कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
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मार्गकी टट्टी है, उसी प्रकार गुरु मूर्तिके ध्यान और उसकी भक्ति, ज्ञानद्वारकी कुंजी है ।
१०—जो कुछ भोजन, छाजन आदि अर्थात् अपने यात्रा सम्बन्धी पदार्थ होवे, सो सब प्रथम परमात्मा ( सत्यपुरुष ) को अर्पण करले तब स्वयम् स्वीकार करना ।
कोई भी पदार्थ जो प्रथम किसी देवी देवताको अर्पण हो चुका हो उसे सत्यपुरुषके भक्ति करनेवालेको कदापि ग्रहण न करना चाहिये उसे कभी भी अपने काममें न लगाना चाहिये क्योंकि सत्यपुरुषको अर्पण किये बिना किसी भी पदार्थका ग्रहण करना महापाप है और जो पदार्थ दूसरे देवी देवताको भोग लग गया वह सत्यपुरुषको अर्पण हो नहीं सकता क्योंकि दूसरे देवका अर्पित पदार्थ सत्यपुरुषको अर्पण करना एक तुच्छ सेवकके जूठे पदार्थका बादशाहको अर्पण करनेके तुल्य महान अपराध और अनर्थका कर्ता है ।
सत्यपुरुषको भोग लगाये बिना भी कदापि कोई पदार्थ ग्रहण न करे । जो सत्यपुरुषको अर्पण करके किसी पदार्थको ग्रहण करता है उसका फल अमृत समान मिलता है इसलिये उचित है कि, अत्यन्त शुद्ध और स्वच्छ भोजन आदि काममें लावे ।
११—न झूठ बोलना न झूठ वचन देना, न झूठे का संग करना और न झूठेसे किसी प्रकारका व्यवहार करना ।
१२—न चोरी करना, न चोरोंको साथ देना, न उनकी सम्मतिमें सहमत होना, न उनको सम्मति देना न उनका माल लेना, न उनके निकट जाना ।
१३—जूआ न खेलना, जूआ महान दुखका घर है,