कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
१०
चिउँटी रूप होय हंकारी । तिनहि लताडे सब नर नारी ॥ हशरगाह ते जब सो चाले । हबहब कूप नरकमें डाले ॥ हजरत सुलेमानकी बानी । बूथा सकल तप हो अभिमानी ॥ राई भरि जामें हंकारा । सो विहिंशतको नहिं पग धारा ॥ पुनि रसूल मकबूल बतावे । होय दीन बड़ि पदवी पावे ॥ ऐसो नर जगमें नहिं कोई । जाके शिर लगाम नहिं दोई ॥ गहे लगाम सो दोय फिरिशते । जगजिव तिनहि दीन हो दिस्ते ॥ तब दोउ प्रभुसे विनय उचरना । हे प्रभु याको ऊँचा करना ॥ धरि लगाम तेहि ऊँचा करही । जगमें श्रेष्ठ नाम तब परही ॥ जब जिव ऊँचा शीश उठावै । दोऊ फिरिशते विनय सुनावै ॥ हे प्रभु याको कीजै नीचा । धरि लगाम नीचेको खींचा ॥ अभिमानिनके शिरमें पौना । ताकौ चित्त फलावै तौना ॥ सोई पौन हंकार कहावै । बुरी चाल सब ताते आवै ॥ पढ़ि विद्या जगको भरमावै । आप न शुभकरनी मनलावै ॥ विद्याके अनुसार न करनी । अन्तमें तिनकी यह गति बरनी ॥ नरकमाह प्रभु तिनहै पठै हैं । औरनते दशगुन दुःख पैहैं ॥ गरदन पीठ तासु टुटि जाई । नरकमाह अतिशय दुख पाई ॥ जिमि खर चक्की को भरमावै । तैसे यम ताहि नाच नचावै ॥
दोहा—अग्नि कतरनी करगहे, कतरे तिनको ओठ ।
नरकमाह बड़ दुख भरे, विद्या पढ़िभे खोट ॥
चौपाई
अभिमानिनकी कथा बखानी । ईश्वरको बैरी तेहि जानी ॥ सकल बड़ाई प्रभुको सोहै । और बड़ा जगमें कहु कोहै ॥ जिनके हृदयमें हंकारा । तिनको कोई करे नहिं प्यारा ॥ नृप फिर ऊन महाअभिमानी । आपको जो ईश्वर करि जानी ॥