भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कबीर चरित्रवोध

( १८७९ )

जिस साधुमें अपने गुरुसे मिलते हुए गुण पाये जावें उसको अपने गुरुसे भिन्न न समझना, अभेद बुद्धिसे श्रद्धापूर्वक निष्क-पट भक्ति करना ।

५-सर्वे चराचर जीवधारियों पर समान भावसे दया रखना किसी स्वरूप आकारमें भी कोई जीवधारी हो सबको अपने शरीर और आत्मा समान जानना । किसी देशकालमें भी किसी जीवधारीको दुःख न देना । संसारमें अपना निर्वाह इस प्रकार करना कि, कभी भी अपनी ओरसे किसी जीवधारीको किसी प्रकारकी हानि न पहुँचे । सब जलचर, थलचर, वनचर, पशु, पक्षी, स्थावर जंगम पर समान दया दृष्टि रखना, सबको अपने ही शरीर और प्राणके समझना ।

६-मांस आहारको सब घोर पापोंमें बड़ा पाप समझना । मांस अहारी चाहे कैसे भी गुण और पुण्यसे पूर्ण क्यों न हो परंतु कभी भी वह सत्य मार्गको प्राप्त नहीं कर सकता । मांसाहारी आत्मज्ञानका अधिकारी नहीं हो सकता, उसकी मुक्ति कदापि नहीं हो सकती ।

७-मदिरा तथा अन्य सर्वे मादकपदार्थ भी मांसके समान ही त्याज्य हैं । कोई मादकपदार्थका व्यसनी ध्यान नहीं कर सकता, ध्यान बिना ज्ञान प्राप्त नहीं होता, ज्ञान बिना मोक्ष नहीं मिलता ।

८-व्यभिचारी नर्कको प्राप्त होता है ।

९-जितने आकार और रूप ब्रह्माण्ड हैं वे बुत कहलाते हैं, उनमेंसे किसीको भी पूजनेवाला मोक्षका अधिकारी नहीं हो सकता । जिस प्रकार बुतपरस्ती ( मूर्तिपूजा ) ज्ञान

१-आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पश्यति ।