कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९
गुरुमाहात्म्य
( १८९९ )
युग बंधन पाये जो पाना । हंस होय सत्यलोक समाना ॥ दृढ प्रतीत होइ करे गुरुसेवा । भक्तिहीन गुरु पावन देवा ॥ साखी-दीन्ह नील जेहे नानहुँ, भक्तिभाव अनुराग । निश दिन गुरु चरण गहे, हंस होवे बड़भाग ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास कहे हंसन पति राजा । भलविध कीन्ह हंसको काजा ॥ तुमहि पुरुष हो तुमही ज्ञानी । तुमहीं वंश रूप हम जानी ॥ पुरुष रूप तुम उत्पन्न कीन्हा । वंश रूप जग तारण लीन्हा ॥ सतयुग कौन जीव जग रेहू । केहि विध हंसन आन उबारेहू ॥ कौन नग्र कहवा तुम गयऊ । केतिक जीव शरण तुम भयऊ ॥ कैसे सेवा कीन्ह बनाई । हिये दलक होकै समुझाई ॥
सतगुरु वचन
पुरुष अवाज आये भव सागर । सत्य सुकृत हम नाम उजागर ॥ उत्तर दिशा गयउ निज ठामा । श्रीनग्रे पहुँचेउ तब ग्रामा ॥ राय मोहम तहाँके राजा । भक्त करत भेटत कुल लाजा ॥ सुन्दर बदन रूप अधिकार्ई । परजा सुखी राजसुख पाई ॥ शुचि संयमआत्मज्ञान उजागर । दीन लीन्ह संतन सो आगर ॥ करत खोज साधू सो प्रीती । अति आनंदरूप सुखरीती ॥ भांति भांतिके मंडप छावा । साधु संत आदरके लावा ॥ करे महोत्सव साधु बोलाई । प्रेम पुरुष निशदिन मनभाई ॥ निश दिन वेद कथासों प्रीती । कौन भांति जिव यमसों जीती ॥
साखी-खोज करत चित व्याकुल, दृढत सगलो भेष ।
सिरजनहार बतावई, सबही कहत अलेष ॥
चौपाई
चले राय तहाँ बद्दीनाथा । सुत सुमित्र लिये रानी साथ ॥