भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1978

( १९०० )

बोधसागर

१०

साधुरूप हमही कर लीन्ह। रायसंग तत्क्षण पग दीन्ह। ॥ गये नृप जहवाँ प्रीतम विराजा। भांति भांतिकर बाजन बाजा ॥ कछुक द्रव्य ले आगे राधा। विनय दंडवत बहुविध भाषा ॥ होत कुलाहल मंगल चारी। भांति भांति गावे नर नारी ॥ बन्नीपरश रायकर आसन। बैठ नृपति जाय सिंहासन ॥ हम जीवन सौश्रव्य पुकारा। धार धार फिरे सेवनके धारा ॥ चेतहु प्राना शब्द सँदेश। चलो जहां तहां हंस नरेशा ॥ तहवाँ जाय बहुरि नहिं आवे। एक चित होय नाम लोलावे ॥ सकल जीवसे कहेउ चेताई। एको जीव नहिं पतिआई ॥ सात दिवस रायहि तब बीता। कौतुक एक तहां हम कीता ॥

छंद-गयउ मंडपपास तत्क्षण जहां बन्नीनाथ हो। रूप पाहन कीन्ह पारस दिनेहु मस्तक हाथ हो ॥ बीति निशि भिनसार भो तब जाय पंडा पूजही। करत आरति भयउ चक्रित देखादे जावे तब बूझही ॥ सोरठा-आरत आहेक घात, प्रतिमापद कंचन भयो। कहत सकल सो बात, राजारामदास जाय जनायो ॥

चौपाई

राजा सुनत हर्षि चित दीन्हौ। प्रभु मायाको जानन लीन्हौ ॥ भयो अचम्भो लोगन सबही। लीला आप कीन्ह प्रभु अबही ॥ स्तुति करत बहुत हर्षाहीं। सत्य भेष कोइ चीन्हत नाहीं ॥ राजा दिल करे सब साधू। चले संत जुथ जुथ मतबाधू ॥ राजा झारी लीन्हे हाथा। सकल भेद कह नावहि माथा ॥ रानी साधुन चरण परवारा। राजा आपन कर जल ठारा ॥ सकल भेष कहे बैठे जेवनारा। जय जय मंगल होत उचारा ॥ तब हम ताहां बैठे जाई। पूर्ण शशी सम रूप दिखाई ॥