कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
१९
कबीर चरित्रबोध
( १८८३ )
३३-कबीर साहब विदेह हैं उनका देह कभी नहीं कल्पे ।
३४-कैसीहू विपत्ति क्यों न आन पड़े अपने सत्यगुरुके अतिरिक्त किसी दूसरेकी सहायताका ध्यान न करें । सत्यगुरुके अतिरिक्त किसीसे भी किसी प्रकारकी आशा न रखे ।
३५-जो कोई सतगुरुकी शरणमें आवे उसे शरणके नियमोंको भली प्रकार पूर्ण करना उचित है । पूर्ण विश्वास रखे कि सत्य गुरु अवश्य कालके जालसे निकालेगा और दुःख सागरसे पार करेगा ।
३६-सत्यगुरुकी कृपाका धन्यवाद कभी न भूले, क्षण क्षण में धन्यवाद ही देता रहे । ऐसा नहीं कि, प्रथम तो प्रार्थना करता रहे और पश्चात् भूल जावे । कृतघ्नी कभी भी मुक्त नहीं होता ।
३७-ईश्वरीय भय मुक्तिका चिह्न है मृत्युको सदा स्मरणमें रखना ।
३८--सच्चे प्रेमके बिना भक्ति निष्फल है ।
३९--धन्य हैं वे जो शरीरका मोह छोड़कर भक्तिमें लगते हैं ।
४०--उदारताके बिना कोई भी भक्तिता पद प्राप्त नहीं कर सकेगा । उदार दोनों लोकमें सुखी होता है उसका थोड़ा पुण्य भी बहुत फलदायक होता है । कृपणके भजन और तपस्या निष्फल होते हैं, चाहे वह जितना भक्ति और भजनका ढोंग करे परन्तु निष्फलताके अतिरिक्त उसको कुछ भी प्राप्त न होगा । कृपण दोनों लोकमें दुःखका ही भागी होता है ।
४१--मौन परम उत्तम गुण है । आवश्यकताके अनुसार यथा अवसर बोलना, निरर्थक बकबक न करना । मिथ्यालाप करनेसे आत्मा और शरीर सबकी हानि है ।
( १८८४ )
बोधसागर
१००
४२-सत्यगुरु ( कबीर साहब ) की वाणीका पाठ करना, बारम्बार मनन करना, उनके आशयके ऊपर विचार करना, उसके भेदको भली प्रकार सोचना, समझना और सदाकाल उन्हींका चिंतन रखना उनके आशय समझनेमें कोई भी युक्ति उठा नहीं रखना । सत्यगुरुके शब्दोंको यथा अवसर गाना और कीर्तन करना, सत्य गुरुकी प्रशंसा और प्रार्थना सदा करते रहना ।
४३-जितने धर्म संसारमें प्रचलित हैं सबके आचार्य कबीर साहब हैं परन्तु मुक्तिदाता तो स्वयम् ( कबीर साहब ) और चार गुरु तथा उनके वशोंकोही ठहराया है, अन्यको नहीं ।
४४-किसीको कभी शाप न देना, किसीको कुवचन न कहना, न किसीका अहित चिंतन करना ।
४५-परमात्माको सर्वत्र पूर्ण जानना । किसी प्राणीको भी दुःख देनेको ईश्वरको दुःख देनेके तुल्य जानना ।
४६-अभिमानी कभी परमात्माको व्यापक नहीं देख सकता ।
४७-गुरुकी आज्ञाकारिता परम तपस्या है ।
४८-जबतक शरीरसे लाड़ प्यार है उसकी पोषणमें वृत्ति लगी है तबतक आज्ञाकारिता असम्भव है ।
४९-मूर्ख, शठ और विद्याहीनको मुक्तिपद कदापि नहीं मिलता ।
५०-जबतक शरीरका भय और चिंतन है अर्थात् देहाभिमान है तबतक विदेह कदापि प्राप्त नहीं हो सकता । जो स्वयम् विदेह हो वही विदेहको प्राप्त हो ।
कबीर साहबके लोक और हंसोंका वृत्तांत
कबीर साहबका वह लोक है जिसका गुण कहने और सुननेके बाहर है, केवल स्वसंवेद थोड़ासा विवरण करता है
१०१
कबीर चरित्रबोध
( १८८५ )
जिस समय उस लोकको हंस चलते हैं उस समय उनके प्रतापका वर्णन कुछ किया नहीं जा सकता है, उनके सौन्दर्यका बखान किससे हो सकता है जिनका एक एक बाल ऐसा देदीप्यमान और तेजमय है कि, जिसके सामने करोड़ों सूर्य और चन्द्र छिप जावें, उनके सौन्दर्यका वर्णन कौन कर सके उन हंसोंके मनमें तनिक भी बासना नहीं रहती है और निरंजन, आद्या, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, ऋषि, मुनि इत्यादि वासनाके ही अधीन हो वारम्बार संसारमें जन्म लेते हैं। राम कृष्ण सिद्ध साधु इत्यादि सब धर्म वासनासे जन्म लेते हैं।
जिस समय कोई मनुष्य मरता है तब उत्तरकी ओर होकर ऊपर चलकर प्रथम विष्णुके निकट अपने पाप पुण्यका लेखा देनेके निमित्त वैकुण्ठको जाता है और जब हंस कबीर चलते हैं तब सत्यगुरुके शब्दके लवद्दारा अपने पूर्ण बलसे ऊपर की ओर चढ़े चले जाते हैं जब ब्रह्माण्डके पार हुआ चाहते हैं तब धर्मरायकी तीन सौ साठ कन्या मिलती हैं जिनके वस्त्र आभूषण और सौन्दर्य आदिका मैं क्या विवरण कहूँ? सत्यकबीरके अतिरिक्त ऐसा कोई भी तीनों लोकोंमें नहीं है कि, उनको देखकर आसक्त न हो जावे; वे कन्यायें उस स्थानपर इस कारण नियत की गई हैं कि, हंस कबीरको अपने जालमें फँसालेंवे जब वे हंस कबीरके निकट जाती हैं तब नाना प्रकारके हावभाव कटाक्ष द्वारा उनको मोहित करना चाहती हैं। परन्तु वे उनकी ओर तनिक भी ध्यान नहीं देते! वे कहते हैं कि, दूर हो और चली जा तुम्हारी तनिक भी इच्छा तथा कामना हमको नहीं है। तब वे निराश होकर लौटती हैं। भला मकड़ीके जालमें भारी पदार्थ कैसे फँस सकते हैं। जब
( १८८६ )
बोधसागर
१०२
हंस उनको अनादर करके चलते हैं तब आगे धर्मराय मिलते हैं दंडवत् प्रणाम करते हैं और हंस ऊपरकी ओर चले जाते हैं । जब सत्यलोकको पहुँचते हैं तब सत्यलोकके हंस उनकी अगवानीके निमित्त बाहर निकलते हैं और प्रत्येक हंस अपने हृदयसे लगता मिलता और प्रसन्न होकर कहता है कि, बहुत दिवसोंके पृथक् हुए हंस आज हमसे आकर मिले । समस्त हंस मिलकर उनको सत्य पुरुषके निकट ले जाते हैं और वे हंस सत्य पुरुषका दर्शन पाते और दंडवत् प्रणाम करके कृतार्थ हो लोकमें वास करते हैं ।
शेर
मुगैँ रुह आखिरी नफसको । जब छोड़े इस उनसरी कफसको ॥ सतलोक सिधार साथ सतमाज । उसवक्त करे बुलन्द परवाज ॥ दरसिम्त शुमाल सरबसर जाय । बासुर अत सो उबूर कर जाय ॥ वह नूरो जलाल बेबयाँ है । गुफ्तारे कबीरमें अयाँ है ॥ जब सुकृत लोक रुखरवाँ हो । रागोंरंग देखते दवाँ हो ॥ देखे कही सञ्जः लाल जारों । बाहुस्नोजमाल गुलअजराँ ॥ सदहा गुलशन चमनबहारी । शीरीं नहरों पुर आब जारी ॥ गहे बर्क बदन है नाजनीनाँ । हे खूब लगी बजार मीनाँ ॥ है फिरते कहीं ये दूरो गिलमाँ । बैठे कहीं जाहिदो मुसलमाँ ॥
सैकड़ों प्रकार की वस्तियाँ और स्मृष्टिकी रचना देखते हुए ऊपरको चलता है-और स्वगों तथा वैकुण्ठोंकी सैर करते और समस्त वस्तियों और शून्यको पार करके तब सत्यलोकको पहुँच जाता है ।
कबीर साहबका मंगल
चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो ।
१०३
कबीर चरित्रबोध
( १८८७ )
यहि संसार काल है राजा, कर्मको जाल पसारा हो । चौदह खंड बसे वाके मुखमें, सबही को करत अहारा हो । जारबार कोयला कर डारन, फिर फिर दे अवतारा हो । ब्रह्मा विष्णु शिवतन धरिया, और को कौन विचारा हो । सुर नर मुनि सब छलछल मारले, चौरासीमें डारा हो । मध्य अकाश आप जहँ बैठे, ज्योति शब्द ठहियारा हो । ताको रूप कहाँलग बरनो, अनंत भान उजियारा हो । श्वेतस्वरूप शब्द जहाँ फूले, हंसा करत बिहारा हो । कोटिन चांद सूर्य छिपि जहँ, एक रोम उजियारा हो । वही पार इक नगर बसत है, बरसत अमृत धारा हो । कहैं कबीर सुनो धर्मदासा, लखो पुरुष दरबारा हो । इस सत्य लोककी मनोहरता और हंसाँका रहन सहन और रीति व्यवहार सूक्ष्मवेदके पढ़नेसे जाना जावेगा ।
मुसहर
यह हरदो जहाँ काल पुरुषके है हिजारे । हर सिम्त व हर जायमें यम जाल पसारे ॥ यक लोक व यक वेद दो दरियाके किनारे । सैयादके काबूमें हैं सब जीव बेचारे ॥ चलती है यहाँ तेग व तलवार दो धारे । चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ जब भूल गया आदमको आपही आपा । पावन्द हुवा तिफली जवानी व बुढ़ापा ॥ सबपर है लगा मलिक मौत मोह व छापा । है आग लगी बेशः जलेगा यह सरापा ॥ जलते हैं धोल उड़ते धुवैं धार शरीर ।
( १८८८ )
बोधसागर
१०४
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ अफसोस लिया लूट धरम धरमन धूरत । एक इशक जदः भई है हुस्न है औरत ॥ हर कौन किया भौन है यह मोहिनी मूरत । दिल पार हुवा पारः बमह पारण सूरत ॥ बाजार खड़े मार वा बीमार नजारे । चल हंस अचल मोलि दो मावाय हमारे ॥ कैलास चलेगा व जिन्हूँ लोक चलेगा । अमरावती अलकावती गोलोक चलेगा ॥ सब स्वर्ग चलेगा व तपोलोक चलेगा । जो हद् जनो मर्दमें सो लोक चलेगा ॥ वो भी चल जावे जहां नौलाख सितारे । चल हंस अचल मोलि दो मावाय हमारे ॥ कोई न रहे एक पुरुष लोक रहेगा । आवे जो वहांसे सो खबर उसकी कहेगा ॥ सब कौल कर शामः अजिले सोल बहेगा । जिसको वह नजर आवे सो फिर कछु न चहेगा ॥ निश्चल सो रहे कायक जहां अमृतधारे । चल हंस अचल मोलि दो मावाय हमारे ॥ हंसोंकी हुस्न खूबी कही जाए सो कैसे । यह नातिकः गुम सुम्म बयां कीजिए ऐसे ॥ एक मूय मुनौविर कह इस नूरका जैसे । छिप जायँ करोड़ों महेदुर तलअत तैसे ॥ सब हंसापुरुषरूप पुरुष उनको दुलारे ।
१०५
कबीर चरित्रबोध
( १८८९ )
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ जहाँ रात न दिन है व नहीं सूरज चन्दा । सोहँग दुरै चैवर करे पुरुष अनन्दा ॥ यक सूरत सारे न खुदावन्द न बन्दा । इस मंजिल नजदीक नहीं कालका फन्दा ॥ जिस लोक महेशःको परमहंस पधारै । चल हंस अचल मोलि दो मावाय हमारे ॥ सतगुरुकी शरण लेके चलो बहके उसपार । वह कादिर मुतलक हुवा जिस जीवका मददगार ॥ कर पलमें सुबुकदोष उठा उसका गराँ बार । पहुँचावे वतनमें न बुतनमें होवे औतार ॥ आजिज से गुनहगार कतारोंको जो तारे । चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥
इति कबीर चरित्र बोध समाप्त
A black and white illustration of a potted plant, possibly a fern or a similar leafy plant, centered within a decorative border. The plant is in a rectangular pot and has many long, pointed leaves. The border is a repeating pattern of small, stylized floral or star-like shapes.
अथ गुरुमाहात्म्य-प्रारंभः
भारतपथिक कबीर पंथी- स्वामी श्रीयुगलानन्द द्वारा संशोधित
मुद्रक व प्रकाशक
गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, अध्यक्ष-“लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर”-प्रेस
कल्याण-बम्बई.
A circular emblem or seal, possibly a library or institutional logo, featuring a central design surrounded by a ring of text or decorative elements.
THE UNIVERSITY OF TORONTO
LIBRARY
1911
UNIVERSITY OF TORONTO LIBRARY
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
The image shows a very faint, light green watermark of the Indian Government Emblem (Lion Capital of Ashoka) centered on a light background. The emblem features four lions standing on a circular base, with the Ashoka Chakra (a wheel with 24 spokes) in the center. Above the lions is a Dharmachakra (a wheel with 14 spokes). The entire watermark is extremely faded and barely visible against the light background.
सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग संतान, धनी धर्मदास, चुरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम. पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी दया, वंश- व्यालीसकी दया
अथ श्रीबोधसागरे
अष्टविंशतित्तरंगः
अथ गुरुमाहात्म्य-प्रारम्भः
★
धर्मदास वचन
धर्मदास कर जोरे ठाढ़े । एकटक सुरति प्रेमचित बाढ़े ॥ करहु दया तुम निर्गुण स्वामी । वचन सुनावहु अन्तर्यामी ॥ किमि गुरु ध्यान बन्दना कीजे । होहि सुदृष्टि मोहि कहि दीजे ॥ जा पद जीव तरे भवसागर । शोक हिये हंसनपति आगर ॥ तेहि मगाशिष गुरुपद लागू । नहि धन धाम होय अनुरागू ॥
( १८९६ )
बोधसागर
६
सतगुरुवचन
धर्मदास बूझे भल ज्ञाना । तुमसे कहौं सत्य चितमाना ॥ साहेब सम सतगुरु कहैं जानो । दुजी भावना चित्त न आनो ॥ जब गुरु मिले करे परनामा । छन छन पल पल आगे जामा ॥ गुरु चाहत जो शिष्य हे नागर । होय अधीन शीख्य मतिआगर ॥ शीष्य सुमिरि निशदिन अनुरागा । पानदेन वाइस मतभागा ॥ सद्गुरु शब्द गहे टकसारा । भवजल जीव उतारे पारा ॥ सद्गुरु कर्म देखि जिव केरा । तत्क्षण गुरु करहि निर्वेरा ॥ तिनुका तोरी देइ जिव याना । फिर नहिं जन्म धरे भवआना ॥ तुरते तब पावे टकसारा । होय हिरण्मय हंस हमारा ॥ वर्णभेद निर्णयकरि पावे । कालत्रास तेहि निकट न आवे ॥ प्रथमहि गुंजवरणको लेषा । सत्यशब्द गुरु कहै विशेषा ॥ गुंजवरण जो हंसा होई । गुरुलहि तेई हंस समोई ॥ गुंजवरण पावे परवाना । राय बंकेज हंस मगु जाना ॥ कर्म देखिकै तिरन तुरावे । राय बंकेजको पान जो पावे ॥ सारखी-देहि पान जेहि जीवको, कर्म कटा तेहि जान । हंस होय सत्यपुर चले, सद्गुरु वचन प्रमान ॥
चौपाई
वरण भेद पावही प्रवाना । सो हंसाकर लोक पयाना ॥ पावे दर्श पुरुषके जाई । रहे अटल पुनि छत्र तनाई ॥ करे अटल युग युगका राजू । जिन पाया निर्णयका साजू ॥ होय बहुरि स्थिर गर्भ न आवे । वरण भेद परवाना पावे ॥ सो गुरुकी पुनि आरति कीजे । चरण पखारि चरणरज भीजे ॥ सो रज हिय अरु शीश चढावे । कालप्रबल तेहि निकट न आवे ॥ ऐसे गुरु मुक्तिके मूला । तेहि पद सम दूजा नहिं वूला ॥
७
गुरुमाहात्म्य
( १८९७ )
गुरुसाहेब जाने हड़ हीता । जेहि परताप काल जग जीता ॥ शिष्य जो करे गुरुसे चोरी । अजगर योनि होय तेहि केरी ॥ शिष्य जो गुरुसे अन्तर करई । जन्म जन्म चौरासी परई ॥ गुरु निंदा श्रवण सुने जबही । वेगिहि ठांव तजे पुनि तबही ॥ जेहि कानन सुमिरन सुनि लीन्हा । निंदा सुनि चह मूँदन कीन्हा ॥
साखी-गुरुनिंदा श्रवणन सुने, तत्क्षण छोड़े ठांव ।
जेहि कान गुरुस्तुति सुने, निन्दा निकट न ल्याव ॥
गुरुसे द्रोही शिष्य जो, संतन कीन्ह विरोध ।
सो चौरासी भर्म ही, भारे काल करि क्रोध ॥
चौपाई
गुरुकी आशीष नहीं मानी । करि अभिमान कालसम जानी ॥
गुरुहि छोट करे शीष समाई । सोई जन्म जन्म भरमाई ॥
शिष्य जो भोगे गुरुकी नारी । होइ अजगर बसै विपिन मँझारी ॥
तन छूटै धरि वृष अवतारा । लहि अनेक विधि पाप विकारा ॥
काया छूटै वृभषकी जहिया । स्वानजन्म पुनि पावे तहिया ॥
भूँकि भूँकि जग मरे गँवारा । विषय पाप पचवे संसारा ॥
झूकर जन्म होय पुनि ताही । सकल अपावन निशिदिन खाही ॥
निलज होय योनिनमें परई । लख चौरासी भ्रमता फिरई ॥
साखी-पाप विषय नहीं परिहरे, मरि मरि ले अवतार ।
कहैं कबीर धर्मदाससों, ऐसे कर्म अपार ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास विनती अनुसारी । हे सदगुरु मैं तुम बलिहारी ॥
तेहि जीव किमि होय उबारा । फांसी डारे काल अपारा ॥
सो साहब कहिये मोहि साँचे । जैसे जीव कालसे बाँचे ॥
सदगुरु वचन
धर्मदास बूझेहु भल बाता । सो अब तोहि कहों विरुयाता ॥
नं. ११ बोधसागर - ५
( १८९८ )
बोधसागर
८
कुटिल है जीव कर्म अति आगर । तासु कथा भाषों सुनो नागर ॥ चौथी पीढ़ी अंश मम होइहैं । नाम प्रमोददास जग पैहैं ॥ दास प्रमोद प्रकटि संसारा । लेखा शब्द देहि टकसारा ॥ जीव अंध शरण कर्म जैहैं । तासु कर्म सब दूरि बहैहैं ॥ नरियर हाथ लेहि पुनि जाका । तिरन तुराव कर्मगति ताका ॥ ता पीछे परवाना देहैं । हंस उबार अपन कर लेहैं ॥ सत्यशब्द चले टकसारा । पलमें हंस उतारे पारा ॥ दास प्रमोद प्रकटे जगमाहीं । बिछुरे हंस लोककूं जाहीं ॥ अमृत धारी देहि प्रवाना । सो हंसा पुरुष मनमाना ॥ सारखी-कर्म कटे तेहि जीवके, जाकहैं देहे प्रान । ऐसे ऐसे पुरुषके, हंस करे निर्वान ॥
चौपाई
जेहि जीव देहैं कड़हारी । सत्यशब्द देहैं टकसारी ॥ ध्यानभेद भाषों समुझाई । निर्णय देख हंस सुकर्ताई ॥ निर्णय पाय करे कड़हारी । धर्मराय सुख जरत उवारी ॥ सो कड़िहार सत्य धर्मदासू । जीवन कर्म करे जो नासू ॥ निर्पवनहिंका करे विचारा । तासु जीव हम पार उतारा ॥ निर्पवनहि ले गहिहे हाथा । " " " " ॥ छेहत्तरके आगे भाषा । तावट हंसलोक ले राषा ॥ सोई पवन हंसन रखवारा । भवजल जब उतारे पारा ॥ सारखी-छेहत्तरके आगे, सतहत्तर गह योग । जरा मरण भ्रम मेटके, कबहि न व्यापै सोग ॥
चौपाई
सात पाँच नरियरमें नाहीं । ता सजीव जानें गहिहो वाहीं ॥ ताहे जीव आपना जानी । कर्मरूपता कर्म न मानी ॥
९
गुरुमाहात्म्य
( १८९९ )
युग बंधन पाये जो पाना । हंस होय सत्यलोक समाना ॥ दृढ प्रतीत होइ करे गुरुसेवा । भक्तिहीन गुरु पावन देवा ॥ साखी-दीन्ह नील जेहे नानहुँ, भक्तिभाव अनुराग । निश दिन गुरु चरण गहे, हंस होवे बड़भाग ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास कहे हंसन पति राजा । भलविध कीन्ह हंसको काजा ॥ तुमहि पुरुष हो तुमही ज्ञानी । तुमहीं वंश रूप हम जानी ॥ पुरुष रूप तुम उत्पन्न कीन्हा । वंश रूप जग तारण लीन्हा ॥ सतयुग कौन जीव जग रेहू । केहि विध हंसन आन उबारेहू ॥ कौन नग्र कहवा तुम गयऊ । केतिक जीव शरण तुम भयऊ ॥ कैसे सेवा कीन्ह बनाई । हिये दलक होकै समुझाई ॥
सतगुरु वचन
पुरुष अवाज आये भव सागर । सत्य सुकृत हम नाम उजागर ॥ उत्तर दिशा गयउ निज ठामा । श्रीनग्रे पहुँचेउ तब ग्रामा ॥ राय मोहम तहाँके राजा । भक्त करत भेटत कुल लाजा ॥ सुन्दर बदन रूप अधिकार्ई । परजा सुखी राजसुख पाई ॥ शुचि संयमआत्मज्ञान उजागर । दीन लीन्ह संतन सो आगर ॥ करत खोज साधू सो प्रीती । अति आनंदरूप सुखरीती ॥ भांति भांतिके मंडप छावा । साधु संत आदरके लावा ॥ करे महोत्सव साधु बोलाई । प्रेम पुरुष निशदिन मनभाई ॥ निश दिन वेद कथासों प्रीती । कौन भांति जिव यमसों जीती ॥
साखी-खोज करत चित व्याकुल, दृढत सगलो भेष ।
सिरजनहार बतावई, सबही कहत अलेष ॥
चौपाई
चले राय तहाँ बद्दीनाथा । सुत सुमित्र लिये रानी साथ ॥
( १९०० )
बोधसागर
१०
साधुरूप हमही कर लीन्ह। रायसंग तत्क्षण पग दीन्ह। ॥ गये नृप जहवाँ प्रीतम विराजा। भांति भांतिकर बाजन बाजा ॥ कछुक द्रव्य ले आगे राधा। विनय दंडवत बहुविध भाषा ॥ होत कुलाहल मंगल चारी। भांति भांति गावे नर नारी ॥ बन्नीपरश रायकर आसन। बैठ नृपति जाय सिंहासन ॥ हम जीवन सौश्रव्य पुकारा। धार धार फिरे सेवनके धारा ॥ चेतहु प्राना शब्द सँदेश। चलो जहां तहां हंस नरेशा ॥ तहवाँ जाय बहुरि नहिं आवे। एक चित होय नाम लोलावे ॥ सकल जीवसे कहेउ चेताई। एको जीव नहिं पतिआई ॥ सात दिवस रायहि तब बीता। कौतुक एक तहां हम कीता ॥
छंद-गयउ मंडपपास तत्क्षण जहां बन्नीनाथ हो। रूप पाहन कीन्ह पारस दिनेहु मस्तक हाथ हो ॥ बीति निशि भिनसार भो तब जाय पंडा पूजही। करत आरति भयउ चक्रित देखादे जावे तब बूझही ॥ सोरठा-आरत आहेक घात, प्रतिमापद कंचन भयो। कहत सकल सो बात, राजारामदास जाय जनायो ॥
चौपाई
राजा सुनत हर्षि चित दीन्हौ। प्रभु मायाको जानन लीन्हौ ॥ भयो अचम्भो लोगन सबही। लीला आप कीन्ह प्रभु अबही ॥ स्तुति करत बहुत हर्षाहीं। सत्य भेष कोइ चीन्हत नाहीं ॥ राजा दिल करे सब साधू। चले संत जुथ जुथ मतबाधू ॥ राजा झारी लीन्हे हाथा। सकल भेद कह नावहि माथा ॥ रानी साधुन चरण परवारा। राजा आपन कर जल ठारा ॥ सकल भेष कहे बैठे जेवनारा। जय जय मंगल होत उचारा ॥ तब हम ताहां बैठे जाई। पूर्ण शशी सम रूप दिखाई ॥
११
गुरुमाहात्म्य
( १९०१ )
श्वेत अंग कीन्हेउ अति पावन । बैठे अवर सुकृत मन भावन ॥ देखि लोग सब भये अंचभा । हर्षित राय चरण गहियंभा ॥ बहुतक साधू मम गृह आया । ऐसे साधू नहीं हम पाया ॥ को तुम आहु कहांते आई । आपन परचे कहो बुझाई ॥
सुकृत बचन
जो तुम बूझहु राय सुजाना । आपन कथित कहाँ सैदाना ॥ अमरलोकते पुरुष पठाई । जीव उबारन हम जग आई ॥ आए उत्तर दिशि चितलावा । श्रीनग्र तुम कारण आवा ॥ वद्रीनाथ आवे तुम जहिया । पापपुञ्ज सब भागे तहिया ॥
छन्द-जीव सबसों कहेउ घरघर, शब्द काहु ना गहे ।
गयउ वद्रीजीको मंदिर, चित्त मम हर्षित अहे ॥
दीन्ह मस्तक हाथ तत्क्षण, रूपपारस जिन दियो ।
प्रीति तुव हिय देखि दृढ़ होय, दरश अव तोकह दियो ॥
सोरठा-भक्त हेतु तुव अंग, साधन प्रिय तुव हिये अहे ।
निश साधनके अंग, तातचित तोहे राचहे ॥
चौपाई
एतिक बचन राय सुने जबहीं । राजा बचन माहि विहसि तबहीं ॥ निःसंगत जिमि उगे अकाशा । कोक शोक मिट होत हुलासा ॥ इमि राजा दर्शन आनंदा । जिमि चकोर पायो निशिचन्दा ॥ रानी राय चरण उर धारा । क्रिया कीन्ह मम ब्रिथा बिसारा ॥ मोहि सनाथ कीन्ह प्रभु पावन । मग अकर्म हारा मनभावन ॥ आपनकर कीजे मोहि दाय। हम चीन्हा यह तुम्हरी माया ॥ सकलजीव चकित मन भायउ । नगर लोग सब देखन धायउ ॥ तरुण वृद्ध औ बालक धाए । सबही देखि प्रदक्षिण लाए ॥ सन्त वृद्ध बहु जुरे अपारा । अस्तुति करे सकल बहु वारा ॥
( १९०२ )
बोधसागर
१२
छन्द-पाणि जोरे राय ठाढे दोहु पद मोहि पावनो ।
चरण कमलअधार तुम्हारे उभय ओर नभावनों ॥
छोड़ी नारी पुत्र पुत्री तुरग धन गज संपता ।
राज काज गुमान छोड़ैउ देखत तब पद मन रता ॥
सोरठा-अब प्रभु तुमते काज, यहि विध मनमें मानि तोहि ।
तजे लोक कुल लाज, सत्यपद चित अत्रुराग मोहि ॥
सतगुरु वचन-चौपाई
राजा विनय कीन्ह बहु मोरी । हृदय गुमान तजी है तोरी ॥
कैसे तोह काल उठ भाजा । ऐसी तब मति भई दराजा ॥
राजगुमान छोड़ि गहु चरणा । भेंटो तोर जरा औ मरणा ॥
सतगुरु चरण सीख मन लाई । काल प्रबल तब निकट न आई ॥
सत्रह रानी कुँवर पचासा । एकचित होय भर्म सब नासा ॥
जब लग भर्म मिटे हिय नाहीं । तोलग काल गहे जिव बाही ॥
गृह जिव सुमत होय सब एका । तब तुम गहो सन्तका टेका ॥
एकही सुतिं भक्ति होय ठाना । ते हंसा मम संग सिधाना ॥
बातन भक्ति होय नहीं राजा । बातन नाहे सरत कहु काजा ॥
जब तुम मोहत जो मद माया । तब तेहिले हम लोक सिधाया ॥
गृहसंपत सब देह लुटाई । राज काज छोड़ो चतुराई ॥
गज धन तुरग सकल तुम छोड़ो । दुर्लभ मारगमुख मति मोड़ो ॥
तब मैं तोहि अपनो करि जानो । भक्त प्रेमचित ज्ञान समानो ॥
छन्द-मोह मद अभिमान संयुत, लोभ तृष्णा अतिबली ॥
कामि कामिनी करत कीडा, देवव्रह्मणि जिव सब छली ॥
वह सकल त्यागै सबू पागै, ज्ञान अविचल पद गहे ॥
ताहि जीवले लोक पहुँचे, काल कर तेहि ना गहे ॥
सोरठा-सो जीव सँग मम होय, सकल त्याग एकनाम गह ।
और आश नहीं कोय, शब्द गहे मन हर्षिके ॥