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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

गुरुमाहात्म्य

( १८९९ )

युग बंधन पाये जो पाना । हंस होय सत्यलोक समाना ॥ दृढ प्रतीत होइ करे गुरुसेवा । भक्तिहीन गुरु पावन देवा ॥ साखी-दीन्ह नील जेहे नानहुँ, भक्तिभाव अनुराग । निश दिन गुरु चरण गहे, हंस होवे बड़भाग ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास कहे हंसन पति राजा । भलविध कीन्ह हंसको काजा ॥ तुमहि पुरुष हो तुमही ज्ञानी । तुमहीं वंश रूप हम जानी ॥ पुरुष रूप तुम उत्पन्न कीन्हा । वंश रूप जग तारण लीन्हा ॥ सतयुग कौन जीव जग रेहू । केहि विध हंसन आन उबारेहू ॥ कौन नग्र कहवा तुम गयऊ । केतिक जीव शरण तुम भयऊ ॥ कैसे सेवा कीन्ह बनाई । हिये दलक होकै समुझाई ॥

सतगुरु वचन

पुरुष अवाज आये भव सागर । सत्य सुकृत हम नाम उजागर ॥ उत्तर दिशा गयउ निज ठामा । श्रीनग्रे पहुँचेउ तब ग्रामा ॥ राय मोहम तहाँके राजा । भक्त करत भेटत कुल लाजा ॥ सुन्दर बदन रूप अधिकार्ई । परजा सुखी राजसुख पाई ॥ शुचि संयमआत्मज्ञान उजागर । दीन लीन्ह संतन सो आगर ॥ करत खोज साधू सो प्रीती । अति आनंदरूप सुखरीती ॥ भांति भांतिके मंडप छावा । साधु संत आदरके लावा ॥ करे महोत्सव साधु बोलाई । प्रेम पुरुष निशदिन मनभाई ॥ निश दिन वेद कथासों प्रीती । कौन भांति जिव यमसों जीती ॥

साखी-खोज करत चित व्याकुल, दृढत सगलो भेष ।

सिरजनहार बतावई, सबही कहत अलेष ॥

चौपाई

चले राय तहाँ बद्दीनाथा । सुत सुमित्र लिये रानी साथ ॥

( १९०० )

बोधसागर

१०

साधुरूप हमही कर लीन्ह। रायसंग तत्क्षण पग दीन्ह। ॥ गये नृप जहवाँ प्रीतम विराजा। भांति भांतिकर बाजन बाजा ॥ कछुक द्रव्य ले आगे राधा। विनय दंडवत बहुविध भाषा ॥ होत कुलाहल मंगल चारी। भांति भांति गावे नर नारी ॥ बन्नीपरश रायकर आसन। बैठ नृपति जाय सिंहासन ॥ हम जीवन सौश्रव्य पुकारा। धार धार फिरे सेवनके धारा ॥ चेतहु प्राना शब्द सँदेश। चलो जहां तहां हंस नरेशा ॥ तहवाँ जाय बहुरि नहिं आवे। एक चित होय नाम लोलावे ॥ सकल जीवसे कहेउ चेताई। एको जीव नहिं पतिआई ॥ सात दिवस रायहि तब बीता। कौतुक एक तहां हम कीता ॥

छंद-गयउ मंडपपास तत्क्षण जहां बन्नीनाथ हो। रूप पाहन कीन्ह पारस दिनेहु मस्तक हाथ हो ॥ बीति निशि भिनसार भो तब जाय पंडा पूजही। करत आरति भयउ चक्रित देखादे जावे तब बूझही ॥ सोरठा-आरत आहेक घात, प्रतिमापद कंचन भयो। कहत सकल सो बात, राजारामदास जाय जनायो ॥

चौपाई

राजा सुनत हर्षि चित दीन्हौ। प्रभु मायाको जानन लीन्हौ ॥ भयो अचम्भो लोगन सबही। लीला आप कीन्ह प्रभु अबही ॥ स्तुति करत बहुत हर्षाहीं। सत्य भेष कोइ चीन्हत नाहीं ॥ राजा दिल करे सब साधू। चले संत जुथ जुथ मतबाधू ॥ राजा झारी लीन्हे हाथा। सकल भेद कह नावहि माथा ॥ रानी साधुन चरण परवारा। राजा आपन कर जल ठारा ॥ सकल भेष कहे बैठे जेवनारा। जय जय मंगल होत उचारा ॥ तब हम ताहां बैठे जाई। पूर्ण शशी सम रूप दिखाई ॥

११

गुरुमाहात्म्य

( १९०१ )

श्वेत अंग कीन्हेउ अति पावन । बैठे अवर सुकृत मन भावन ॥ देखि लोग सब भये अंचभा । हर्षित राय चरण गहियंभा ॥ बहुतक साधू मम गृह आया । ऐसे साधू नहीं हम पाया ॥ को तुम आहु कहांते आई । आपन परचे कहो बुझाई ॥

सुकृत बचन

जो तुम बूझहु राय सुजाना । आपन कथित कहाँ सैदाना ॥ अमरलोकते पुरुष पठाई । जीव उबारन हम जग आई ॥ आए उत्तर दिशि चितलावा । श्रीनग्र तुम कारण आवा ॥ वद्रीनाथ आवे तुम जहिया । पापपुञ्ज सब भागे तहिया ॥

छन्द-जीव सबसों कहेउ घरघर, शब्द काहु ना गहे ।

गयउ वद्रीजीको मंदिर, चित्त मम हर्षित अहे ॥

दीन्ह मस्तक हाथ तत्क्षण, रूपपारस जिन दियो ।

प्रीति तुव हिय देखि दृढ़ होय, दरश अव तोकह दियो ॥

सोरठा-भक्त हेतु तुव अंग, साधन प्रिय तुव हिये अहे ।

निश साधनके अंग, तातचित तोहे राचहे ॥

चौपाई

एतिक बचन राय सुने जबहीं । राजा बचन माहि विहसि तबहीं ॥ निःसंगत जिमि उगे अकाशा । कोक शोक मिट होत हुलासा ॥ इमि राजा दर्शन आनंदा । जिमि चकोर पायो निशिचन्दा ॥ रानी राय चरण उर धारा । क्रिया कीन्ह मम ब्रिथा बिसारा ॥ मोहि सनाथ कीन्ह प्रभु पावन । मग अकर्म हारा मनभावन ॥ आपनकर कीजे मोहि दाय। हम चीन्हा यह तुम्हरी माया ॥ सकलजीव चकित मन भायउ । नगर लोग सब देखन धायउ ॥ तरुण वृद्ध औ बालक धाए । सबही देखि प्रदक्षिण लाए ॥ सन्त वृद्ध बहु जुरे अपारा । अस्तुति करे सकल बहु वारा ॥

( १९०२ )

बोधसागर

१२

छन्द-पाणि जोरे राय ठाढे दोहु पद मोहि पावनो ।

चरण कमलअधार तुम्हारे उभय ओर नभावनों ॥

छोड़ी नारी पुत्र पुत्री तुरग धन गज संपता ।

राज काज गुमान छोड़ैउ देखत तब पद मन रता ॥

सोरठा-अब प्रभु तुमते काज, यहि विध मनमें मानि तोहि ।

तजे लोक कुल लाज, सत्यपद चित अत्रुराग मोहि ॥

सतगुरु वचन-चौपाई

राजा विनय कीन्ह बहु मोरी । हृदय गुमान तजी है तोरी ॥

कैसे तोह काल उठ भाजा । ऐसी तब मति भई दराजा ॥

राजगुमान छोड़ि गहु चरणा । भेंटो तोर जरा औ मरणा ॥

सतगुरु चरण सीख मन लाई । काल प्रबल तब निकट न आई ॥

सत्रह रानी कुँवर पचासा । एकचित होय भर्म सब नासा ॥

जब लग भर्म मिटे हिय नाहीं । तोलग काल गहे जिव बाही ॥

गृह जिव सुमत होय सब एका । तब तुम गहो सन्तका टेका ॥

एकही सुतिं भक्ति होय ठाना । ते हंसा मम संग सिधाना ॥

बातन भक्ति होय नहीं राजा । बातन नाहे सरत कहु काजा ॥

जब तुम मोहत जो मद माया । तब तेहिले हम लोक सिधाया ॥

गृहसंपत सब देह लुटाई । राज काज छोड़ो चतुराई ॥

गज धन तुरग सकल तुम छोड़ो । दुर्लभ मारगमुख मति मोड़ो ॥

तब मैं तोहि अपनो करि जानो । भक्त प्रेमचित ज्ञान समानो ॥

छन्द-मोह मद अभिमान संयुत, लोभ तृष्णा अतिबली ॥

कामि कामिनी करत कीडा, देवव्रह्मणि जिव सब छली ॥

वह सकल त्यागै सबू पागै, ज्ञान अविचल पद गहे ॥

ताहि जीवले लोक पहुँचे, काल कर तेहि ना गहे ॥

सोरठा-सो जीव सँग मम होय, सकल त्याग एकनाम गह ।

और आश नहीं कोय, शब्द गहे मन हर्षिके ॥

१३

गुरुमाहात्म्य

( १९०३ )

राजामोह वचन-चौपाई

एतिक शब्द सुनो मतिमाना । दृढ प्रतीति उपजा चित्त ज्ञाना ॥ तत्क्षण हस्ती तुरग मैंगवावा । धनसंपत्ति सब तुरत लुटावा ॥ एकचित्त होय राय औ रानी । कुँवर पचास सुर्त एक आनी ॥ पुत्र पचास संग वे रहई । एक सुर्त ते बाते करई ॥ इभि सतगुरुकी सेवा कीजे । जेहि परतीत अभयपद लीजे ॥ हे सद्गुरु जीवन सुख दाता । देत राज युग युग यह बाता ॥ नेगी योगी राय बुलावा । सकल नय तुम कहैं गोहरावा ॥ सद्गुरु शरण राय गहि पाई । जेहि अनुराग होय हो आई ॥ नेगी जाय कहे सब पासू । राजा गह साहेब विश्वासू ॥ प्रजा सकल कीन्हा मत एका । होय सुमति गहो शब्दहि टेका ॥ नेगा और प्रजा सब आये । राजासो उठि विनती लाए ॥ राय मता तुम है अवगाहा । हम सब जीव संग तुम आहा ॥ जो आयसु होवै महाराजा । सो हम करे मैटि कुल लाजा ॥

राजाका मोह वचन

सफल जन्म चाहो रे भाई । सद्गुरु शरण गहो लौलाई ॥ एक सुर्त हवौं दृढ नागर । गुरु रानिय हंसा होय आगर ॥ ऐसे गुरुसों विनती लाऊ । सकलो नय संग ले जाऊ ॥

छंद-सकल जीवन सुर्ति करके, राय चल हर्षित भये । जहाँ आप विराजे सुकृती, धाय पदपंकज नये ॥ जीव सब तुम शरण आये, आपने करि लीजिये । दया करि जिव बन्दि छोरे, अमर वासा दीजिये ॥

सोरठा-रानी सत्रह साथ, कुँवर पचास पद गहि लिये । सब जीवन नायेहु माथ, दरस दान प्रभु दीजिये ॥

( १९०४ )

बोधसागर

१४

चौपाई

साहेब चलो महल पग दीजै । हंसराज आपन कर लीजै ॥ दूजो चित कीजै जनि मोही । बारबार बिनवौं प्रभु तोही ॥ हम अजान कछु जानत नाही । तुम तो पुर रहे सबही माहीं ॥ कृपा करो मम बिथा विसारो । कालजाल जीवन निर्बारो ॥ चलि मंदिर पगु दीजे स्वामी । विनय करो सुनो अन्तर्यामी ॥ चले सुकृत महल पगु धारा । परजा रानी कुँवर भूआरा ॥ राजा रतनसिंहासन लाई । चरण बंदि सुकृताहि बैठाई ॥ सत्रह रानी आरति करहीं । बहुविध चितसों विनती धरहीं ॥ सकल जीव हैं शरण तुमारे । भवसागरते जीव उबारे ॥ हंसमती जेठी नृपराणी । साहेब चरण पखारे आनी ॥ हाथे चवँर कुँवर सब ढावत । एकहिटक सबे रूप निहारत ॥ ठाड़े राय जोर दौय पाना । साहेब कहो शब्द सहेदाना ॥ जेहि विध जीवसुक्त परभाऊ । सो साहेब मोहि भाषि सुनाऊ ॥

सुकृत वचन

छंद-वचन साहेब भाषे राजा, करहु आरति पावनं । चार गुरु किंकरहु साजी, कालकर्म नसावनं ॥ चित्र चै चित्र धोती, श्वेत वस्त्रहि लावनं । चित्र आरति साज राजा, करहु मंगल गावनं ॥ सोरठा-मेवा अष्ट प्रवान, चौका चंदन फेरहुं । दलझारी तहां आन, सवासेर महाँ चेतहुं ॥

चौपाई

तंदुल सवासेर ले आना । हार आरती कलश परवीना ॥ पुंगीफल अरु श्वेतहि पाना । चौकामहाँ धरो जो आना ॥ जिव पीछे नरियर कर लेहुं । जनियर सुकृत हाथ सो देहुं ॥

१५

गुरुमाहात्म्य

( १९०५ )

कञ्चन कलस पांच धरो वाती । ज्वलित कपूर धरो बहु भांती ॥ दल अमृतकी कञ्चन झारी । डार सुगन्ध धरो तेहि वारी ॥ खरचा सात मँगगवहु सेता । गासे सात वजन कर लेता ॥ आगरु साते ताहि प्रवाना । सो खरचा ले दल ये आना ॥ खरचा सात धरे दल जबही । धर्म देख थरहर भये तबही ॥ कनक पटम्बर कीन्ह सिंहासन । तापर साहेब कीन्हे आसन ॥ आनंद मंगल कीन्ह उचारी । राय धरा नरियर तेहि वारी ॥ युथ युथ जूरे जीव सब आए । नरियर धरे सुकृत मन भाए ॥ सत्रह रानी सुत सुत नारी । ते सब आय चरण चितधारी ॥ युग बंधे राजा अरु रानी । सोविधिसकलजीवमिलजानी ॥ भावरि देय प्रदक्षिण दीन्हा । हंस उबार अपनकर लीन्हा ॥

छंद-तब चरण मृदु मंजुल पावन अतिहि सुहावन भावन । अमि मूरतिसूरत धारत त्रिविध ताप नसावन ॥ आदि अनंत अनादि पुरुष करहु दया जाहिको । जीव जेहि तुम पकरि बहियां कालग्रस नहिं ताहिको ॥

सोरठा-तुम प्रभु शब्दस्वरूप, अमित भाव लखि ना तरे । तुच्छ बुद्धि मनरूप, जीवनपकरि नचावहुँ रे ॥

चौपाई

दीजे मोहि शब्द सहिदानी । तुमते नहीं बड़ो कहु दानी ॥ जेते जीव अमरघर जाई । होइ अमर भव बहुरि न आई ॥

सुकृतवचन

राजा रानी तृणहि तूरावा । त्रिगुण पदवितें जीव बचावा ॥ कुँवर पचास रायमत लीन्हा । हर्षित हाय सुमत इन कीन्हा ॥ प्रजा सकल नग्रनके आवा । सत्य सुकृतके दर्शन पावा ॥

( १९०६ )

बोधसागर

१६

बालक तिया बृद्ध सब आए । सो साहबके पद लपटाए ॥ पुरुष अंक दीन्हेउ मति आगर । पाय पान भये हंस उजागर ॥ स्मृतकहाथ दीन्ह जिव सबही । जाते यम नहिं रोके कबही ॥ पाय पान तब भए सनाथा । सकल जीव तब नाये माथा ॥

राजाका मोहवचन-छन्द

जिमि घन नभमें शशि अवलोकत सिद्ध होत उमंगही ॥ शब्द नभ गुरुचरण इमि निशि कर्म सूरत तरंगही ॥ तिमि हर्षे राजा सकल जिव मिला करत कोलाहल सोहही ॥ बृद्ध हंसन यूथ ठाढे निरखि सुकृतहि मोहहीं ॥ सोरठा-अब दीन्हा निज पान, अधम जीव अपने किये ॥ विनय एक अनुमान, देश आपने ले चली ॥

चौपाई

यह भवसागर अति अवगाहा । सुर नर देव पाए नहिं पाहा ॥ दर्शन आय दीन्ह तुम जाही । आपनकर राखे गहि ताही ॥ निशदिन यमहीफंद लगावत । शब्दहित्यागि विषयमन ध्यावत ॥ पलपल काल करत है घाता । शब्द तुम्हारा श्रुति नहिं राता ॥ ताते विनय करें बहुबारा । सकल जीव हैं शरण तुमारा ॥ एकहि सुरत सकल जिव केरा । अब जनि साहेब लावहु बेरा ॥ बेगि लै चलो वाही देशा । अमरपुरी जहाँ हंस नरेशा ॥ अबजनि मोहिराखहु भवसागर । ले चलो जहवां हंस उजागर ॥ दीनबधु प्रभु कीजे दाय। सकल हंस ले लोक सिधाय। ॥ भेटे चरण पुरुषके जाई । अब भव चिर नाही ठहराई ॥

सकल हंस वचन-छन्द

जीव चढ़ावें करत करूणा सुनहु नरपति नागरा । करहु सदगुरु विनय दृढ़ होय, नहिं रहब भवसागरा ॥

१७

गुरुभाहान्त्य

( १९०७ )

गुरु करे हिय दया त्यागे, मामा चिता व्याकुल अहे । अमर शोभा देख वे गुन, हर्ष जीवन अति अहे ॥

सोरठा-अब जिन लावहु बेर, ठाढ़े सकल अकुलावहीं । प्रभु दयावंत जो होइकै, वे पुरुष दर्श करावहीं ॥

राजाका मोहबचन-चौपाई

राजा रानी कुँवर पचासा । सकल जीव विनती परकाशा ॥ बेग लये चलो हंस पति राजा । वह विनती करे सकल समाजा ॥ चातक स्वाति रटत जिमि जैसे । तृषावंत सबरे जिव तैसे ॥

सुकृत वचन

सत्य सुकृतमें सुरति समानी । होय निशंक करो रजधानी ॥ पुरुष नाम राजाकहँ दीना । संग लोग हंसन सब लीन्हा ॥ राय मोह हम लोक चलि जाई । सत्तर सहस्र हंस सँग लाई ॥ ऐसे सुमति करो जो बंदा । कालत्रास नहीं हो दुखद्वंदा ॥ एकचित होय सुरति जेहि लाग। सत्य शब्द सो तन मन पागा ॥ देखि काल दूरहिते भागे । जो पदपुरुष नाम दृढ़ लागे ॥ राय गए जहाँ हंस समाजा । आए हंस आरती साजा ॥ गावहि मंगल करहि कुलाहल । षोडश शृंगारा अंग भल ॥

राजाका मोह वचन

राजा देखि चकित मन पागा । बार बार सुकृत पद लागा ॥ देखेउ लोक वरन अतिपावन । अब हमपाये निज मनभावन ॥

सुकृत वचन

सुकृतहि चले राय ले साथ। जाय पुरुष कहु नायउ माथा ॥ छंद-दर्श पाय नित जीव वे सब, रूप भयो परकाश हो । अमिय फल जब पाये हंसा, द्रीय द्रीय विलास हो ॥

( १९०८ )

बोधसागर

१८

सुवना सज्य शिर छत्र सोहे, बैठ हंस समाज हो ।

भए हरिपत राय रानी कीन लोक निवास हो ॥

सोरठा--इमि हंसन परसंग, युग बाधे सो हंस होय ।

लोक लाज तज रंग, ते पहुँचे अमरा पुरी ॥

इति श्रीगुरुमाहात्म्य ग्रंथ संपूर्ण

अथ जीवधर्मबोध-प्रारंभः

भारतपथिक कबीर पंथी- स्वामी श्रीयुगलानन्द द्वारा संशोधित

मुद्रक व प्रकाशक

गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, अध्यक्ष-“लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर”-प्रेस, कल्याण-बम्बई.


THE UNIVERSITY OF TORONTO LIBRARY

1911-1912

LIBRARY OF THE UNIVERSITY OF TORONTO

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

Figure 10

सत्यसुकृत, आदिअदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतान, धनी धर्मदास, सुरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दयानामकी दया, वंश- व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे

एकोनचत्वारिंशस्तरंगः

अथ जीवधर्म बोध

दोहा-कौन धर्म है जीवको, सब धर्मन सरदार । जाते पाव मुक्ति गति, उतरे भवनधि पार॥ धर्मरूप यक वृक्ष है, मूल गुरु विरूपात । ज्ञान फूल फल मुक्ति है, शुभकर्म शाखापात॥ ज्ञान जीवको धर्म है, भ्रम त्रास जो मेट ।

( १९१४ )

बोधसागर

सत्य पंथ पावे परखि, तब तेहि सतगुरु भेंट ॥ जबलों नहि सतगुरु मिले, तबलों ज्ञान न होय । ऋद्धि सिद्धि तपते लहै, मुक्ति न पावै कोय ॥

अथ जीवको सत्यस्वरूपी देह और ज्ञानको लोप होना और स्थूलदेह और संसारको भासना और नानाप्रकार की सृष्टिको फुरना और कर्मधर्मको विस्तार वर्णन ।

चौपाई

जीव धर्म बरनो अब सोई । सब भ्रम भासजाय जिहि खोई ॥ मोह रैन जग सोवन हारा । स्वप्नरूप यह जग विस्तारा ॥ नींद गई कछु दरसै नाही । सबही भर्म भास मिटि जाही ॥ छूटे सकल कालको फंदा । ज्ञान पाय जिव होय अनंदा ॥ जेते धर्म धर्म कोइ माहीं । जीव भर्म सबही ये आही ॥ सत्य असत्य सकल है माया । माया सब मिथ्या बतलाया ॥ मायाते सब काया जागी । तनमनधन उपाधि संगलागी ॥ जब अभाव कायाको होई । माया सबही जाय बिगोई ॥ प्रथहि सत्यरूप जिव रहेऊ । कच्छी देह बहुरि सो गहेऊ ॥ जिहि कारन सतरूप लोपाना । स्वसंवेदमें प्रथम बखाना ॥ अहंकार कर निरखि निकाई । ताते अपने रूप गवाई ॥ अपने रूपसे जब सो भटका । अतिशय दुःखद्वन्द्वमें अटका ॥ काल स्वरूपी है हंकारा । ताते प्रकट काल बरियारा ॥ काल कराल सोई अन्याई । सकल जीवको धरिधरि खाई ॥ यही जीवको बंधन कीने । भवसागरमें गोता दीने ॥ जाको हिय हंकाराते जूटे । निश्चय शीश तासुको टूटे ॥ अहंकार कह तीन प्रकारा । द्वै प्रकार कर अंगीकारा ॥

जीवधर्मबोध

( १९१५ )

जीवन मुक्त केर गुन दोई । त्याग तीसरो कह श्रुति सोई ॥ प्रथम दृश्य जेती जग माहीं । मोते इतर और कछु नाहीं ॥ मैं अद्वैत परमात्म सारा । जीवनमुक्त परम हंकारा ॥ पुनि दुतिया हंकार बखानो । आपको जो अति सूक्ष्म जानो ॥ सर्वा भाग कच तेहैं कीन्हा । दोउ हंकार केर यह चीन्हा ॥ जीवनमुक्तको दोउ हंकारा । पुनि तीजा यहि भांति उचारा ॥ देहको जो आपा करि माना । ऐसी निश्चय तुच्छ बखाना ॥ जाने सत्य जो अपनी देहा । बन्धनको कारण है येहा ॥ शुद्ध आत्मते चित्तको फुरना । ताको नाम अविद्या धरना ॥ दोय भाँतिकी फुरना होई । यक संसार और कह जोई ॥ ताको नाम अविद्या राखा । आत्म और फुर अविद्या भाषा ॥ दोऊ स्पंद रूप उर मद्या । नाश अविद्या करे अविद्या ॥ जो विकल्पको कारण गाई । चित्त शक्ति क्षेत्रज्ञ कहाई ॥ नाम शरीर क्षेत्र सो जाना । तेहि अंतर बाहरको ज्ञाना ॥ नाम तासु क्षेत्रज्ञ कहीजै । सो जब सहित वासना भीजै ॥ आत्मते इतर रूप जो धारे । निश्चय कलना ताहि पुकारे ॥ निश्चय कलना जब सो गहई । बुद्धि नाम ताहीको कहई ॥ अहंभावते निश्चय जोई । पुनि संकल्प ताहिमें होई ॥ ताही कलनाको मन कहिये । चित्तशक्ति मनभाव जो गहिये ॥ घन विकल्प मनमाह जो बंधा । शब्द स्पर्श आदिक भे गंधा ॥ ताते इंद्रियानी फुरि आई । हाथ पांव प्राण आदि बताई ॥ इंद्रिन सहित देह तब भासे । चार खानकी थित कह तासे ॥ अचलते दृश्य दिशा फुरि आवा । तासु नाम संकल्प कहावा ॥ संकल्पहिते सकल पसारा । सबही स्थूल मूल हंकारा ॥ अग्निसवरूपी है हंकारा । ताते तमगुनको बिस्तारा ॥

( १९१६ )

बोधसागर

तमते त्रिगुन तत्त्वको होना । ताते जत्त बीजको बोना ॥ ब्रह्मा बुद्धि रूप तन धारा । बुद्धिते रचित सकल संसारा ॥ अग्निरूप है प्रकटा काला । ताते जत्तकेर जंजाला ॥

सत्यकबीर वचन

तेज रूप गुरु काल उपाया । ताते सकल सृष्टि दुःख पाया ॥

दोहा-मैं करता मैं भोगता, मेरो सकल जहान ।

मैंही जगमें पूज्य हो, सुर मुनि मनुष महान ॥

चौपाई

अहं ब्रह्मास्मी कह ब्रह्मा । ताते रचनाको आरंभा ॥

अहंते सकल सृष्टि यह ठाढ़ी । कथा कहानी जगमें बाढ़ी ॥

यही अहं अज्ञानको मूला । ताते जीव सहे सो शूला ॥

अहं बोलि यह जीव सिधारे । बहुरि नवीन कलेवर धारे ॥

आवा गौन अहंते होई । यक तन तजि दूसर गह सोई ॥

ज्यों ज्यों जीव तुच्छता गहई । त्यों त्यों अधिक अहंसो लहई ॥

ज्यों ज्यों श्रेष्ठ पदनको पावै । त्यों त्यों ताही दीनता आवै ॥

भृगमुनि विष्णुको मारचौ लाता । सोकरि क्षमा कहौ मृदुबाता ॥

देखो दारिद्री कंगाला । धनपाये तेहि गर्व विशाला ॥

गहे न अहंकार हरि प्यारे । जीवहि अहं तुच्छ करि डारे ॥

अहंकारके है षट अंगा । ताते जीव केरि मति भंगा ॥

जव मति भंग जीवकी होई । नाना विधिको तन गह सोई ॥

देह सदा वासना ते पूरी । सुखी होय करि ताको दूरी ॥

जबलों रहै वासना मनमें । तबलों बिचर विषयके बनमें ॥

जीव कहाव देह अभिमानी । ताको मुक्तिपात्र नहिं जानी ॥

निर्वासनिक होय निस्प्रेही । जत्त पूज्य है साधू येही ॥

जिनके हृदयमें अभिमाना । तिनको कबहु उगै न ज्ञाना ॥

जीवधर्मबोध

( १९१७ )

जो कोई कह मैं बड़ा कुलीना । सबसे ताको जाय मलीना ॥ जो कोइ कह मैं हौं बड़ सुन्दर । महाकुरुप सो होय छछूंदर ॥ जो कोइ कह मैं उत्तम जाती । सो बैठे कुकुरनकी पाती ॥ जो कोइ कह मैं पंडित ज्ञानी । होय निरक्षर पुरुष प्रानी ॥ जो कोइ कह मैं बड़ गुनवन्ता । होय सोय विद्याको जन्ता ॥ जो कोइ कह मैं बड़ बलवाना । होय अबल सो कीटसमाना ॥ जाति पांति कुलके अभिमानी । भ्रमत फिरै चौरासी खानी ॥ अभिमानिनकी कहो कहानी । धर्म महम्मद यथा बखानी ॥ त्रिविध तकबुर निर्णय ठानी । प्रथमजो भये ऐसे अभिमानी ॥ जस नमरूद आदि फिर उन्ता । नृप मद आपको ईश्वर गुन्ता ॥ प्रथम तकबुर प्रभुके ऊपर । नबीपै बहुरि तकबुर दूसर ॥ तृतीय तकबुर जग लोगनपै । मैं गड तुच्छ और सब जनहैं ॥ हौं बड़ श्रेष्ठ गुनन मलसही । औरनमें यह गुन कह बस ही ॥ प्रथम कहौं विद्या अभिमानी । दुतिये तपसीतपजिन ठानी ॥ विद्याके अभिमानी जोई । तिनके मत विचार अस होई ॥ हमही मनुष और सब पशु गन । जिनके हृदय न विद्याको धन ॥ विद्या धन सर्वापर गाई । ताते हम ईश्वर लखि पाई ॥ जगमें हम सबके शिर ताजा । हमरे हाथ है काज अकाजा ॥ दुतिये तपसिन केर समाजा । बिना मान नहीं कोई ऋषिराजा ॥ सो ऐसो निज मनहि विचारी । दरश हमार जक्त हितकारी ॥ आपको सुक्त युक्त लख औरा । और तुच्छ हम सब शिरमौरा ॥ ये दोनों पदको मद भारी । रूप गर्व धारत है नारी ॥ धनअभिमानी पुनि अस बोला । मैं चाहों औरहि लेव मोला ॥ बलमदकुलमदकुटुंबअरुचाकर । शिखशाखा बहु मानधरे नर ॥ अभिमानिनकी दशा बखाना । हशरगाह जो न्याय स्थाना ॥

( १९१८ )

बोधसागर

१०

चिउँटी रूप होय हंकारी । तिनहि लताडे सब नर नारी ॥ हशरगाह ते जब सो चाले । हबहब कूप नरकमें डाले ॥ हजरत सुलेमानकी बानी । बूथा सकल तप हो अभिमानी ॥ राई भरि जामें हंकारा । सो विहिंशतको नहिं पग धारा ॥ पुनि रसूल मकबूल बतावे । होय दीन बड़ि पदवी पावे ॥ ऐसो नर जगमें नहिं कोई । जाके शिर लगाम नहिं दोई ॥ गहे लगाम सो दोय फिरिशते । जगजिव तिनहि दीन हो दिस्ते ॥ तब दोउ प्रभुसे विनय उचरना । हे प्रभु याको ऊँचा करना ॥ धरि लगाम तेहि ऊँचा करही । जगमें श्रेष्ठ नाम तब परही ॥ जब जिव ऊँचा शीश उठावै । दोऊ फिरिशते विनय सुनावै ॥ हे प्रभु याको कीजै नीचा । धरि लगाम नीचेको खींचा ॥ अभिमानिनके शिरमें पौना । ताकौ चित्त फलावै तौना ॥ सोई पौन हंकार कहावै । बुरी चाल सब ताते आवै ॥ पढ़ि विद्या जगको भरमावै । आप न शुभकरनी मनलावै ॥ विद्याके अनुसार न करनी । अन्तमें तिनकी यह गति बरनी ॥ नरकमाह प्रभु तिनहै पठै हैं । औरनते दशगुन दुःख पैहैं ॥ गरदन पीठ तासु टुटि जाई । नरकमाह अतिशय दुख पाई ॥ जिमि खर चक्की को भरमावै । तैसे यम ताहि नाच नचावै ॥

दोहा—अग्नि कतरनी करगहे, कतरे तिनको ओठ ।

नरकमाह बड़ दुख भरे, विद्या पढ़िभे खोट ॥

चौपाई

अभिमानिनकी कथा बखानी । ईश्वरको बैरी तेहि जानी ॥ सकल बड़ाई प्रभुको सोहै । और बड़ा जगमें कहु कोहै ॥ जिनके हृदयमें हंकारा । तिनको कोई करे नहिं प्यारा ॥ नृप फिर ऊन महाअभिमानी । आपको जो ईश्वर करि जानी ॥