कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कबीर चरित्रबोध
( १८८३ )
३३-कबीर साहब विदेह हैं उनका देह कभी नहीं कल्पे ।
३४-कैसीहू विपत्ति क्यों न आन पड़े अपने सत्यगुरुके अतिरिक्त किसी दूसरेकी सहायताका ध्यान न करें । सत्यगुरुके अतिरिक्त किसीसे भी किसी प्रकारकी आशा न रखे ।
३५-जो कोई सतगुरुकी शरणमें आवे उसे शरणके नियमोंको भली प्रकार पूर्ण करना उचित है । पूर्ण विश्वास रखे कि सत्य गुरु अवश्य कालके जालसे निकालेगा और दुःख सागरसे पार करेगा ।
३६-सत्यगुरुकी कृपाका धन्यवाद कभी न भूले, क्षण क्षण में धन्यवाद ही देता रहे । ऐसा नहीं कि, प्रथम तो प्रार्थना करता रहे और पश्चात् भूल जावे । कृतघ्नी कभी भी मुक्त नहीं होता ।
३७-ईश्वरीय भय मुक्तिका चिह्न है मृत्युको सदा स्मरणमें रखना ।
३८--सच्चे प्रेमके बिना भक्ति निष्फल है ।
३९--धन्य हैं वे जो शरीरका मोह छोड़कर भक्तिमें लगते हैं ।
४०--उदारताके बिना कोई भी भक्तिता पद प्राप्त नहीं कर सकेगा । उदार दोनों लोकमें सुखी होता है उसका थोड़ा पुण्य भी बहुत फलदायक होता है । कृपणके भजन और तपस्या निष्फल होते हैं, चाहे वह जितना भक्ति और भजनका ढोंग करे परन्तु निष्फलताके अतिरिक्त उसको कुछ भी प्राप्त न होगा । कृपण दोनों लोकमें दुःखका ही भागी होता है ।
४१--मौन परम उत्तम गुण है । आवश्यकताके अनुसार यथा अवसर बोलना, निरर्थक बकबक न करना । मिथ्यालाप करनेसे आत्मा और शरीर सबकी हानि है ।