कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1998, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १९२० )
बोधसागर
१२
जाको किन्न अघट्ट रह, तीन काल युग चार । ताहीको सब ठट्ट है, हट्ट लगी पन सार ॥ जिन जिन शीश उठायऊ, टूटचो सबको किन्न । सत्यकबीरको किन्न जो, सदा एक रस तिन्न ॥ श्रीमुख सत्यकबीर कह, किन्न जाहिमें दीप । मोड़ा तेहि छोड़ो नहीं, तोड़ो ताको शीश ॥ किन्न सहित जब जोय नर, होय नहीं तब खैर । परे किन्न या संगमें, याहि ढंगते बैर ॥ वैर किन्नियासे भयौ, गयौ नरक जिव सोय । कुशल कौनि विधि तासुकी, रिपु जाको हरि होय ॥ जासु किन्निया नाम है, किन्न ताहिको सोह । और किन्न जो कोइ गहे, ले कबीर सँगलोह ॥ धनवितकों यह अंत है, सत विचारो जाहि । सो धन पर हंकारकर, अहं दुःखद सब आहि ॥ जैसे गृहीकी कथा, कहति निककीरकी आहि । जब फकीर गुनज्ञान गह, तब हकीर कह ताहि ॥ घर घर मांगत भीख जो, दरदर होत हकीर । कोई गालीदे मार कोई, तनक न तन मन पीर ॥ अथ हकीरको तुच्छ है, कुछ रहौ नहीं मान । अधिकते अधिक हकीर भो, तब साहिब पहिचान ॥ तब साहिब पहिनेऊ, फना कियौ तब आप । गना आपके कुछ नहीं, तन मन धन लखि पाप ॥ अंत हकारत जब भयौ, तूही तू तब टेर । जहँ तहँ देखो तूहि तू, मैं नाहीं कहु हेर ॥ मैं नाहीं जब ही रहौ, कहौ तूहि तू सर्व ।