भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

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आशा न रखना, परन्तु अन्य पुस्तकोंको बोध और ज्ञान वृद्धिके हेतु पढ़ना ।

२१-सत्य कबीर और उनके सच्चे हंस और कडिहारके अतिरिक्त दूसरेको मुक्तिपथका दर्शन नहीं समझना ।

२२-पारख गुरुकी शिक्षा बिना मुक्ति कदापि नहीं हो सकती ।

२३-सत्य पुरुषकी भक्तिके अतिरिक्त अन्य सब भक्तियां भवसागरमें डुबानेवाली हैं ।

२४-तीर्थ, व्रत आदि सब यमके बन्धन हैं ।

२५-नौधा भक्ति और चार प्रकारकी मुक्ति सब बन्धनही हैं ।

२६-निर्गुण और सगुणके ध्यान करनेवाले सदा बन्धनमें रहते हैं ।

२७-हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी आदि सब जाति और धर्मके लोग कबीरपन्थमें मिल सकते हैं सबके हेतु समान ही भक्ति और मुक्ति है ।

२८-नर्क स्वर्ग तथा अन्य सर्व लोक अज्ञानियोंके हेतु ठहराये गये हैं जिसको सत्य आत्मज्ञान प्राप्त हुआ उसके हेतु सब असत्य और भ्रममात्र हैं ।

२९-सार शब्दके अतिरिक्त मुक्तिका द्वार कोई भी नहीं ।

३०-निन्दा, ईर्षा, वैमनस्य, छल, कपट, अभिमान आदि मुक्तिके शत्रु हैं ।

३१-अधीनताके द्वारा सर्व शुभगुण और पुण्य प्राप्त होते हैं ।

३२-मुक्ति मार्ग बहुत सांकरा और नर्कका मार्ग बहुत चौड़ा है ।

१-कबीर-हम बासी वहि देशके, जहाँ जाति वरण कुल नाहिं, । शब्दमिलवा होय रहा, देह मिलावा नाहिं, ॥ जाकी मयांदा जोन विधि, बरते सोई प्रमान । जमा मांहि कछु भेद नहीं, उज्ज्वल धर्म औ ज्ञान ।