कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १९१८ )
बोधसागर
१०
चिउँटी रूप होय हंकारी । तिनहि लताडे सब नर नारी ॥ हशरगाह ते जब सो चाले । हबहब कूप नरकमें डाले ॥ हजरत सुलेमानकी बानी । बूथा सकल तप हो अभिमानी ॥ राई भरि जामें हंकारा । सो विहिंशतको नहिं पग धारा ॥ पुनि रसूल मकबूल बतावे । होय दीन बड़ि पदवी पावे ॥ ऐसो नर जगमें नहिं कोई । जाके शिर लगाम नहिं दोई ॥ गहे लगाम सो दोय फिरिशते । जगजिव तिनहि दीन हो दिस्ते ॥ तब दोउ प्रभुसे विनय उचरना । हे प्रभु याको ऊँचा करना ॥ धरि लगाम तेहि ऊँचा करही । जगमें श्रेष्ठ नाम तब परही ॥ जब जिव ऊँचा शीश उठावै । दोऊ फिरिशते विनय सुनावै ॥ हे प्रभु याको कीजै नीचा । धरि लगाम नीचेको खींचा ॥ अभिमानिनके शिरमें पौना । ताकौ चित्त फलावै तौना ॥ सोई पौन हंकार कहावै । बुरी चाल सब ताते आवै ॥ पढ़ि विद्या जगको भरमावै । आप न शुभकरनी मनलावै ॥ विद्याके अनुसार न करनी । अन्तमें तिनकी यह गति बरनी ॥ नरकमाह प्रभु तिनहै पठै हैं । औरनते दशगुन दुःख पैहैं ॥ गरदन पीठ तासु टुटि जाई । नरकमाह अतिशय दुख पाई ॥ जिमि खर चक्की को भरमावै । तैसे यम ताहि नाच नचावै ॥
दोहा—अग्नि कतरनी करगहे, कतरे तिनको ओठ ।
नरकमाह बड़ दुख भरे, विद्या पढ़िभे खोट ॥
चौपाई
अभिमानिनकी कथा बखानी । ईश्वरको बैरी तेहि जानी ॥ सकल बड़ाई प्रभुको सोहै । और बड़ा जगमें कहु कोहै ॥ जिनके हृदयमें हंकारा । तिनको कोई करे नहिं प्यारा ॥ नृप फिर ऊन महाअभिमानी । आपको जो ईश्वर करि जानी ॥
११
जीवधर्मबोध
( १२१२ )
अबिरहामके जो संताना । निजु गोला गोली करि जाना ॥ मूसायें प्रभु सो गुन खोला । ईश्वर बना तासुको गोला ॥ फिर ऊबर मूसा है जाई । मानमर्दके गर्द मिलाई ॥
सोरठा-एक गृही यक साधु, दोय पक्ष है जीवको । यक संग्रही उपाय, एक रसिक निजु पीवको ॥ निज निज धन सुखहेतु, दोनों उद्यमको करे । होय सजग चित्त चेतु, जेती बुद्धि विवेक जिहि ॥ कृपा जो करे करतार, पूर्ण होय मनकामना । यह धन वह भवपार, जैसो जाके आगमें ॥
दोहा-ग्रहीके धन अधिकात जब, तब तेहि कहे अमीर । अधिक अधिक धन बितलह्यौ, कह्यौ अमीर कबीर ॥ जबहि अमीर कबीरमें, तामें किन्न समाय । यथा दर्ब दिन दिन अधिक, तथा किन्न अधिकाय ॥ किन्न अधिक अधिकान जब, तब लाग्यौ बलकान । बलकत बलकत अंत भो, आप किब्रिया जान ॥ आप किब्रिया जान जब, गह्यौ ज्ञान शब्दाद । भूपर मोहिसम नहीं रहा, हरि ऊपर कर वाद ॥ प्रथम अमीर कबीर भो, पुनि अकबर अछाह । सो कबीर अकबर सोई, कहे किब्रिया ताह ॥ अछह जब बनि बैठिऊ, पहुँची तिनकी मौत । दोजखमें दाखिल भये, सेन सहित भै फौज ॥ जगमें भये कबीर बहु, जो लागे गहि तीर । आप तरे जग तार जो, सोई साच कबीर ॥ जिन जिन धारचो किन्न उर, टूटचौ सबको शीश । जासु किन्न टूटे नहीं, परम पुरुष जगदीश ॥
( १९२० )
बोधसागर
१२
जाको किन्न अघट्ट रह, तीन काल युग चार । ताहीको सब ठट्ट है, हट्ट लगी पन सार ॥ जिन जिन शीश उठायऊ, टूटचो सबको किन्न । सत्यकबीरको किन्न जो, सदा एक रस तिन्न ॥ श्रीमुख सत्यकबीर कह, किन्न जाहिमें दीप । मोड़ा तेहि छोड़ो नहीं, तोड़ो ताको शीश ॥ किन्न सहित जब जोय नर, होय नहीं तब खैर । परे किन्न या संगमें, याहि ढंगते बैर ॥ वैर किन्नियासे भयौ, गयौ नरक जिव सोय । कुशल कौनि विधि तासुकी, रिपु जाको हरि होय ॥ जासु किन्निया नाम है, किन्न ताहिको सोह । और किन्न जो कोइ गहे, ले कबीर सँगलोह ॥ धनवितकों यह अंत है, सत विचारो जाहि । सो धन पर हंकारकर, अहं दुःखद सब आहि ॥ जैसे गृहीकी कथा, कहति निककीरकी आहि । जब फकीर गुनज्ञान गह, तब हकीर कह ताहि ॥ घर घर मांगत भीख जो, दरदर होत हकीर । कोई गालीदे मार कोई, तनक न तन मन पीर ॥ अथ हकीरको तुच्छ है, कुछ रहौ नहीं मान । अधिकते अधिक हकीर भो, तब साहिब पहिचान ॥ तब साहिब पहिनेऊ, फना कियौ तब आप । गना आपके कुछ नहीं, तन मन धन लखि पाप ॥ अंत हकारत जब भयौ, तूही तू तब टेर । जहँ तहँ देखो तूहि तू, मैं नाहीं कहु हेर ॥ मैं नाहीं जब ही रहौ, कहौ तूहि तू सर्व ।
१३
जीवधर्मबोध
( १९.२१ )
जल थल वायू व्योममें, तुही व्याप सब दर्ब ॥ तूही भू जब देखेऊ, रहा कतहुँ नहिं आप । आप आप में रमि गयौ, पुनि दुतियाकिन थाप ॥ दुतिया गयौ गवाय जब, सिंधुमें बूंद समान । गहे गरीबी संत जब, अंत दुःख तब जान ॥ जब हंकार अतिशय बना, धन्य फकीर है सोय । किन्न तकबुरके गहे, गयौ धनिक सब खोय ॥ यथा फकीर हकीर भो, गूही अमीर कबीर । दोहु गुन दोष बिचारके, जीव तरे भवतीर ॥
इति अहंशब्द
अथ कामवर्णन—चौपाई
अहंते तम तमते आकाशा । तमते त्रिगुणतत्त्व परकाशा ॥ गुण प्रकृतमय तत्त्व जो पांचो । जगके अस्तंभन ये सांचो ॥ प्रथम अकाश है पंच प्रकृतमय । काम अरुकोध लोभमोहमय ॥ प्रथम कामको यह गुन जानू । दहन ज्ञान बन कठिन कृशानू ॥ स्वसंवेदमें प्रथमहि कहेऊ । ज्ञान गोप जब जिवको भैऊ ॥ तब निज सम्मुख दृष्टि उठाई । झाँई रूप नजरमें आई ॥ सो झाँई नारी तन गहेऊ । ताके संग भोग जिव कियऊ ॥ पुरुष छाहते प्रकटी नारी । सो भ्रम रूप जक्त विस्तारी ॥ जबलों नारि पुरुषकी चाह । तवलों नहीं कर्म कुल दाहा ॥ अपनी छाहते करे लड़ाई । भ्रम कटि जूनिनमें भरमाई ॥ सोई कहो जक्तकी जननी । परम रूपके ज्ञानकी हननी ॥ वृद्ध जक्तकी कामते आही । बुद्धि विवेक तहां कुछ नाही ॥ कामविश जिव हो जिहिबारा । ताके हृदय न रहौ बिचारा ॥
( १९२२ )
बोधसागर
१४
ताको गुन यह प्रकट देखावो । आवा गौनको लेख लगावो ॥ प्रथमहि दृष्टि दौरि जब जोई । नारि देखि केहि यह हरषाई ॥ जब नर ताहि निकट नियराया । कुचनके ऊपर हाथ चलाया ॥ कुचनको जब निजु करते परसा । अधिक मोद मनमें तब सरसा ॥ कुच नहिं भोजन पात्र पयोधर । अधिक प्रीति मानुष ताते कर ॥ प्रथमहि भोजन पात्र टटोले । आवागौन राह पुनि खोले ॥ तिहि मारगमें जब जिव धसेऊ । पुत्र होय पुनि बाहर खसेऊ ॥ भर्ता है तिहि मारग पैठा । पुत्र होय पुनि बाहर पैठा ॥ भोजन पात्र टटोल जो पहिले । बालक है भाजन सोह गहिले ॥ भोजन भाजन भायां माता । पुरुष पुत्र एकै द्वै बाता ॥ भीतर बाहर पैठे निकलेरे । आवा गौन आपनो सकरे ॥ मनते मनमथ भयौ प्रचंडा । महाकाल सत सो बरिबंडा ॥ पांचवान सो निज कर लीने । सकल जीव अपने बस कीने ॥
दोहा-मोहन मारन बसकरन, उच्चाटन उनमाद । पांच बान ये काम गह, तिहु पुर परा विषाद ॥ भवसागरमें आयके, कोइ न भयौ समरत्थ । यक कंचन यक कुचनपर, को न पसारचौ हत्थ ॥
कुंडलिया
भवसागरमें आनिके, भै कबीर समरत्थ । कंचन कुचन दोहूनपै, सो न पसारचौ हत्थ ॥ सो न पसारचौ हत्थ, आप कमला चलि आई । चित चंचलावनहित, कीन सो विविध उपाई ॥ कीनेसि विविध उपाय, कबीरको मन किमिहाली । है निरास श्री तास, बहुरि बैकुंठहि चाली ॥
१५
जीवधर्मबोध
( १९२३ )
चौपाई
कोई है पती पयोधर पकरे । कोई बनि पुत्र ताहिंते टकरे ॥ भरता पुत्र होय नहिं दोऊ । सत्य कबीरते और न कोऊ ॥ नारिके बसमें सब संसारी । रचना तिहु पुरमाह पसारी ॥ भवसागर भगसागर जानी । भवके करता भव रु भवानी ॥ तीनों पुरको ईश कहाया । जिन भगचौरके राह बनाया ॥ भगके रुधिरते भगवा भेषा । देव निरंजन अकथ अलेपा ॥ उज्ज्वल भेष पुरुषको बाना । भगवा भेष निरंजन राना ॥ अंग पिंड भग माह समाना । सत्य कबीर बचन परमाना ॥ अंतर ज्योति शब्द यक नारी । हरि ब्रह्मा ताके त्रिपुरारी ॥ ताहि तियहि भग लिंग अनंता । तेउ न जाने आदिवो अंता ॥ लिंग रूप यक शंकर कीना । धरती खिला रसातल दीना ॥ भा बालक भग द्वारे आया । भग भोगनको पुरुष कहाया ॥ अबला सम कहुँ बली न कोई । तीन लोक ताकी बस होई ॥ अष्ट प्रकारके मैथुन अहई । ताते न्यारा कोह न रहई ॥
दोहा-श्रौतो सुमिरन कीर्तनो, चितवन बात यकंत ।
हठसंकल्पो रत्न पुनि, प्रापति अष्ट कहंत ॥
चौपाई
मिथुन विकार जीव सब पागा । जरे तीन पुर तिय अनुरागा ॥ जेती जगमें कथा किहानी । नारिप्रताप सकल से जानी ॥ जबलों रहैं देहको खेला । तबलों हो नारी सँग मेला ॥ नारि परे जो जाना चहई । ताकी देह तहां नहि रहई ॥ भग भोगै अरु भक्त कहावै । फिर फिर भगभोगनको आवै ॥ जड़ चेतन दोउ नारि स्वरूपा । कनक कामिनी जिव भ्रमरूपा ॥ विषकी बेल दोहूको जानी । लगे ताहिमें जिव अज्ञानी ॥
( १९२४ )
बोधसागर
१६
महामहाऋषि मुनि छलि मारा । यह मनोज पापी हत्यारा ॥ तप जप सकल अष्ट करि दीने । ज्ञानी ध्यानी निज बस कीने ॥
छंद माधवी
सूखे पत्र अहार अरु पौन भपे । धृत धर्म परासरके सरके । दृग जोहनि मोहनि रूपमहा, मनमोहित नाहरके हरके ॥ विधि नारद चंद स्वच्छंद भये, हृदया बजरोधरके धरके । अस कौतुक भो जो मन दौन कियौ, सब जी भवसागरके गरके ॥
चौपाई
साध सिद्ध चल वनमें भागी । जाय नारि तिनके सँग लागी ॥ मौनी होय बसै गिरकंदर । बसै नारि तिनके डर अंदर ॥ मैथुन अष्ट तबो नहिं जाई । ताते विकल सकल ऋषिराई ॥ बाहरको विकार जो त्यागे । पुनि अंतरको दुःख दौ दागे ॥ इन्द्री मर्दके गर्द मिलाई । तऊ साधुको काम सताई ॥ जतन अनेक करे ऋषिराई । विजय मार पर ताऊ न पाई ॥ जस नट मरकट खेल खिलावै । तथा मनोजभव जीव नचावै ॥ नारिके बसन आभूषन ओरा । साधु कबहु न निजु दृग जोरा ॥ नारि चित्र कागज मूरत गन । ताहि न सन्त लखै निजु नैनन ॥ निरखै ध्यान आव सो मूरत । चढ़ै काम पुनि ताहि विमूरत ॥ नारि पुरुष जिमि घरमें रसहीं । ताके निकट साधु नहिं बसहीं ॥ कामकलोल करे पशुखग जहैं । साधु न कबहुँ दृष्टि डारे तहैं ॥ मदन विकार अनेक विधाना । सो सब त्यागे ज्ञान निधाना ॥ जब लों यह विकार दिल दागे । तब लों ज्ञान किरिन नहिं जागे ॥ कामकरे जिहि औंसर अंधा । करे जीव कछु उलटा अंधा ॥ छन्द-रतिनाथ भाथ जो हाथ गहि, निजु सुमनसरसंधानेऊ ॥ तजि नीति गह बिपरीत रह, नर धर्मबंधन भानेऊ ॥
१७
जीवधर्मबोध
( १९२५ )
चैतन्यमे जड़ रूप जड़, चित चेत निजु उर आनेऊ । शृंगार साजन लाल कहुँ, कुसु कानिकौ मन मानेऊ ।
इति काम
अथ क्रोधवर्णन-चौपाई
द्वितीये क्रोध महा बलवंता । सोसमस्त शुभ गुनको हन्ता ॥ जाको देखि बुद्धिवर कम्पत । रहै न निकट भाजिहो चंपत ॥ महा काल यह क्रोध उचारा । यह खल प्रकट होय जेहिबारा ॥ धर्मको लेश रंच नहीं रहई । यह अपराधी जप तप दहई ॥ प्रलय करे सतगुनहि विडारा । आप दाहि और न दुहि डारा ॥ वर्षहजार जो सुनि तप कीने । पलमें क्रोध अष्ट करि दीने ॥ नरकवास सुनि बरहि पठाई । कतहुँ न रही ज्ञान गहिराई ॥ तप जप कहाँ क्रोध जब होई । जिवको निश्चय नरक विगोई ॥ सकल धर्मकी धूल उडावै । क्रोधको अंधकार जब आवै ॥ अहंकार क्रोधादि विकारा । तुच्छ जीवमें अधिक निहारा ॥ कीडा एक रहे घासनमें । ऐसो क्रोध ताहिके मनमें ॥ जो कोई ताको परसे जाई । महा-क्रोध ताके उर छाई ॥ क्रोधितहै अस मनहि विचारी । छूवन हार को डारो मारी ॥ कूदे उछलै जो रन चलई । आपको अबल जानिके टलई ॥
इति क्रोध
अथ लोभवर्णन-चौपाई
तृतीये लोभकी कथा बखानी । शुभ गति लहै न लोभी प्रानी ॥ लोभी निशदिन माला फेरा । ताको पार होय नहीं बेरा ॥ सूम है नरक केर अधिकारी । जपतप कियहु न जन्म सुधारी ॥ लोभी जीव जेते जग माहीं । नरक हेत सबही सो आहीं ॥ लोभ ते शुभ करनी नहीं भावै । सोई सब अघकर्म करावै ॥
( १९२६ )
बोधसागर
१८
सो नरपर कलियुग को बासा । तेहि प्रिय कीने बुद्धि विनासा ॥ सोई दुष्ट सब करे अकाजा । प्रीछित धर्म-धुरंधर राजा ॥ ताहूको सो बुद्धि बिगारा । कञ्चनपरकलि आसन धारा ॥ धर्म महम्मद करे बखाना । सोरनको भागी शैताना ॥ गहि कर कञ्चनदृग न लगाये । चूमि ताहि पुनि कह गोहराये ॥ कञ्चनसे जो प्रीति लगाई । सो नहिं भगवत भक्ती पाई ॥ सो लोभी इबलीसको बन्द। निश्चय परे ताहिके फन्द। ॥ पुनि ऐसो इबलीस पुकारा । साधु सूम है मित्र हमारा ॥ सूम साधु जो जप तप करई । लोभ समस्त कृपा संहरई ॥ तैसे पापी दाता जोई । परमशत्रु मेरो है सोई ॥ जो कछु पाप करे सो दाता । दान किये सो सकल निपाता ॥ सो शैतानके वश नहिं परई । दाता कोटि पाप जो करई ॥ दोय वृक्ष द्वै ठौरमें देखा । यक औदारता लोभ है एका ॥ दानवृक्ष वैकुण्ठमें बरनी । गड़ी तासु जड़ ताही धरनी ॥ साष तासु दुनियामें आई । नरहित हेत सो दियो झुकाई ॥ जो कोई पकरे साष सखावत । सो निश्चयविहिशतको जावत ॥ साष सखावत पकरि जो रहई । अघ औगुन सब ताको दहई ॥ नवीन प्रसंशिके बचन सुनावै । सखी अवश्य मेरे ढिग आवै ॥ ऐसहि लोभवृक्षकी लड़ है । घोर नरकमें ताकी जड़ है ॥ साष तासु जगमाह झुकाई । जो कोई गहै नरकमें जाई ॥ शुभ करनी सब तासु नशावै । सूमको दौजरमें पहुँचावै ॥ सब धर्मनको मत है एहा । लोभी करे नरकमें गेहा ॥
अथ मोहवर्णन-चौपाई
चौथे मोह महा दुःखदानी । भव भोगनकी यही निशानी ॥ ता पिता सुहृद परिवारा । सगे सहोदर सह सुत दारा ॥
१९
जीवधर्मबोध
( १९२७ )
प्रथमहि मातु पिताकी मोहा । अंधभो जिमि काई लग लोहा ॥ जिहि औसर घरनी घर आई । मातु पिताकी प्रीति भुलाई ॥ परम प्रीतमा नारी अहई । बाधिन यथा गरासन चहई ॥ मधुर मधुर बोलै सुसकाई । महा ठगिन जिव ज्ञान ठगाई ॥ हने जबहि सो काम कटारी । सरवस छीन लेय सो नारी ॥ ताते प्रकट भये जो पूता । पूत नहीं आयो यमदूता ॥ मधुर बोल बोलै मन हरही । दिन दिन अधिक प्रीतिपितुकरही ॥ पुत्र कि मोहमें जन्म गँवाये । ताते कबहुं न छूटन पाये ॥ ताकी मोह भयो जिव अंधा । चला अंतको यमपुर बंधा ॥ पुत्रसे कहो कौन सुख पाया । झूल गड़े जड़ मूल नशाया ॥ जन्मतही युवती हरि लीनो । युवा भये तब धन वित छीनो ॥ मूयहुपर कपालको फोरा । मा यह सुत धौ वैरी मोरा ॥ शत्रुको सदा मित्र जग जाना । मूढ़ नहीं चेते विन ज्ञाना ॥ मेरो मेरो कर अज्ञानी । ममतामें भूले सब प्रानी ॥ मोर तोर कहि जन्म गँवावै । भक्ति महातम हाथ न आवै ॥ बन्धु मित्र अरु संगे सखागन । सो समस्त है भक्तिके दुश्मन ॥ इन्है पेलिके हरि यश भनिये । प्रीति कबहुँ मति ठगनते ठनिये ॥
छन्द पद्मिनी
दशदिश देख बहु दृष्टि पसार । कोई नहिं तेरो यहि संसार ॥ मातु पिता स्वारथ हितकार । सुतदारादि सकल परिवार ॥ कोई न तेरो उबारनहार । सब मिलि तोहि नरकमें डार ॥ ताते तजो सकलकी प्रीत । यह दुनिया मतलबको मीत ॥ जिहि औसर स्वारथ ना होय । तेरो संग करे नहिं कोय ॥ बुद्धि विचारि विलोक विलोक । यह जग जान महाठग होय ॥ ठगसे प्रीति किये धन खोय । लहे अमरफलको विष जोय ॥
( १९२८ )
बोधसागर
२०
क्यों नहीं चिन्तामनि चित्चीत । यह दुनिया मतलबकी मीत ॥ जठर अग्निते तेहि जो बचाय । काहे ताको दियो भुलाय ॥ महा दुःख जब घरे आय । संकटमें सो करे सहाय ॥ भजु तेहि जन्म सुफल है जाय । परमहंसकी पदवी पाय ॥ ताकी कृपा चलो यमजीत । यह दुनिया मतलबकी मीत ॥
इति मोह
अथ भयवर्णन चौपाई
पंचम भय बटमार बड़ेरा । जो गहि जीव नरकमें गेरा ॥ भयवश तपी न जपतपकरहीं । भयते कायर घरमें मरही ॥ भय करि शूरा करे न करनी । भय करि सती न अग्निमें जरनी ॥ भय कीने शुभ कर्म न होई । भय करि शुभगति लहै न कोई ॥ भयकरि विद्याबुद्धि की हानी । भय भ्रम करि भमें चहुँखानी ॥ पांच वर्षका वय ध्रुव पाया । तप कारन सो वनाहँ सिधाया ॥ मिले ताहि नारद ऋषिराया । विविधि भांतिसे भय दिखलाया ॥ कानन महाभयावन कहेऊ । ध्रुवके हृदय न भय कछु गहेऊ ॥ बनमें जाय गूढ़ तप ठानी । रंच न सो मनमें भय मानी ॥ तपकरि हरिहि लियो प्रकटाई । धन्य धन्य ध्रुव धन्य कहाई ॥ जिनको हृदया भयते पूरा । तिनमें कबहुँ न साहस जूरा ॥ दोहा—पंचप्रकृति आकाशकी, कीने कछुक बखान । एकते एक महाप्रबल, सकल नरककी खान ॥
इति भय
चौपाई
पंच प्रकृत आकाश बखानो । पंच बहुरि बागूको जानो ॥ पंच अग्नि जलकी है पांचो । धरती पंच प्रकृति उर जांचो ॥ यही जीवको बंधन करही । इनहींते देही थित धरही ॥
२१
जीवधर्मबोध
( ११२९ )
तेहि सर्वथा अभाव जो कीजै । तब कैसे निज देह धरिजै ॥ पै अभाव कीजै गुरु द्वारे । तब जिव अपनो काज सँवारे ॥ पुत्र अकाशको बायू होऊ । पिता समान शून्य है सोऊ ॥ बायू बेटा अग्नि बखानी । सो तद्रूप तातके जानी ॥ तासुत जल जलते यह धरनी । ये सब सन्न एक सम उरनी ॥ शून्य अकाश शून्य तिहु गुन है । तम अरु अहंकार सब सुन है ॥ पुत्र पिता परपिता सहीते । सर्व सुन कहु सार न चीते ॥ शून्यको रचित देह यह अहई । शून्य सर्वथा ताको कहई ॥ शून्यकि कृपा सूत्र सब जानो । शून्य सर्वसंसारहि मानो ॥ तन मन धन सब शून्य बताओ । नाम रूप गुन शून्य कहाओ ॥ सो तन मन धन गुरुको दीना । नाम तासु बदले गहि लीना ॥ शून्य जो दीना शून्यहि लीना । कहो कहा कारज निज कीना ॥ शून्यहि दीन जो सूत्रहि पाया । तेहि व्योहार हाथ क्या आया ॥ है परंतु कारण तह एका । तामैं लहो भिन्न कछु लेखा ॥ निश्चय नामहु शून्य विचारी । तामैं है कारज यक भारी ॥ नाम डोरि हटु गहि जो कोई । शून्य पार पथ पावै सोई ॥ शून्यकि पारपंथ जब पावत । बहुरि शून्यमें सो नहि आवत ॥ शून्य रूप भवसागर धारा । अंड पिंड सब शून्य सँवारा ॥ अमकरि शून्यमें खल प्रकाशो । जस मृगजल मरुथलमें भासे ॥ फेन बुदबुदा वारि तरंगा । वायु प्रसंग बनावहु ढंगा ॥ जेहि औसर वायू नहि चलही । गलके सकल मिले तोह जलही ॥ जल विकार सब जलहै जैसे । माया ब्रह्म जीव यक तैसे ॥ अम करि नाम धरे बहु डोरा । एकब्रह्म तजि कतहु न औरा ॥ जेहि औसर जिव सोलखि पावै । एकै माह अनेक समावै ॥ दृश्य अनेक जो एक समई । पिंड अंडकी थाह सो पाई ॥ थाह पाय जब जीव थिरोना । तब जान्यौ हो चारु चिरोना ॥
नं. ११ बोधसागर - ६
( १९३० )
बोधसागर
२२
मैं हो आदि मध्य अरु अन्ता । मोहि फुराफुर वेद बदन्ता ॥ पक्की तत्त्व देह जब पावै । तबनिजुघरजिव बहुरिके आवै ॥ पक्की तत्त्व प्रकृत पच्चीसा । स्वसंवेदकी विधि जो दीसा ॥ ताको गह कच्चीको त्यागे । ऐसे योग युक्तिमें लागे ॥ तनकी कृपा योग अष्टंगा । ताको तज भज मनको अंगा ॥ मन अष्टांग योग उरधारो । स्वसंवेद जाको निरधारो ॥ तनकी कृपाकाज नहीं सरही । मन करनी जिवपार उतरही ॥ मनको रचित सकल संसारा । हो निवृत्त जिव मनके द्वारा ॥ तन मन यद्यपि मिथ्या दोई । मन करनी अति उत्तम होई ॥ तन है जाय आपनी बसमें । जेहि औसरआवै मन कसमें ॥ तन मन दोनों बश है जाई । तब निज रूप नजरमें आई ॥ ऐसे साधु जो जगमें आही । हरि ब्रह्म शिव ध्यावै ताही ॥ ताकी गतिको सके बखानी । लखे न शारद वेद अरु बानी ॥
मौनीजि वचन विचार माला
दोहा—स्वसंवेद नहीं कहि सके, लक्षण सन्त महन्त । परसंवेद कहे कष्ट, संग प्रताप कहंत ॥
चौपाई
जिनकी गति अगम अगाधू । बानी वेद पारसो साधू ॥ स्वसंवेद गुण तासु न कहई । तिनको भेद जीव किमि लहई ॥ समदृष्टि सो साधू ऐसे । सोई ब्रह्म रूप मैं पैसे ॥ काहू नहीं सो दुःख दुःखावै । जिनकी दृष्टिमें साहेब आवै ॥ को हिन्दू को मुसलमाना । को ब्रह्म केहि श्रद्ध बखाना ॥ कौन यहूदी कौन नसारा । एकै ब्रह्मको सकल पसारा ॥ रह्यौ चराचरमें सो पूरी । जाहि लखे हो सब दुःख दूरी ॥ आप आप लख ब्रह्म सनेही । जहाँ तहाँ देखो नेरी देही ॥
२३
जीवधर्मबोध
(१९३१)
मोहितजिऔर कतहु कोइनाही । अमकरि भिन्न भाव दरसाही ॥ मेरो मन अरु तन सब मेरो । तनमें मन मनमें प्रभु डेरो ॥ लखे अलखगति झगरा टूटा । जीव काल बंधनते छूटा ॥ अपनी देह सकल जग जानी । ताते सबहीको सनमानी ॥ काहूको नहीं करे निरादर । सब कोइ ओढ़े मेरी चादर ॥ स्वर्ग नरक मृत आपै आपा । जैसो कर्म तहां ले थापा ॥ सबदिल महल वहां प्रभुको है । आपै आप सर्वमें सोहै ॥ काहूको अनभल नहीं ताका । निजु अनभल ताते परिपाका ॥ औरको अनभल ताके जोई । अनभल अवश्य ताहिको होई ॥ एक मोगल क्रमकरे जो बनियां । तेहिदिग रह यक वैललदनियां ॥ मोगल परोसी धोबी रहई । लादनको एक गदहा गहई ॥ जिमि औसर खर करे पुकारा । मोगल दुखित होय तेहिबारा ॥ प्रभुसे नीति अस विनय उचरई । यहि धोबीको गदहा मरई ॥ यकदिन ऐसे कारन भयऊ । वैल मोगलको तब मरि गैऊ ॥ तिहि औसर मोगल गहि रोषा । परमेश्वरहि लगावै दोषा ॥ केते काल खुदाई कीना । गदहा बैल अजौ नहीं चीन्हा ॥ ऐसेहि सकल जीव अज्ञानी । प्रभु कह दोष लगावहि प्रानी ॥ सो नहीं दोष लगावन योगा । सबजिवनिजु२क्रमफल भोगा ॥ परभल किये भला हो अपना । निश्चय यह प्रमाण करिथपना ॥ जो काहूको कछु दुःख देई । सो दुःख अवश्य आप शिरलेई ॥ जो सबला अबला दुःखदानी । सो दुख अपने सिरपर आनी ॥ मांसरुधिर जिन जाको चाखा । परगल काटि आपसुख राखा ॥ औरकोशिरनहिनिजु शिरकाटा । अपनो तनकर बारह बाटा ॥ कोटिन यतन करे किन कोई । बदला अमिट छुटै नहीं सोई ॥
( १९३२ )
बोधसागर
२४
सत्यकबीर वचन-शब्द
अपनो कर्म न मेटो जाई । कर्मको लिखा मिटै घौँ कैसे जो युगकोटि सिराई ॥ गुरु वशिष्ठ सुनि लगन सोधाई सूर्य मंत्र यकदीना । जो सीता रघुनाथ विवाही पलयक संचन कीना ॥ तीन लोकका करता कहिये बालि बध्यौ बरि पाई । एक समय ऐसी बनि आई उनहू औसर याई ॥ नारदसुनिको बदन बिगान्यौ कीन्है कपिको रूप । शिशुपालकी भुजा उखारी आप भये हरि टूँटा ॥ पारवतीको बांझ न कहिये ईश न कही भिखारी । कहै कबीर करताकी बातें कर्मकि बात है न्यारी ॥
चौपाई
मेरो कर्म मोहि दुःख देता । जाने बिना भये वश प्रेता ॥ बदला भोगे आदि भवानी । बदला हरि हर अयशि आनी ॥ बदलाके कारन जिव झारी । भोगे दुःख भये संसारी ॥ दिल दुःखाव मति काहू कैंरो । सब तन अपने तन सम हेरो ॥ सबको दुःख सुख एक समाना । एकै रूप रूप सब जाना ॥ एकै रूप अनेक बरन है । एकै इन्द्री एकै तन है ॥ मनु सतरूपा वेदमें कहेऊ । सोई सकल रूप निजु गहेऊ ॥ चौरासी लख योनि उपानी । एकै अंग न और बखानी ॥ सबमें रमा सो अकथ अनूपा । सबको जानो मनु सतरूपा ॥ मनु सतरूपा आपै साहेब । देखि परे जगमें नाना ढब ॥ आदि पिता सबजग जिन हेरा । सो समदृष्टी सन्त बडेरा ॥ निर्वासनिक आदि ओंकारा । हिरनगर्भ वासना जो धारा ॥ भई वासना जगको कारन । दोय स्वरूप कीन तब धारन ॥
सुमिरनबोध एवं ग्रन्थ समाप्ति
२५
जीवधर्मबोध
( १९३३ )
हिरण्यगर्भ चित्ताह जो चाली । एक चना कीना द्वे दाली ॥ नारि पुरुष मिलि द्वन्द्व मचाया । ताते रचना राम रचाया ॥ स्वामी एक एक भे दासा । करे एक दूजाकी आसा ॥ वासना जब निवृत्त है जाई । स्वामी सेवक तब मिलिजाई ॥ जैसे प्रथम भयो द्वे ढंगा । तैसे दोनों होय करंगा ॥ सकल वासना लियौ बटोरी । द्वन्द्व खेल तब कतहु न हेरी ॥ मन इन्द्री कछु रहा न बाकी । निश दिन होय ब्रह्मकी झांकी ॥ जस प्रथमै रह अंडकि गोली । तस है बहुरि वचनको बोली ॥ तन मन इन्द्रीकी गम नाहीं । परम रूप रमि अलख कहाहीं ॥ लखै न कोई अलख गुरु देवा । जाने बिना करे सब सेवा ॥ जब जान्यौ तब सेवा नाहीं । मैं तू तह तब कछु न रहाहीं ॥ मोहिमें तूमें तोहि समाना । एक भयौ नहि दुतिया जाना ॥ सकल वासना मनते हरई । पारब्रह्म जब दाया करई ॥ ब्रह्मके खोजी साधो भाई । कैसे ब्रह्म की खोज बताई ॥ भजनानन्दी संत सुजाना । ब्रह्म सर्वमय पूरण जाना ॥ जाना तौ पै मिले न ताही । बिना मिले कछु सुख है नाहीं ॥ जैसे नारि पुरुष बर होई । एक दूसरो जाने सोई ॥ जानेते कछु सुख नहि सरसे । नारि पुरुष जबलों नहि परसे ॥ अरश परशते सुख सरसाना । तब मनहीमनमें सुखसमाना ॥ कहे कहा सो कहो न जाई । निज सखियनते सैन बुझाई ॥ सखीकि सैन सखी कोई बूझे । पियामिलनको सुखजेहि सूझे ॥ और कोई जो पूछे जाई । चुप है रहै तबै मुसकाई ॥ ब्रह्मको सुख जो कोई लहई । गूँगा होय न सो कछु कहई ॥ लून पूतली निज मनठाना । सागर थाह लेनको जाना ॥ जलमें पैठत जल है जाई । ताकी खबर कहै को आई ॥
( १९३४ )
बोधसागर
२६
कीट पतंगसे पूछे बाता । दीपक गिरे कौन सुख आता ॥ तेहि पतंग अस वचन सुनावो । तुमहि दीप ढिग चलि सुख पावो ॥ कीट तबहि दीपक नियराया । पुनि पतंग ढिग सो चलि आया ॥ आय पतंगसे वचन सुनाई । मैं कछु ज्योति स्वाद नहीं पाई ॥ तेहि पतंग बोला चिछाई । तैं किमि ज्योतिके सुखको पाई ॥ अरे मूढ संसारी कीडा । तोहि न व्यापी तन मन पीडा ॥ सुख पतंग आसिक सो जाना । दीपकमें जो धाय समाना ॥ तू तो फिरा देखिके आगी । जाने कहा मूढ दुरभागी ॥ शीश काटि निज करमें लीजै । ब्रह्मके सुखमें तब चित्त भीजै ॥ चले जक्त सब देखी देखा । सार असार करे को लेखा ॥ भेड़ा चाल सकल संसारा । नर पामरको यह व्यवहारा ॥ सबकोई कह यह मेरो धर्मा । मेरो गुरु कहा यह कर्मा ॥ सबते हमरो धर्म बडारा । सो बुधवंत जो करे विचारा ॥ चले अंधके पीछे अंधा । बिना विचार करे सोई धंधा ॥ यक शृगाल तेहि औसर बोला । ततछन तासुजाति सुह खोला ॥ वायस एक जो बोल उचारी । सबहि जातिगण तबहि पुकारी ॥ कीटके पीछे कीट जो चाला । तैसे जक्त धर्म प्रतिपाला ॥ यक धोबी यक गदहा राखा । सोढर नाम तासुको भाखा ॥ घाटके ऊपर धोबी गयऊ । ताहि ठौर सोढर मरिगयऊ ॥ ताते धोबीको दुःख होई । सोढर सोढर कहिके रोई ॥ घाटके ऊपर धोबिन आई । रुदन करत धोबीको पाई ॥ पुनि धोबिन निजघर फिर आई । सोढर कहिके रुदन कराई ॥ राजाकी रानी तेहि बेरी । धोबी गृह पठयो निज चेरी ॥ रुदन करत धोबिनिहि निहारा । सोढर सोढर करे पुकारा ॥ चेरी पुनि तहैंते फिरि आई । सोऊ रुदन करे बिलखाई ॥
२७
जीवधर्मबोध
(१९३५)
बांदी विलपत देखा रानी । रुदन बिलाप सोऊ तब ठानी ॥ राजा जब निज महलमें आया । रुदन करत रानीको पाया ॥ रानी रोवै सोढर कहि ताहा । सुनि सो रुदन रोवै नरनाहा ॥ राजा रुदनकरन जब लागा । नग्र नारि नर धीरज त्यागा ॥ सकल नग्रमें परा खँभारा । नृप मंत्री तब तहँ पग धारा ॥ मंत्री नृपते बचन उचारी । कारन कहा रुदन भो भारी ॥ तब नरनाथ बचन अस कहेऊ । दुखी सकल सोढर मरि गएऊ ॥ सोढर कौन सो मन्त्री बूझा । तब नृप कहौ मोहि नहिं सूझा ॥ रानी को मैं रोवत देखा । कीन्हौ मैं पुनि सोई लेखा ॥ रानीते जब पूछा जाई । सोढर कौन सो देहु बताई ॥ रानी कहे न जाने सोढर । मैं रोई बांदीके औढर ॥ जब पूछै बांदीसे जाई । सोढर कौन कहा बतलाई ॥ बूषली बोले मैं नहिं जानी । धोबिन देखि रुदन मैं ठानी ॥ धोबिन कह मोर धोबी रोई । सो लखि सोग मोहिको होई ॥ धोबीसे जब पूछा जाई । सोढर गढ़ा नाम बताई ॥ ऐसेही अंधा संसारा । देखा देखी कर्म पसारा ॥ जिनके हृदये माह बिचारा । सो नहिं लीकलीक पग धारा ॥ दोहा-लीक लीक गाड़ी चले, लीके चले कपूत ॥ तीन लीकमें नहिं चले, सूरा सन्त सपूत ॥
चौपाई
जगमें कतहुँ न तुर्क न हिंदू । सकल देखिये नाद अरु बिंदू ॥ जेते नाद बिंदु मय बंदा । सबही कर्मके फंदमें फंदा ॥ जैसो कर्म करे जो कोई । तैसोई फल पावै सोई ॥ कर्म कुरूप स्वरूप सँवारा । कर्महि ऊँच नीच गति डारा ॥ कर्महि दुःखसुख जीव भोगावै । कर्महि सकल योनि भरमावै ॥
( १९३६ )
बोधसागर
२८
अष्ट कर्म विधि जैन बखाना । बहुरि मिमांसा कर्मप्रधाना ॥ सत्यकवीर कहै पुनि ऐसे । सब जिव कर्म फन्दमें पैसे ॥
सत्यकवीर वचन-कर्मखंडकी रमैनी
कर्महि धरती पवन अकाशा । कर्महि चंद सूर परकाशा ॥ कर्महि ब्रह्मा विष्णु महेशा । कर्महि ते भये गौरि गणेशा ॥
सात वार पंद्रह तिथि साजा । नौग्रह ऊपर कर्म विराजा ॥ कर्महि राम कृष्ण औतारा । कर्महि कंस रावन संसारा ॥
सार्वी-कवीर कर्म रख सागरबंध्यौ, सौ योजन मरजाद ॥ बिन अक्षर कोइ ना छुटै, सो अक्षर अगम अगाध ॥
रमैनी
सो सागर भवसागर धारा । नहिं कछु सूझै वार न पारा ॥ तहँवा बावन अक्षर लेखा । कर्मरेख सबहिन पर देखा ॥
कर्मरेख बांधा सब कोई । खानी बानी देख बिलोई ॥
वेद कतेव कर्मही गाया । कर्महिको निह कर्म बताया ॥
सतगुरु मिले तो भेद बतावे । कर्म अकर्ममध्य देखलावे ॥
कर्मरेख तहँवा लगि राखा । जहँलगि वेद व्यास कछु भाषा ॥
सार्वी-कवीर कर्मफांस छूटे नहीं, केतो करे उपाय ॥
सतगुरु मिले तो ऊबरे, नातो परलय जाय ॥
कवीर बहु बंधनते बांधिया, एक विचारा जीव ॥
जीव विचारा क्या करे, जो न छुडावे पीव ॥
रमैनी
सूरा होय सो सन्मुख जूझै । भोंदू शब्द भेद नहिं बूझै ॥
दुखिया होय रैन दिन रोवे । भोगी भोग करे सुख सोवे ॥
दुःख सुख भोग सोग समजाने । भली बुरी कछु मन नहिं आने ॥
भली बुरीको करे सो त्याग । निश्चै पावै पद वैराग ॥
२९
जीवधर्मबोध
(१९३७)
साखी-आसन साधे आपमें, आपा डारे खोय । कहैं कबीर सो योगी, सहजे निर्मल होय ॥
कुण्डलिया
मानुष है नहिं कोई सुवा, सुवा सो डंगर ढोर । चौरासी भर्मत फिरे, टूटै न कर्मकी डोर ॥ टूटै न कर्मकी डोर, भोर बुधि जहाँ तहैं भटके । लहे न ज्ञान अन्नप, रूप भवमें पुनि पटके ॥ पुनि पुनि पटके काल, कर्म बेरी पग भारी । वचन कह यक मृग चोट, जहां लख कोट शिकारी ॥
चौपाई
कृपा करे गुरु धनी दयाला । जीवहि खच लोक ले चाला ॥ ताकी कृपा योग जब होना । लगे मही तब कालको टोना ॥ कृपा योग जबलों नहिं लोई । कृपा कौनविधि तापर होई ॥
सत्यकबीर वचन
धर्मदास तोहि लाख दोहाई । सार शब्द बाहर नहिं जाई ॥ सारशब्द बाहर जो परि है । बिचलै पीढी हंस नहिं तरि है ॥ युगन युगन तुम सेवा कीनी । ता पीछे हम इहां पगदीनी ॥ कोटिन जन्म भक्ति जब कीन्हा । सारशब्द तबही पै चीन्हा ॥ अंकुरी जिव होय जो कोई । सारशब्द अधिकारी सोई ॥ सत्यकबीर प्रमाण बखाना । ऐसो कठिन है पद निर्वाना ॥ पै दुतिये विधि कह्यो बहोरी । जापर सदगुरु कृपा न थोरी ॥ धर्मदास प्रति ऐसे कहेऊ । मांगु जो कछु तेरो चित चहेऊ ॥ धर्मदास तब वचन उचारा । तारो मोहि सहित परिवारा ॥ पिता पितामह सरखा समेता । सबहि पारकर कृपानिकेता ॥