कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कवीर चरित्रबोध
( १८८१ )
जुआरियोंकी महान् दुर्दशा होती है। महाराज नल, महाराजा युधिष्ठिर आदि पुण्यस्वरूप धर्मावतारोंको भी इस जूआने कैसा नष्ट और दुर्दशाग्रसित कर दिया। जूआ, झूठ, चोरी, व्यभिचार और हिंसा आदि सब पाप परस्पर ऐसे संबन्ध रखते हैं कि, एक दोष आनेसे क्रमशः सर्व आपही आप आ जाते हैं। इनमेंसे एकको भी धारण करनेवाले पुरुष महान् कष्ट और दुःखोंको संसारमें अनुभव करते हुए परलोकमें नर्कके भागी होते हैं।
१४-शरीरके ऊपर द्वादश तिलक लगाना, कपालमें खडी लकीरके समान सीधी तिलक करना, वैसे ही मस्तक, दोनों आंख, नाभि, हृदय, दोनों भुजा और दोनों छातीसे लेकर मोटे-की ओर फिरता हुआ, पीठपर और कानपर तिलक करे।
१५-बल्ल श्वेत और उज्ज्वल रखे।
१६-ग्रीवामें तुलसीकी माला और तुलसीकी कंठी धारण करे।
१७-सत्य नामका जप, कीर्तन और भजन करे।
१८-सत्य पुरुषकी भक्ति और सत्य पंथका उपदेश करे।
एक मनुष्यको सत्य पुरुषकी भक्ति और सत्य पंथमें प्रवेश करानेका फल कोड़ों गऊको कसाईके हाथसे बचानेके पुण्यसे भी बढ़कर है।
१९-यंत्र, मन्त्र, तन्त्रादिकी ओर कभी ध्यान भी न दे, ये मुक्ति और भक्तिके शत्रु हैं, इनका साधन करनेवाला छल कपटक न्यसनमें फँसकर महा दुराचारी हो नर्कका अधिकारी होता है, जितने तन्त्रादिके साधन हैं सब नर्कके मार्ग हैं।
२०-स्वसंवेदके बिना दूसरी पुस्तकोंसे मुक्तिपथ मिलनेकी
१ यंत्र मन्त्र तन्त्रका आशय देखो, पण्डित श्रद्धामणि फिल्लोरी विरचित सत्यामृत प्रवाह पृष्ठ १८० में।
२-वेदादी विद्या सब, बोध हेतु हिय धार। सब मत महर्षम करे, तब देखो निजसैन ॥