भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1997

११

जीवधर्मबोध

( १२१२ )

अबिरहामके जो संताना । निजु गोला गोली करि जाना ॥ मूसायें प्रभु सो गुन खोला । ईश्वर बना तासुको गोला ॥ फिर ऊबर मूसा है जाई । मानमर्दके गर्द मिलाई ॥

सोरठा-एक गृही यक साधु, दोय पक्ष है जीवको । यक संग्रही उपाय, एक रसिक निजु पीवको ॥ निज निज धन सुखहेतु, दोनों उद्यमको करे । होय सजग चित्त चेतु, जेती बुद्धि विवेक जिहि ॥ कृपा जो करे करतार, पूर्ण होय मनकामना । यह धन वह भवपार, जैसो जाके आगमें ॥

दोहा-ग्रहीके धन अधिकात जब, तब तेहि कहे अमीर । अधिक अधिक धन बितलह्यौ, कह्यौ अमीर कबीर ॥ जबहि अमीर कबीरमें, तामें किन्न समाय । यथा दर्ब दिन दिन अधिक, तथा किन्न अधिकाय ॥ किन्न अधिक अधिकान जब, तब लाग्यौ बलकान । बलकत बलकत अंत भो, आप किब्रिया जान ॥ आप किब्रिया जान जब, गह्यौ ज्ञान शब्दाद । भूपर मोहिसम नहीं रहा, हरि ऊपर कर वाद ॥ प्रथम अमीर कबीर भो, पुनि अकबर अछाह । सो कबीर अकबर सोई, कहे किब्रिया ताह ॥ अछह जब बनि बैठिऊ, पहुँची तिनकी मौत । दोजखमें दाखिल भये, सेन सहित भै फौज ॥ जगमें भये कबीर बहु, जो लागे गहि तीर । आप तरे जग तार जो, सोई साच कबीर ॥ जिन जिन धारचो किन्न उर, टूटचौ सबको शीश । जासु किन्न टूटे नहीं, परम पुरुष जगदीश ॥