है ।
कबीर साहबका मंगल
चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो ।
१०३
कबीर चरित्रबोध
( १८८७ )
यहि संसार काल है राजा, कर्मको जाल पसारा हो । चौदह खंड बसे वाके मुखमें, सबही को करत अहारा हो । जारबार कोयला कर डारन, फिर फिर दे अवतारा हो । ब्रह्मा विष्णु शिवतन धरिया, और को कौन विचारा हो । सुर नर मुनि सब छलछल मारले, चौरासीमें डारा हो । मध्य अकाश आप जहँ बैठे, ज्योति शब्द ठहियारा हो । ताको रूप कहाँलग बरनो, अनंत भान उजियारा हो । श्वेतस्वरूप शब्द जहाँ फूले, हंसा करत बिहारा हो । कोटिन चांद सूर्य छिपि जहँ, एक रोम उजियारा हो । वही पार इक नगर बसत है, बरसत अमृत धारा हो । कहैं कबीर सुनो धर्मदासा, लखो पुरुष दरबारा हो । इस सत्य लोककी मनोहरता और हंसाँका रहन सहन और रीति व्यवहार सूक्ष्मवेदके पढ़नेसे जाना जावेगा ।
मुसहर
यह हरदो जहाँ काल पुरुषके है हिजारे । हर सिम्त व हर जायमें यम जाल पसारे ॥ यक लोक व यक वेद दो दरियाके किनारे । सैयादके काबूमें हैं सब जीव बेचारे ॥ चलती है यहाँ तेग व तलवार दो धारे । चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ जब भूल गया आदमको आपही आपा । पावन्द हुवा तिफली जवानी व बुढ़ापा ॥ सबपर है लगा मलिक मौत मोह व छापा । है आग लगी बेशः जलेगा यह सरापा ॥ जलते हैं धोल उड़ते धुवैं धार शरीर ।
( १८८८ )
बोधसागर
१०४
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ अफसोस लिया लूट धरम धरमन धूरत । एक इशक जदः भई है हुस्न है औरत ॥ हर कौन किया भौन है यह मोहिनी मूरत । दिल पार हुवा पारः बमह पारण सूरत ॥ बाजार खड़े मार वा बीमार नजारे । चल हंस अचल मोलि दो मावाय हमारे ॥ कैलास चलेगा व जिन्हूँ लोक चलेगा । अमरावती अलकावती गोलोक चलेगा ॥ सब स्वर्ग चलेगा व तपोलोक चलेगा । जो हद् जनो मर्दमें सो लोक चलेगा ॥ वो भी चल जावे जहां नौलाख सितारे । चल हंस अचल मोलि दो मावाय हमारे ॥ कोई न रहे एक पुरुष लोक रहेगा । आवे जो वहांसे सो खबर उसकी कहेगा ॥ सब कौल कर शामः अजिले सोल बहेगा । जिसको वह नजर आवे सो फिर कछु न चहेगा ॥ निश्चल सो रहे कायक जहां अमृतधारे । चल हंस अचल मोलि दो मावाय हमारे ॥ हंसोंकी हुस्न खूबी कही जाए सो कैसे । यह नातिकः गुम सुम्म बयां कीजिए ऐसे ॥ एक मूय मुनौविर कह इस नूरका जैसे । छिप जायँ करोड़ों महेदुर तलअत तैसे ॥ सब हंसापुरुषरूप पुरुष उनको दुलारे ।
१०५
कबीर चरित्रबोध
( १८८९ )
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ जहाँ रात न दिन है व नहीं सूरज चन्दा । सोहँग दुरै चैवर करे पुरुष अनन्दा ॥ यक सूरत सारे न खुदावन्द न बन्दा । इस मंजिल नजदीक नहीं कालका फन्दा ॥ जिस लोक महेशःको परमहंस पधारै । चल हंस अचल मोलि दो मावाय हमारे ॥ सतगुरुकी शरण लेके चलो बहके उसपार । वह कादिर मुतलक हुवा जिस जीवका मददगार ॥ कर पलमें सुबुकदोष उठा उसका गराँ बार । पहुँचावे वतनमें न बुतनमें होवे औतार ॥ आजिज से गुनहगार कतारोंको जो तारे । चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥
इति कबीर चरित्र बोध समाप्त