भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधर्मबोध

( १९.२१ )

जल थल वायू व्योममें, तुही व्याप सब दर्ब ॥ तूही भू जब देखेऊ, रहा कतहुँ नहिं आप । आप आप में रमि गयौ, पुनि दुतियाकिन थाप ॥ दुतिया गयौ गवाय जब, सिंधुमें बूंद समान । गहे गरीबी संत जब, अंत दुःख तब जान ॥ जब हंकार अतिशय बना, धन्य फकीर है सोय । किन्न तकबुरके गहे, गयौ धनिक सब खोय ॥ यथा फकीर हकीर भो, गूही अमीर कबीर । दोहु गुन दोष बिचारके, जीव तरे भवतीर ॥

इति अहंशब्द

अथ कामवर्णन—चौपाई

अहंते तम तमते आकाशा । तमते त्रिगुणतत्त्व परकाशा ॥ गुण प्रकृतमय तत्त्व जो पांचो । जगके अस्तंभन ये सांचो ॥ प्रथम अकाश है पंच प्रकृतमय । काम अरुकोध लोभमोहमय ॥ प्रथम कामको यह गुन जानू । दहन ज्ञान बन कठिन कृशानू ॥ स्वसंवेदमें प्रथमहि कहेऊ । ज्ञान गोप जब जिवको भैऊ ॥ तब निज सम्मुख दृष्टि उठाई । झाँई रूप नजरमें आई ॥ सो झाँई नारी तन गहेऊ । ताके संग भोग जिव कियऊ ॥ पुरुष छाहते प्रकटी नारी । सो भ्रम रूप जक्त विस्तारी ॥ जबलों नारि पुरुषकी चाह । तवलों नहीं कर्म कुल दाहा ॥ अपनी छाहते करे लड़ाई । भ्रम कटि जूनिनमें भरमाई ॥ सोई कहो जक्तकी जननी । परम रूपके ज्ञानकी हननी ॥ वृद्ध जक्तकी कामते आही । बुद्धि विवेक तहां कुछ नाही ॥ कामविश जिव हो जिहिबारा । ताके हृदय न रहौ बिचारा ॥